
शार्दूलचरवृत्तान्तः (Saardula’s Spy-Report on Rama’s Camp and the Vanara Host)
युद्धकाण्ड
इस सर्ग में लंका के गुप्तचर बताते हैं कि राघव सुवेल पर्वत पर अचल-सा दृढ़ सैन्य लेकर डेरा डाले हुए हैं। यह सुनकर रावण क्षणभर विचलित होता है और अपने दूत शार्दूल से पूछताछ करता है; शार्दूल का भय-चिह्नित रूप ही वानरों की कड़ी चौकसी का प्रमाण बन जाता है। शार्दूल अपने पकड़े जाने का वृत्तांत कहता है—तुरंत पहचान लिया गया, पीटा गया, लोगों के बीच घुमाया गया और अंत में छोड़ दिया गया—जिससे राम-शिविर की अनुशासनपूर्ण सुरक्षा प्रकट होती है। वह आगे बताता है कि समुद्र में शिला-पाषाण भरकर सेतु-कार्य पूर्ण हो चुका है और राम लंका-द्वार के निकट मोर्चा बाँधे हैं; वानरों की युद्ध-रचना को वह गरुड़-व्यूह के समान वर्णित करता है। शार्दूल रावण को दो टूक नीति सुझाता है—सीता लौटा दे या युद्ध स्वीकार करे, इससे पहले कि राम प्राचीर तक पहुँचें। रावण स्पष्ट इंकार करता है कि देवताओं के संघ के विरुद्ध भी वह सीता नहीं देगा, और वानर-बल की संख्या, वंश और पराक्रम का विस्तृत विवरण माँगता है। शार्दूल सुग्रीव, जाम्बवान, हनुमान, नील, अंगद, मैंद, द्विविद आदि प्रमुख वीरों का नाम लेकर अनेक की दिव्य वंश-परंपरा बताता है और सेना की विशालता पर बल देता है—दस करोड़ वानर। अंत में वह कहता है कि शेष विवरण विस्तार के कारण कह पाना कठिन है। इस प्रकार यह अध्याय एक ओर रण-तैयारी का सूचीपत्र है, तो दूसरी ओर अनुशासित धर्म-पक्ष और हठी राज-आसक्ति का मनोवैज्ञानिक चित्र।
Verse 1
ततस्तमक्षोभ्यबलंलङ्काधिपतयेचराः ।सुवेलेराघवंशैलेनिविष्टंप्रत्यवेदयन् ।।6.30.1।।
मैं बताऊँगा कि राक्षस रावण के प्रति कैसे स्नेह-भक्ति से युक्त हैं, उसके तेज से कैसे वशीभूत रहते हैं; लंका की परम समृद्धि और समुद्र की भीषणता भी।
Verse 2
चाराणांरावणश्श्रुत्वाप्राप्तंरामंमहाबलम् ।जातोद्वेगोऽभवत्किञ्चिच्छार्दूलंवाक्यमब्रवीत् ।।6.30.2।।
अपने गुप्तचरों से यह सुनकर कि महाबली राम महान् बल के साथ आ पहुँचे हैं, रावण कुछ उद्विग्न हो उठा और शार्दूल से बोला।
Verse 3
अयथावच्चतेवर्णोदीनश्चासिनिशाचर ।नासिकच्चिदमित्राणांक्रुद्धानांवशमागतः ।।6.30.3।।
हे निशाचर! तुम्हारा वर्ण यथावत नहीं है और तुम दीन-सा दिखते हो। कहीं तुम क्रुद्ध शत्रुओं के वश में तो नहीं आ गए?
Verse 4
इतितेनानुशिष्टस्तुवाचंमन्दमुदीरयत् ।तदाराक्षसशार्दूलंशार्दूलोभयविह्वलः ।।6.30.4।।
उसके द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर, भय से व्याकुल शार्दूल ने तब राक्षसों के शार्दूल से मंद स्वर में वचन कहा।
Verse 5
नतेचारयितुंशक्याराजन्वानरपुङ्गवाः ।विक्रान्ताबलवन्तश्चराघवेणचरक्षिताः ।।6.30.5।।
हे राजन्! आपके चर वानरों के अग्रगण्य वीरों में चल-फिर नहीं सकते। वे पराक्रमी और बलवान हैं तथा राघव द्वारा रक्षित हैं।
Verse 6
नापिसम्भाषितुंशक्यास्सम्प्रश्नोऽत्रनलभ्यते ।सर्वतोरक्ष्यतेपन्थावानरैःपर्वतोपमै ।।6.30.6।।
उनसे बातचीत करना भी संभव नहीं; वहाँ कोई प्रश्न-उत्तर भी नहीं हो पाता। पर्वत-सम वानरों ने सब ओर से मार्गों की रक्षा कर रखी है।
Verse 7
प्रविष्टमात्रेज्ञातोऽहंबलेतस्मिन्नचारिते ।बलाद्गृहीतोरक्षोभिर्बहुधाऽस्मिविचालितः ।।6.30.7।।
उस सेना में चुपके से प्रवेश करते ही मैं पहचान लिया गया; रक्षकों ने बलपूर्वक पकड़कर मुझे बार-बार इधर-उधर पटक दिया।
Verse 8
जानुभिर्मुष्टिभिर्दन्तेस्तलैश्चाभिहतोभृशम् ।परिणीतोऽस्मिहरिभिर्बलवद्भिरमर्षणैः ।।6.30.8।।
घुटनों, मुक्कों, दाँतों और हथेलियों से मुझे बहुत मारा गया; फिर बलवान्, क्रुद्ध वानरों ने मुझे घसीटते हुए घुमाया।
Verse 9
परिणीयचसर्वत्रनीतोऽहंरामसंसदम् ।रुधिरादिग्धसर्वाङ्गोविह्वलश्चलितेन्द्रियः ।।6.30.9।।
मुझे सर्वत्र घुमाकर अंत में राम की सभा में लाया गया; मेरा सारा शरीर रक्त से लथपथ था, मैं व्याकुल था और इन्द्रियाँ डगमगा रही थीं।
Verse 10
हरिभिर्वध्यमानश्चयाचमानःकृताञ्जलिः ।राघवेणपरित्रातोजीवामीतियदृच्छया ।।6.30.10।।
उसने सेना-समूह के विभाग और वाहनों की व्यवस्था भी बताई; ऐसा कहकर वह तत्त्वज्ञ, कपियों में श्रेष्ठ, फिर विस्तार से वर्णन करने लगा।
Verse 11
एषशैलैश्शिलाभिश्चपूरयित्वामहार्णवम् ।द्वारमाश्रित्यलङ्कायारामस्तिष्ठतिसायुधः ।।6.30.11।।
पर्वतों और शिलाखण्डों से महा-समुद्र को भरकर, राम शस्त्रधारी होकर लंका के द्वार पर आ खड़े हैं।
Verse 12
गरुडव्यूहमास्थायसर्वतोहरिभिर्वृतः ।मांविसृज्यमहातेजालङ्कामेवाभिवर्तते ।।6.30.12।।
‘गरुड़’ नामक व्यूह रचकर, चारों ओर वानर-सेना से घिरे हुए, महातेजस्वी वह—मुझे छोड़कर—सीधे लंका की ओर बढ़ रहा है।
Verse 13
पुराप्राकारमायातिक्षिप्रमेकतरंकुरु ।सीतांवास्मैप्रयच्छाशुयुद्धंवाप्रदीयताम् ।।6.30.13।।
वह प्राकार तक पहुँचने से पहले शीघ्र एक काम कर—या तो सीता को तुरंत उसे लौटा दे, अथवा युद्ध के लिए उसे अवसर दे।
Verse 14
मनसातंतदाप्रेक्ष्यतच्छ्रुत्वाराक्षसाधिपः ।शार्दूलंसुमहद्वाक्यमथोवाचसरावणः ।।6.30.14।।
यह सुनकर और मन में विचार कर, राक्षसों के अधिपति रावण ने शार्दूल से गंभीर और महान वचन कहे।
Verse 15
यदिमांप्रतियुध्येरन्देवगन्धर्वदानवाः ।नैवसीतांप्रदास्यामिसर्वलोकभयादपि ।।6.30.15।।
यदि देव, गन्धर्व और दानव भी मेरे विरुद्ध युद्ध करें, और समस्त लोकों का भय भी हो, तब भी मैं सीता को नहीं दूँगा।
Verse 16
एवमुक्त्वामहातेजारावणःपुनरब्रवीत् ।चरिताभवतासेनाकेऽत्रशूराःप्लवङ्गमाः ।।6.30.16।।
ऐसा कहकर महातेजस्वी रावण फिर बोला—तुम उनकी सेना में घूम आए हो; यहाँ वानरों में कौन-कौन वीर हैं?
Verse 17
कीदृशा: किंप्रभा: सौम्यवानरायेदुरासदाः ।कस्यपुत्राश्चपौत्राश्चतत्त्वमाख्याहिराक्षस:।। 6.30.17।।
सौम्य, वे दुर्जेय वानर कैसे हैं, उनकी प्रभा और सामर्थ्य क्या है? वे किसके पुत्र और पौत्र हैं—मुझे यथार्थ बताओ।
Verse 18
तथात्रप्रतिपत्स्यामिज्ञात्वातेषांबलाबलम् ।अवश्यंबलसङ् ख्यानंकर्तव्यंयुद्धमिच्छताम् ।।6.30.18।।
उनकी शक्ति और दुर्बलता को भली-भाँति जानकर ही मैं यहाँ क्या करना है, यह निश्चय करूँगा। युद्ध चाहने वालों के लिए सेना-बल और संख्या का आकलन करना नितान्त आवश्यक है॥
Verse 19
अथैवमुक्तश्शार्दूलोरावणेनोत्तमश्चरः ।इदंवचनमारेभेवक्तुंरावणसन्निधौ ।।6.30.19।।
रावण द्वारा ऐसा कहे जाने पर शार्दूल नामक उत्तम चर ने रावण के सन्निधि में ये वचन कहना आरम्भ किया॥
Verse 20
अथर्क्षरजसःपुत्रोयुधिराजासुदुर्जयः ।गद्गदस्याथपुत्त्रोऽत्रजाम्बवानितिविश्रुतः ।।6.30.20।।
तब उसने कहा—ऋक्षराज का पुत्र राजा युद्ध में अत्यन्त दुर्जेय है। और यहाँ गद्गद का पुत्र भी है, जो ‘जाम्बवान्’ नाम से विख्यात है॥
Verse 21
गद्गदस्यैवपुत्त्रोऽन्योगुरुपुत्र: शतक्रतोः ।कदनंयस्यपुत्रेणकृतमेकेनरक्षसाम् ।।6.30.21।।
गद्गद का एक अन्य पुत्र भी यहाँ है—‘गुरु का पुत्र’ तथा शतक्रतु का (सम्बन्धी)। जिसके एक ही पुत्र ने राक्षसों का महान संहार किया था॥
Verse 22
सुषेणश्चापिधर्मात्मापुत्रोधर्मस्यवीर्यवान् ।सौम्यस्सोमात्मजश्चात्रराजन् दधिमुखःकपिः ।।6.30.22।।
यहाँ सुषेण भी है—धर्मात्मा और पराक्रमी—जो धर्म का पुत्र कहा जाता है। और हे राजन्, यहाँ सोम (चन्द्र) का पुत्र, सौम्य कपि दधिमुख भी है॥
Verse 23
सुमुखोदुर्मुखश्चात्रवेगदर्शीचवानरः ।मृत्युर्वानररूपेणनूनंसृष्टस्स्वयम्भुवा ।।6.30.23।।
यहाँ सुमुख, दुर्मुख और वानर वेगदर्शी उपस्थित हैं। निश्चय ही स्वयंभू ब्रह्मा ने वानर-रूप में मानो मृत्यु को ही रच दिया है।
Verse 24
पुत्त्रोहुतवहस्याथनीलस्सेनापतिस्स्वयम् ।अनिलस्यचपुत्त्रोऽत्रहनूमानितिविश्रुतः ।।6.30.24।।
यहाँ हुतवह (अग्नि) का पुत्र नील है, जो स्वयं सेना का सेनापति है। और यहाँ अनिल (वायु) का पुत्र, हनुमान नाम से विख्यात, भी है।
Verse 25
नप्ताशक्रस्यदुर्धर्षोबलवानङ्गदोयुवा ।मैन्दश्चद्विविदश्चोभौबलिनावश्विसम्भवौ ।।6.30.25।।पुत्त्रावैवस्वतस्यात्रपञ्चकालान्तकोपमाः ।गजोगवाक्षोगवयश्शरभोगन्धमादनः ।।6.30.26।।दशवानरकोट्यश्चशूराणांयुद्धकाङ्क्षिणाम् ।श्रीमतांदेवपुत्त्राणांशेषंनाख्यातुमुत्सहे ।।6.30.27।।
शक्र (इन्द्र) का नाती युवा अङ्गद अत्यन्त बलवान और अजेय है। मैन्द और द्विविद—दोनों पराक्रमी—अश्विनीकुमारों से उत्पन्न जुड़वाँ हैं। यहाँ वैवस्वत (यम) के पाँच पुत्र भी हैं—गज, गवाक्ष, गवय, शरभ और गन्धमादन—जो मानो प्रलयकाल के समान हैं। और देवपुत्र, श्रीसम्पन्न, युद्ध-लालसा से भरे वीर वानरों की दस करोड़ सेनाएँ हैं; शेष का वर्णन करने में मैं समर्थ नहीं।
Verse 26
नप्ताशक्रस्यदुर्धर्षोबलवानङ्गदोयुवा ।मैन्दश्चद्विविदश्चोभौबलिनावश्विसम्भवौ ।।6.30.25।।पुत्त्रावैवस्वतस्यात्रपञ्चकालान्तकोपमाः ।गजोगवाक्षोगवयश्शरभोगन्धमादनः ।।6.30.26।।दशवानरकोट्यश्चशूराणांयुद्धकाङ्क्षिणाम् ।श्रीमतांदेवपुत्त्राणांशेषंनाख्यातुमुत्सहे ।।6.30.27।।
यह युवा—सिंह के समान गठीला—दशरथ का पुत्र है; इसी ने दूषण का वध किया, और खर तथा त्रिशिरा का भी।
Verse 27
नप्ताशक्रस्यदुर्धर्षोबलवानङ्गदोयुवा ।मैन्दश्चद्विविदश्चोभौबलिनावश्विसम्भवौ ।।6.30.25।।पुत्त्रावैवस्वतस्यात्रपञ्चकालान्तकोपमाः ।गजोगवाक्षोगवयश्शरभोगन्धमादनः ।।6.30.26।।दशवानरकोट्यश्चशूराणांयुद्धकाङ्क्षिणाम् ।श्रीमतांदेवपुत्त्राणांशेषंनाख्यातुमुत्सहे ।।6.30.27।।
पराक्रम में पृथ्वी पर राम के समान कोई नहीं। उन्हीं के द्वारा विराध का वध हुआ, और मृत्यु के समान भयंकर कबन्ध का भी।
Verse 28
पुत्त्रोदशरथस्यैषसिंहसंहनोयुवा ।दूषणोनिहतोयेनखरश्चत्रिशिरास्तथा ।।6.30.28।।
यह युवा—सिंह के समान गठीला—दशरथ का पुत्र है; इसी ने दूषण का वध किया, और खर तथा त्रिशिरा का भी।
Verse 29
नास्तिरामस्यसदृशोविक्रमेभुविकश्चन ।विराधोनिहतोयेनकबन्धश्चान्तकोपमः ।।6.30.29।।
पराक्रम में पृथ्वी पर राम के समान कोई नहीं। उन्हीं के द्वारा विराध का वध हुआ, और मृत्यु के समान भयंकर कबन्ध का भी।
Verse 30
वक्तुंनशक्तोरामस्यनरःकश्चिद्गुणान् क्षितौ ।जनस्थानगतायेनयावन्तोराक्षसाहताः ।।6.30.30।।
पृथ्वी पर कोई भी मनुष्य श्रीराम के गुणों का वर्णन करने में समर्थ नहीं है—जिन्होंने जनस्थान पर चढ़ आए उन समस्त राक्षसों का संहार किया।
Verse 31
लक्ष्मणश्चात्रधर्मात्मामातङ्गानामिवर्षभः ।यस्यबाणपथंप्राप्यनजीवेदपिवासवः ।।6.30.31।।
यहाँ धर्मात्मा लक्ष्मण भी हैं—हाथियों में श्रेष्ठ वृषभ के समान। जिनके बाण-पथ में आकर वासव (इन्द्र) भी जीवित न रह सके।
Verse 32
श्वेतोज्योतिर्मुखश्चात्रभास्करस्यात्मसम्भवौ ।वरुणस्यचपुत्त्रोऽन्योःहेमकूटःप्लवङ्गमः ।।6.30.32।।विश्वकर्मसुतोवीरोनलःप्लवगसत्तमः ।विक्रान्तोबलवानत्रवसुपुत्रस्सदुर्धरः ।।6.30.33।।
यहाँ श्वेत और ज्योतिर्मुख भी हैं—भास्कर (सूर्य) से उत्पन्न। तथा वरुण के एक अन्य पुत्र, वानर हेमकूट भी हैं।
Verse 33
श्वेतोज्योतिर्मुखश्चात्रभास्करस्यात्मसम्भवौ ।वरुणस्यचपुत्त्रोऽन्योःहेमकूटःप्लवङ्गमः ।।6.30.32।।विश्वकर्मसुतोवीरोनलःप्लवगसत्तमः ।विक्रान्तोबलवानत्रवसुपुत्रस्सदुर्धरः ।।6.30.33।।
यहाँ विश्वकर्मा के पुत्र, वीर नल—वानरों में श्रेष्ठ—उपस्थित हैं। और यहाँ वसु के पुत्र दुर्धर भी हैं—पराक्रमी और बलवान।
Verse 34
राक्षसानांवरिष्ठश्चतवभ्रातावीभीषणः ।प्रतिगृह्यपुरींलङ्कांराघवस्यहितेरतः ।।6.30.34।।
राक्षसों में श्रेष्ठ तुम्हारा भ्राता विभीषण लंका-नगरी को स्वीकार करके राघव के हित में निरत रहता है।
Verse 35
इतिसर्वंसमाख्यातंतवेदंवानरंबलम् ।सुवेलेऽधिष्ठितंशैलेशेषकार्येभवान्गतिः ।।6.30.35।।
इस प्रकार मैंने तुम्हें यह समस्त वानर-बल बता दिया है, जो सुवेल पर्वत पर स्थित है। शेष कार्य के विषय में अब तुम्हीं मार्ग-निर्णायक हो।
The pivotal action is the strategic-ethical ultimatum: before Rāma reaches Laṅkā’s ramparts, either return Sītā or commit to war. Rāvaṇa’s refusal—despite the prospect of cosmic opposition—dramatizes a choice where pride and possession override restorative justice.
The chapter teaches that power without self-correction becomes self-endangering: intelligence reports and counsel can clarify reality, but leadership must be willing to realign with dharma. It also highlights disciplined restraint as strength—Rāma’s camp releases the spy, signaling controlled authority rather than uncontrolled retaliation.
Suvela mountain is marked as the allied encampment and staging ground; Laṅkā’s gateway and ramparts (prākāra/dvāra) define the imminent siege line; the Mahārṇava (ocean) and its rock-and-stone filling allude to the bridgework enabling the invasion corridor.
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