Ramayana Yuddha Kanda Sarga 84
Yuddha KandaSarga 8423 Verses

Sarga 84

निकुम्भिला-यज्ञविघ्नोपदेशः (Counsel to Disrupt the Nikumbhilā Rite)

युद्धकाण्ड

इस सर्ग में युद्धभूमि पर उत्पन्न मनोवैज्ञानिक संकट और उसे विवेकपूर्ण परामर्श से दूर करने का प्रसंग आता है। विभीषण सेना की व्यवस्था करके लौटते हैं और देखते हैं कि राम लक्ष्मण की गोद में शोकाकुल पड़े हैं; हनुमान के समाचार को इन्द्रजीत द्वारा सीता-वध समझ लेने से राम मोहग्रस्त हो गए हैं। लक्ष्मण कारण बताते हैं, तब विभीषण राम को शांत करते हुए कहते हैं कि यह बात असंगत है—रावण सीता को नहीं मारेगा; यह वानर-सेना को विचलित करने के लिए रचा गया माया-प्रपंच है। फिर विभीषण मुख्य रणनीति बताते हैं—इन्द्रजीत निकुम्भिला में होम करने जा रहा है; यदि वह यज्ञ पूर्ण हो गया तो वह अत्यन्त दुर्जेय हो जाएगा, युद्ध में देवताओं के लिए भी मानो अदृश्य-सा। इसलिए विलम्ब छोड़कर सेना को तुरंत आगे बढ़ाना चाहिए, मिथ्या शोक त्यागना चाहिए और लक्ष्मण को निर्णायक रूप से भेजना चाहिए कि वे यज्ञ को भंग करें और इन्द्रजीत को वध्य बना दें। इस प्रकार विवेक और समय-संवेदी नीति के द्वारा शोक से धर्मयुक्त कर्म की ओर मार्ग प्रशस्त होता है।

Shlokas

Verse 1

राममाश्वासयानेतुलक्ष्मणेभ्रातृवत्सले ।निक्षिप्यगुल्मान् स्वस्थानेतत्रागच्छद्विभीषणः ।। ।।

भ्रातृवत्सल लक्ष्मण जब श्रीराम को ढाढ़स बँधा रहे थे, तब विभीषण दलों को उनके उचित स्थानों पर नियुक्त करके वहाँ आ पहुँचा।

Verse 2

नानाप्रहरणैर्वीरैश्चतुर्भिस्सचिवैर्वृत: ।नीलाञ्जनचयाकारैर्मातङ्गैरिवयूथप ।।।।

विभीषण चार वीर सचिवों से घिरा था, जिनके हाथों में नाना प्रकार के शस्त्र थे; वह नीलाञ्जन-राशि-से काले गजराजों से घिरे यूथपति के समान महात्मा श्रीराम के पास आया और उसने आँसुओं से ढँकी आँखों वाले वानर-समूहों को देखा।

Verse 3

राघवं च महात्मानमिक्ष्वाकुकुलनन्दनम् ।ददर्शमोहमापन्नंलक्ष्मणस्याङ्गमाश्रितम् ।।।।

विभीषण ने महात्मा राघव—इक्ष्वाकु-कुल के आनन्द—को मोह और व्याकुलता में पड़ा, लक्ष्मण की गोद का आश्रय लिए देखा॥

Verse 4

राघवं च महात्मानमिक्ष्वाकुकुलनन्दनम् ।ददर्शमोहमापन्नंलक्ष्मणस्याङ्गमाश्रितम् ।।6.84.3।।

विभीषण ने महात्मा राघव—इक्ष्वाकु-कुल के गौरव—को भ्रम और विषाद से ग्रस्त, लक्ष्मण की गोद में झुका हुआ देखा॥

Verse 5

व्रीडितंशोकसन्तप्तंदृष्टवारामंविभीषणः ।अन्तर्धुःखएनदीनात्माकिमेतदितिसोऽब्रवीत् ।।।।

लज्जित और शोक से दग्ध राम को देखकर, भीतर के दुःख से दीन हुए विभीषण ने कहा—“यह क्या है?”॥

Verse 6

विभीषणमुखंदृष्टवासुग्रीवंतांश्चवानरान् ।लक्ष्मणोवाचमन्दार्थमिदंबाष्पपरिप्लुतः ।।।।

विभीषण के मुख की ओर, सुग्रीव और उन वानरों को देखकर, आँसुओं से भरी आँखों वाले लक्ष्मण ने मंद स्वर में ये वचन कहे।

Verse 7

हताइन्द्रजितासीताइतिश्रुत्वैवराघवः ।हनूमद्वचनात्सौम्यततोमोहमुपागतः ।।।।

हे सौम्य! हनुमान के वचनों से ‘इन्द्रजित ने सीता को मार डाला’ यह सुनते ही राघव तत्काल मोह में पड़ गए।

Verse 8

कथयन्तंतुसौमित्रिंसन्निवार्यविभीषणः ।पुष्कलार्थमिदंवाक्यंविसंज्ञंराममब्रवीत् ।।।।

सौमित्रि बोलने लगे तो विभीषण ने उन्हें रोककर, मूर्छित राम से अर्थ-समृद्ध ये वचन कहे।

Verse 9

मनुजेन्द्रार्थरूपेणयदुक्ततुहनूमता ।तदयुक्तमहंमन्येसागरस्येवशोषणम् ।।।।

हनुमान ने मनुज-नरेन्द्र के विषय में जो बात तथ्य मानकर कही है, वह मुझे असंगत प्रतीत होती है—मानो समुद्र का सूख जाना।

Verse 10

अभिप्रायंतुजानामिरावणस्यदुरात्मनः ।सीतांप्रतिमहाबाहो न च घातंकरिष्यति ।।।।

हे महाबाहो! दुरात्मा रावण का सीता के विषय में जो अभिप्राय है, उसे मैं जानता हूँ; वह उसे नहीं मारेगा।

Verse 11

याच्यमानःसुबहुशोमयाहितचिकीर्षुणा ।वैदेहीमुत्सृजस्वेति न च तत्कृतवान्वचः ।।।।

उसका हित चाहने वाले मुझसे बार-बार प्रार्थना किए जाने पर भी—‘वैदेही को छोड़ दे’—उसने उन वचनों का पालन नहीं किया।

Verse 12

नैवसाम्ना न दानेन न भेदेनकुतोयुधा ।साद्रष्टुमपिशक्येतनैवचान्येनकेनचित् ।।।।

न साम से, न दान से, न भेद से—फिर युद्ध की तो बात ही क्या—किसी भी उपाय से वह (सीता) प्राप्त भी की जा सके, ऐसा नहीं है।

Verse 13

वानरान्मोहयित्वातुप्रतियातः स राक्षसः ।मयामयींमहाबाहोतांविद्दिजनकात्मजाम् ।।।।

वानरों को मोहित करके वह राक्षस लौट गया। हे महाबाहो, यहाँ जो ‘जनकनन्दिनी’ दिखाई देती है, उसे माया-निर्मित ही जानो।

Verse 14

चैत्यंनिकुम्भिलांनामप्राप्यहोमंकरिष्यति ।हुतवानुपयातोहिदेवैरपिसवासवैः ।।।।दुराधर्षोभवत्येषसङ्ग्रामेरावणात्मजः ।

‘निकुम्भिला’ नामक पवित्र चैत्य में पहुँचकर वह होम करेगा। होम करके लौट आने पर रावण का यह पुत्र संग्राम में इन्द्र सहित देवताओं के लिए भी दुर्जेय हो जाता है।

Verse 15

तेनमोहयतानूनमेषामायाप्रयोजिता ।।।।विघ्नमन्विच्छतातत्रवानराणांपराक्रमे ।

निश्चय ही वानरों को मोहित करने वाले उसी ने, वहाँ वानरों के पराक्रम में विघ्न डालने की इच्छा से, यह माया रची है।

Verse 16

ससैन्यास्तत्रगच्छामोयावत्तन्नसमाप्यते ।।।।त्यजेमंनरशार्दूलमिथ्यासन्तापगतम् ।सीदतेहिबलंसर्वंदृष्टवात्वांशोककर्शितम् ।।।।

आओ, सेना सहित वहाँ चलें—उस कर्म के पूर्ण होने से पहले। हे नरशार्दूल, इस मिथ्या संताप को त्यागो; तुम्हें शोक से कृश देखकर सारी सेना का बल ढल जाता है।

Verse 17

ससैन्यास्तत्रगच्छामोयावत्तन्नसमाप्यते ।।6.84.16।।त्यजेमंनरशार्दूलमिथ्यासन्तापगतम् ।सीदतेहिबलंसर्वंदृष्टवात्वांशोककर्शितम् ।।6.84.17।।

आओ, सेना सहित वहाँ चलें—उस कर्म के पूर्ण होने से पहले। हे नरशार्दूल, इस मिथ्या संताप को त्यागो; तुम्हें शोक से कृश देखकर सारी सेना का बल ढल जाता है।

Verse 18

इहत्वंस्वस्थहृदयस्तिष्ठसत्त्वसमुच्छ्रितः ।लक्ष्मणंप्रेषयास्माभिस्सहसैन्यानुकर्षिभिः ।।।।

तुम यहाँ स्थिर-हृदय होकर, साहस से उन्नत रहो। हमारे साथ सेना को आगे खींच लाने वालों सहित लक्ष्मण को भेजो॥

Verse 19

एषतंनरशार्दूलोरावणिंनिशितैश्शरैः ।त्याजयिष्यतितत्कर्मततोवध्योभविष्यति ।।।।

यह नर-शार्दूल तीक्ष्ण बाणों से रावणि को उस कर्म से हटाएगा। जब वह उसे छोड़ देगा, तब वह वध्य हो जाएगा॥

Verse 20

तस्यैतेनिशितास्तीक्ष्णाःपत्रिपत्राङ्गवाजिनः ।पतत्रिणइवासौम्याश्शराःपास्यन्तिशोणितम् ।।।।

ये पैने, तीक्ष्ण, पंखों से युक्त—मानो पक्षियों के अंगों से सुसज्जित—असौम्य बाण क्रूर पक्षियों की भाँति उसका रक्त पीएँगे।

Verse 21

सत्सन्दिशमहाबाहोलक्ष्मणंशुभलक्षणम् ।राक्षसस्यविनाशायवज्रंवज्रधरोयथा ।।।।

हे महाबाहो! उस राक्षस के विनाश हेतु शुभ-लक्षण लक्ष्मण को भेजिए—जैसे वज्रधारी इन्द्र वज्र को भेजता है।

Verse 22

मनुजवरन कालविप्रकर्षोरिपुनिधनंप्रतियत्क्षामोऽद्यकर्तुम् ।त्वमतिसृजरिपोर्वधायवाणीममररिपोर्मथनेयथामहेन्द्रः ।।।।

हे मनुजश्रेष्ठ, अब विलम्ब उचित नहीं; शत्रु-विनाश समीप है। तुम आज्ञा दो कि लक्ष्मण शत्रु का वध करे, जैसे देव-शत्रु के मर्दन में महेन्द्र ने आदेश दिया था।

Verse 23

समाप्तकर्माहि स राक्षसाधिपोभवत्यदृश्यस्समरेसुरासुरैः ।युयुत्सतातेनसमाप्तकर्मणाभवेत्सुराणामपिसंशयोमहान् ।।।।

वह राक्षसाधिपति जब अपना कर्म (अनुष्ठान) पूर्ण कर लेता है, तब युद्ध में देवों और असुरों को भी अदृश्य हो जाता है। ऐसे सिद्ध-बल वाले उससे युद्ध करने में देवताओं को भी बड़ा संशय हो जाए।

Frequently Asked Questions

The dilemma is leadership paralysis caused by grief and misinformation: Rāma’s despair after hearing that Sītā was killed. The pivotal action is Vibhīṣaṇa’s insistence on abandoning unverified sorrow and executing a preemptive mission to prevent Indrajit’s ritual from completing.

The upadeśa is that dharmic action requires clarity (viveka) and timely resolve: deception can weaponize emotion, so counsel grounded in knowledge must restore composure, prioritize protectable goods (Sītā’s safety), and convert grief into disciplined duty.

The key landmark is the Nikumbhilā caitya (sanctuary) in Laṅkā, presented as a ritual power-site where a homa can transform military capability (e.g., invisibility/near-invincibility), making it a strategic node in the campaign’s “digital map.”

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