Ramayana Yuddha Kanda Sarga 2
Yuddha KandaSarga 225 Verses

Sarga 2

युद्धकाण्डे द्वितीयः सर्गः — Sugriva’s Counsel: From Grief to Strategy (Bridge to Lanka)

युद्धकाण्ड

इस सर्ग में सुग्रीव शोकाकुल राम को निरन्तर उपदेश देते हैं। वे कहते हैं कि क्षत्रिय-नायक के लिए ऐसा शोक शोभा नहीं देता; शोक शौर्य को क्षीण करता है और कार्य-सिद्धि का नाश करता है। इसलिए वे राम से निराशा त्यागकर धैर्य, तेज और आवश्यकता पड़ने पर संयत क्रोध धारण करने का आग्रह करते हैं। फिर सुग्रीव तर्कपूर्वक बताते हैं कि सीता का स्थान ज्ञात है और त्रिकूट पर्वत पर स्थित लंका भी निश्चित है; अतः निष्क्रियता का कोई कारण नहीं। वे वानर-नायकों की सामर्थ्य और उत्साह का स्मरण कराते हैं—वे राम के कार्य के लिए अग्नि में भी प्रवेश करने को तत्पर हैं। सुग्रीव का मुख्य निष्कर्ष यह है कि वरुण के धाम समान भयंकर समुद्र को पार किए बिना लंका पर विजय नहीं हो सकती; इसलिए पहले समुद्र पर सेतु-निर्माण आवश्यक है। सेतु बनते ही और सेना के पार उतरते ही विजय को लगभग सुनिश्चित मानना चाहिए—वे यही विजय-मानदण्ड बार-बार रखते हैं। अंत में शुभ निमित्तों का संकेत देकर वे आश्वस्त करते हैं कि राम के धनुष उठाते ही तीनों लोकों में कोई शत्रु उनका सामना नहीं कर सकता।

Shlokas

Verse 1

तंतुशोकपरिद्यूनंरामंदशरथात्मजम् ।उवाचवचनंश्रीमान् सुग्रीवश्शोकनाशनम् ।।।।

शोक से क्षीण दशरथनन्दन राम से श्रीमान् सुग्रीव ने शोक का नाश करने वाले वचन कहे।

Verse 2

किंत्वंसन्तप्यसेवीर यथान्यःप्राकृतस्तथा ।मैवंभूस्त्यजसन्तापंकृतघ्नइवसौहृदम् ।।।।

हे वीर! तुम साधारण मनुष्य की भाँति क्यों शोक से जलते हो? ऐसा मत हो; इस संताप को त्याग दो, जैसे कृतघ्न व्यक्ति मित्रता को छोड़ देता है॥

Verse 3

सन्तापस्यचतेस्थानंनहिपश्यामिराघव ।प्रवृत्तावुपलब्धायांज्ञातेचनिलयेरिपोः ।।।।

राघव! अब तुम्हारे लिए शोक का कोई स्थान मैं नहीं देखता; आवश्यक उपाय मिल गया है और शत्रु का निवास-स्थान भी ज्ञात हो गया है॥

Verse 4

मतिमान्शास्त्रवित्प्राज्ञःपण्डितश्चासिराघव ।त्यजेमांपापिकांबुद्धिंकृतात्मेवार्थदूषणीम् ।।।।

राघव! तुम बुद्धिमान, शास्त्रज्ञ, प्राज्ञ और पण्डित हो। इस पापमयी बुद्धि को त्याग दो—जैसे संयमी पुरुष अर्थ को दूषित करने वाली वृत्ति को छोड़ देता है॥

Verse 5

समुद्रंलङ्घयित्वातुमहानक्रसमाकुलम् ।लङ्कामारोहयिष्यामोहनिष्यामश्चतेरिपुम् ।।।।

महान् मगरों से भरे समुद्र को पार करके हम लंका पर चढ़ेंगे और तुम्हारे शत्रु का वध करेंगे॥

Verse 6

निरुत्साहस्यदीनस्यशोकपर्याकुलात्मनः ।सर्वार्थाव्यवसीदन्तिव्यसनंचाधिगच्छति ।।।।

जिसका उत्साह नष्ट हो गया है, जो दीन है और शोक से जिसका चित्त व्याकुल है—उसके सब कार्य विफल हो जाते हैं और विपत्ति उसे आ घेरती है।

Verse 7

इमेशूरास्समर्थाश्चसर्वनोहरियूथपाः ।त्वत्प्रियार्थंकृतोत्साहाःप्रवेष्टुमपिपावकम् ।एषांहर्षेणजानामितर्कश्चास्मिन् दृढोमम ।।।।

ये हमारे सभी वानर-यूथपति शूर और समर्थ हैं। आपके प्रिय हेतु उत्साहित होकर अग्नि में भी प्रवेश करने को तत्पर हैं। इनके हर्ष से मैं जानता हूँ, और इस विषय में मेरा अनुमान दृढ़ है।

Verse 8

विक्रमेणसमानेष्येसीतांहत्वायथारिपुम् ।रावणंपापकर्माणंतथात्वंकर्तुमर्हसि ।।।।

पराक्रम से शत्रु को मारकर हम सीता को वापस ले आएँगे—पापकर्मी रावण का वध करके। आप ऐसा करने योग्य हैं कि यह कार्य सिद्ध हो।

Verse 9

सेतुरत्रयथाबध्येद्यथापश्येमतांपुरीम् ।तस्यराक्षसराजस्यतथात्वंकुरुराघव ।।।।

हे राघव! ऐसा प्रबंध करो कि यहाँ सेतु बाँधा जाए और हम उस राक्षसराज की पुरी को देख सकें।

Verse 10

दृष्टवातांतुपुरींलङ्कांत्रिकूटशिखरेस्थिताम् ।हतंचरावणंयुद्धेदर्शनावधारय ।।।।

त्रिकूट पर्वत-शिखर पर स्थित उस लङ्का-नगरी को देखकर ही, उसी दर्शन से यह निश्चय कर लो कि युद्ध में रावण मारा गया है।

Verse 11

अबध्वासागरेसेतुंघोरेचतुवरुणालये ।लङ्कांनमर्दितुंशक्यासेन्द्रैरपिसुरासुरैः ।।।।

भयानक समुद्र—जो वरुण का निवास है—उस पर सेतु बाँधे बिना, इन्द्र सहित देव और असुर भी लङ्का को रौंद नहीं सकते।

Verse 12

सेतुर्बद्धस्समुद्रेचयावल्लङ्कास्समीपतः ।।।।सर्वंतीर्णंचमेसैन्यंजितमित्युपधारय ।इमेहिसमरेवीराहरयःकामरूपिण ।।।।

जब समुद्र पर सेतु बनकर लङ्का के निकट तक पहुँच जाए और मेरी सारी सेना पार उतर जाए, तब विजय को निश्चित मानो; क्योंकि ये वानर-वीर युद्ध में पराक्रमी हैं और इच्छानुसार रूप धारण कर सकते हैं।

Verse 13

सेतुर्बद्धस्समुद्रेचयावल्लङ्कास्समीपतः ।।6.2.12।।सर्वंतीर्णंचमेसैन्यंजितमित्युपधारय ।इमेहिसमरेवीराहरयःकामरूपिण ।।6.2.13।।

समुद्र पर सेतु लङ्का के निकट तक बँध जाए और मेरा समस्त बल पार उतर जाए, तो विजय को सिद्ध समझो; ये वानर-वीर रण में पराक्रमी हैं और इच्छानुसार रूप धारण करते हैं।

Verse 14

तदलंविक्लबांबुद्धिम् राजन सर्वार्थनाशनीम् ।पुरुषस्यहिलोकेऽस्मिन् शोकश्शौर्यापकर्षणः ।।।।

अतः हे राजन्, सब प्रयोजनों का नाश करने वाली इस विचलित बुद्धि को त्याग दीजिए। इस लोक में शोक पुरुष के शौर्य को क्षीण कर देता है।

Verse 15

यत्तुकार्यंमनुष्येणशौण्डीर्यमवलम्बता ।अस्मिन् कालेमहाप्राज्ञसत्त्वमातिष्ठतेजसा ।।।।

मनुष्य को जो भी कर्तव्य करना हो, वह वीर-निश्चय का आश्रय लेकर ही सिद्ध होता है। हे महाप्राज्ञ, इस समय तेज के साथ धैर्य और साहस में स्थिर रहिए।

Verse 16

शूराणांहिमनुष्याणांत्वद्विधानांमहात्मनाम् ।विनष्टेवाप्रणष्टेवाशोकस्सर्वार्थनाशनः ।।।।

आप जैसे महात्मा वीर पुरुषों के लिए, नष्ट या खोई हुई वस्तु पर शोक करना भी सब प्रयोजनों का नाश करने वाला होता है।

Verse 17

तत्त्वंबुद्धिमतांश्रेष्ठस्सर्वशास्त्रार्थकोविदः ।मद्विधैस्सचिवैस्सार्थमरिंजेतुमिहार्हसि ।।।।

आप बुद्धिमानों में श्रेष्ठ और समस्त शास्त्रों के अर्थ में निपुण हैं। मेरे जैसे मंत्रियों और सहायकों के साथ यहाँ शत्रु को जीतने योग्य हैं।

Verse 18

नहिपश्याम्यहंकंचित् त्रिषुलोकेषुराघव ।गृहीतधनुषेयस्तेतिष्ठेदभिमुखोरणे ।।।।

हे राघव, जब आप धनुष धारण कर लेते हैं, तब तीनों लोकों में भी ऐसा कोई नहीं दिखता जो रण में आपके सामने टिक सके।

Verse 19

वानरेषुसमासक्तंनतेकार्यंविपत्स्यते ।अचिराद्द्रक्ष्यसेसीतांतीर्त्वासागरमक्ष्यम् ।।।।

वानरों को यह कार्य सौंपा गया है, इसलिए तुम्हारा प्रयत्न विफल नहीं होगा। अजेय समुद्र को पार करके तुम शीघ्र ही सीता को देखोगे॥

Verse 20

तदलंशोकमालम्ब्यक्रोधमालम्बभूपते ।निश्चेष्टाःक्षत्रियामन्दास्सर्वेचण्डस्यबिभ्यति ।।।।

हे भूपते! शोक का आश्रय अब पर्याप्त हुआ; धर्मयुक्त क्रोध का आश्रय लो। निष्क्रिय क्षत्रिय मंद पड़ जाते हैं, परन्तु चण्ड और दृढ़ पुरुष से सब भय खाते हैं।

Verse 21

लङ्घनार्थंचघोरस्यसमुद्रस्यनदींपतेः ।सहास्माभिरिहोपेतस्सूक्ष्मबुद्धिर्विचारय ।।।।

हे सूक्ष्मबुद्धि! नदियों के स्वामी इस घोर समुद्र को लाँघने के उपाय पर विचार करने हेतु हमारे साथ यहाँ आओ।

Verse 22

लङ्घितेतस्यतैस्सैन्यंजितमित्युपधारय ।सर्वंतीर्णंचमेसैन्यंजितमित्यवधार्यताम् ।।।।

यह मान लो—यदि वे उसे लाँघ लें, तो विजय प्राप्त ही समझो। और यह निश्चय कर लो कि मेरी समस्त सेना पार उतर गई तो सफलता सुनिश्चित है।

Verse 23

इमेहिहरयश्शूरास्समरेकामरूपिणः ।तानरीन्विधमिष्यन्तिशिलापादपवृष्टिभिः ।।।।

ये वानर शूरवीर हैं; संग्राम में इच्छानुसार रूप धारण करते हैं। ये शिला, वृक्ष और पर्वत-खण्डों की वर्षा से शत्रुओं को चूर्ण कर देंगे।

Verse 24

कथञ्चित्सन्तरिष्यामस्तेवयंवरुणालयम् ।हतमित्येवतंमन्येयुद्धेशत्रुनिबर्हण ।।।।

हे शत्रुनिबर्हण! हम किसी भी उपाय से वरुणालय समुद्र को पार कर लेंगे; और मैं उस शत्रु को युद्ध में पहले से ही मरा हुआ मानता हूँ।

Verse 25

किमुक्त्वाबहुधाचापिसर्वथाविजयीभवान् ।निमित्तानिचपश्यामिमनोमेसम्प्रहृष्यति ।।।।

बहुत कहने से क्या लाभ? आप सर्वथा विजयी होंगे। मैं शुभ निमित्त देख रहा हूँ; मेरा मन हर्ष से भर उठा है।

Frequently Asked Questions

The dilemma is leadership under grief: whether Rāma should remain inwardly consumed by sorrow or reassert kṣatriya responsibility. Sugrīva urges the actionable choice—abandon despondency and proceed with the campaign, anchored in known intelligence about Sītā and Laṅkā.

Sorrow is portrayed as sarvārtha-nāśinī—destroying purpose, courage, and outcomes—whereas disciplined courage (tejas/sattva) restores agency. Ethical victory begins with inner governance before external conquest.

Laṅkā is described as situated on Trikūṭa’s peak, and the samudra is named Varuṇa’s abode and “lord of rivers,” underscoring the cultural sacrality of the ocean and the practical necessity of constructing the setu to reach Laṅkā.

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