Ramayana Yuddha Kanda Sarga 14
Yuddha KandaSarga 1422 Verses

Sarga 14

विभीषणोपदेशः (Vibhīṣaṇa’s Counsel to Rāvaṇa and the Rākṣasa Court)

युद्धकाण्ड

इस सर्ग में लंका की सभा में साध्य-असाध्य, धर्म-अधर्म और राज्यनीति पर गंभीर वाद-विवाद होता है। रावण का मत और कुम्भकर्ण की गर्जना सुनकर विभीषण नीति-युक्त उपदेश देते हैं कि राम-विरोध का उद्देश्य असंभव है और अधर्मपूर्ण संकल्प से स्वर्ग-सदृश सफलता नहीं मिल सकती। वे दृष्टांत देते हैं कि जो तैरना नहीं जानता वह समुद्र पार नहीं कर सकता, और बल-तुलना करके धर्मनिष्ठ श्रीराम की रण-श्रेष्ठता और पराक्रम को स्थापित करते हैं। विभीषण बार-बार आग्रह करते हैं कि लंका पर विपत्ति आने से पहले सीता को तुरंत श्रीराम को लौटा दिया जाए, नहीं तो वज्र के समान बाणों से लंका के नायकों के सिर कट जाएंगे। प्रहस्त दर्प से कहता है कि वह देवताओं या किसी से नहीं डरता; तब विभीषण और कठोर चेतावनी देते हुए बताते हैं कि राघव के सामने राक्षस-वीर भी टिक नहीं सकते। फिर चर्चा राजकीय रोग पर आती है—रावण को व्यसन-ग्रस्त, आवेगी और अपने ही कर्मों से बने बंधन में फँसा हुआ, मानो सहस्र-फण वाले सर्प से जकड़ा हुआ कहा गया है। अंत में मंत्री-नीति का सूत्र आता है कि शत्रु-बल, अपनी क्षमता और राज्य की वृद्धि-हानि की स्थिति को तौलकर, केवल राजा के कल्याण हेतु ही विवेकपूर्ण सलाह देनी चाहिए।

Shlokas

Verse 1

निशाचरेन्द्रस्यनिशम्यवाक्यंसकुम्भकर्णस्यचगर्जितानि ।विभीषणोराक्षसराजमुख्यमुवाचवाक्यंहितमर्थयुक्तम् ।।।।

निशाचरों के स्वामी के वचन और कुम्भकर्ण की गर्जनाएँ सुनकर, विभीषण ने राक्षस-राजाओं में श्रेष्ठ रावण से हितकर और अर्थयुक्त वाणी में कहा।

Verse 2

न्तरभोगराशिश्चिन्ताविषस्सुस्मिततीक्ष्णदंष्ट्रः ।पञ्चाङ्गुलीपञ्चशिरोऽतिकायस्सीतामहाहिस्तवकेनराजन् ।।।।

हे राजन्! तुमने सीता को क्यों अपनाया? वह मानो महा-सर्पिणी है—बाहुओं के बीच कुंडलित भोगों-सी, शोक-रूप विष वाली, मधुर मुस्कान में छिपे तीक्ष्ण दाँतों वाली, और पाँच उँगलियों के पाँच फनों-सी अतिविशाल।

Verse 3

यावन्नलङ्कांसमभिद्रवन्तिवलीमुखाःपर्वतकूटमात्राः ।दष्ट्रायुधाश्चैवनखायुधाश्चप्रदीयतांदाशरथायमैथिली ।।।।

लङ्का पर टूट पड़ने से पहले—पर्वत-शिखरों जितने विशाल, दाँत और नखों को शस्त्र बनाए वानर-समूह—मैथिली को दाशरथि राम को लौटा दिया जाए।

Verse 4

यावन्नगृह्णन्तिशिरांसिबाणारामेरिताराक्षसपुङ्गवानाम् ।वज्रोपमावायुसमानवेगाःप्रदीयतांदाशरथायमैथिली ।।।।

राघव के छोड़े हुए वज्र-तुल्य, वायु-वेग से चलने वाले बाण जब तक राक्षस-श्रेष्ठों के सिरों को काटने न लगें, उससे पहले मैथिली को दाशरथि राम को सौंप दिया जाए।

Verse 5

नकुम्भकर्णेन्द्रजितौचराजंस्तथामहापार्श्वमहोदरौवा ।निकुम्भकुम्भौचतथाऽतिकायःस्थातुंनशक्तायुधिराघवस्य ।।।।

हे राजन्! युद्ध में राघव के सामने न कुम्भकर्ण और न इन्द्रजित, न महापार्श्व और न महोदर, न निकुम्भ और न कुम्भ, तथा न ही अतिकाय—इनमें से कोई भी टिक नहीं सकेगा।

Verse 6

जीवंस्तुरामस्यनमोक्ष्यसेत्वंगुप्तस्सवित्राप्यथवामरुद्भि: ।नवासवस्याङ्कगतोनमृत्योर्नभोनपाताळमनुप्रविष्टः ।।।।

तू राम के हाथ से जीवित नहीं छूटेगा—चाहे सूर्य या मरुत् तुझे छिपाकर रखें। इन्द्र की गोद में बैठकर भी नहीं, यम की शरण में भी नहीं; न आकाश में प्रवेश करके, न पाताल में उतरकर।

Verse 7

निशम्यवाक्यंतुविभीषणस्यततःप्रहस्तोवचनंबभाषे ।ननोभयंविद्मनदैवतेभ्योनदानवेभ्योऽप्यथवाकुतश्चित् ।।।।

विभीषण के वचन सुनकर प्रहस्त बोला—“हमें भय का ज्ञान नहीं; न देवताओं से, न दानवों से भी, और न किसी से कहीं से।”

Verse 8

नयक्षगन्धर्वमहोरगेभ्योभयंनसंख्येपतगोरगेभ्यः ।कथंनुरामाद्भविताभयंनोनरेन्द्रपुत्रात्समरेकदाचित् ।।।।

हमें यक्षों, गन्धर्वों और महा-सर्पों से युद्ध में भय नहीं; न पक्षियों से, न सरीसृपों से। फिर राजा के पुत्र राम से हमें युद्ध में कभी भय कैसे होगा?

Verse 9

प्रहस्तवाक्यंत्वहितंनिशम्यविभीषणोराजहितानुकाङ्क्षी ।ततोमहार्थंवचनंबभाषेधर्मार्थकामेषुनिविष्टबुद्धि:।। ।।

प्रहस्त के अहितकर वचन सुनकर, राजा के सच्चे हित की कामना करने वाले विभीषण ने—धर्म, अर्थ और काम में स्थिर बुद्धि रखकर—तब गम्भीर अर्थ वाला उत्तर कहा।

Verse 10

प्रहस्त: राजाचमहोदरश्चत्वंकुम्भकर्णश्चयथाऽर्थजातम् ।ब्रवीतरामंप्रतितन्नशक्यंयथागतिस्स्वर्गमधर्मबुद्धेः ।।।।

प्रहस्त, हे राजन्, महोदर, तुम और कुम्भकर्ण—राम के विरुद्ध जो-जो उपाय तुम कहते हो, वह सिद्ध नहीं हो सकता; जैसे अधर्म-बुद्धि वाला पुरुष स्वर्ग-गति को नहीं पाता।

Verse 11

वधस्तुरामस्यमयात्वयाचप्रहस्तसर्वैरपिराक्षसैर्वा ।कथंभवेदर्थविशारदस्यमहार्णवंतर्तुमिवाप्लवस्य ।।।।

प्रहस्त, राम का वध मेरे द्वारा, तुम्हारे द्वारा या सब राक्षसों के द्वारा भी कैसे हो सकता है? वह तो अर्थ-विशारद है; यह तो जैसे तैरना न जानने वाला विशाल समुद्र को पार करना चाहे।

Verse 12

धर्मप्रधानस्यमहारथस्यइक्ष्वाकुवंशप्रभवस्यराज्ञः ।पुरोस्यदेवाश्चतथाविधस्यकृत्येषुशक्तस्यभवन्तिमूढा ।।।।

इक्ष्वाकु-वंश में उत्पन्न, महारथी, धर्म को प्रधान मानने वाले और कार्य-सिद्धि में समर्थ ऐसे उस राजा के सामने देवता भी कभी मोहित हो गए थे; फिर तुम उसके विरुद्ध क्या कर सकोगे?

Verse 13

तीक्ष्णानतायत्तवकङ्कपत्रादुरासदाराघवविप्रमुक्ताः ।भित्वाशरीरंप्रविशन्तिबाणाःप्रहस्ततेनैवविकत्थसेत्वम् ।।।।

प्रहस्त, राघव के छोड़े हुए तीक्ष्ण, कङ्क-पंखों से युक्त और दुर्निवार बाण तुम्हारे शरीर को भेदकर भीतर प्रवेश करेंगे; यह जानते हुए भी तुम क्यों डींग हाँकते हो?

Verse 14

भित्त्वानतावत्प्रविशन्तिकायंप्राणान्तिकास्तेऽशनितुल्यवेगाः ।शिताश्शराराघवविप्रमुक्ताःप्रहस्ततेनैवविकत्थसेत्वम् ।।।।

प्रहस्त, राघव के छोड़े हुए वे तीखे बाण—वज्र के समान वेग वाले, प्राणान्तक—अभी तक तुम्हारे शरीर को भेदकर भीतर नहीं घुसे हैं; इसी कारण तुम अब भी डींग हाँकते हो।

Verse 15

नरावणोनातिबलस्त्रिशीर्षोनकुम्भकर्णोऽस्यसुतोनिकुम्भः ।नचेन्द्रजिद्दाशरधिंप्रसोढुंत्वंवारणेशक्रसमंसमर्थ:।। ।।

न रावण, न अति-बलवान त्रिशीर्ष, न कुम्भकर्ण का पुत्र निकुम्भ, और न ही इन्द्रजित—कोई भी शक्र-सम दाशरथि को रण में सह नहीं सकता; फिर तुम कैसे समर्थ होगे?

Verse 16

देवान्तकोवापिनरान्तकोवातथातिकायोऽतिरथोमहात्मा ।आकम्पनश्चाद्रिसमानसारःस्थातुंनशक्तायुधिराघवस्य ।।।।

देवान्तक हो या नरान्तक, अथवा अतिकाय, महात्मा अतिरथ, और पर्वत-सम दृढ़ आकम्पन—इनमें से कोई भी राघव के सामने युद्ध में टिक नहीं सकता।

Verse 17

अयंचराजाव्यसनाभिभूतोमित्रैरमित्रप्रतिमैर्भवद्भि: ।अन्वास्यतेराक्षसनाशनार्थेतीक्ष्णःप्रकृत्याह्यसीक्षयकारी ।।।।

यह राजा व्यसनों से अभिभूत है; और तुम जैसे ‘मित्र’ जो शत्रु-सदृश हो, इसके साथ लगे रहते हो। स्वभाव से तीक्ष्ण और अविचारी होकर यह राक्षसों के विनाश की ओर बढ़ रहा है।

Verse 18

अनन्तभोगेनसहस्रमूर्थ्नानागेनभीमेनमहाबलेव ।बलात्परिक्षिप्तमिमंभवन्तोराजानमुत्क्षिप्यविमोचयन्तु ।।।।

यह राजा अनन्त कुण्डलियों वाले, सहस्र-फणधारी, भीषण और महाबली नाग द्वारा बलपूर्वक जकड़ा गया है। तुम लोग इसे उठाकर, बल से उस बन्धन से मुक्त करो।

Verse 19

यावद्धिकेशग्रहणातसुहृद्भि: समेत्यसर्वैःपरिपूर्णकामैः ।निगृह्यराजापरिरक्षितव्योभूतैर्यथाभीमबलैर्गृहीतः ।।।।

जब तक आवश्यक हो—केश पकड़कर भी—सभी हितैषी मित्र एकत्र होकर, अपनी कामना पूर्ण करने हेतु, राजा को रोककर उसकी रक्षा करें; जैसे भयंकर बलवान भूतों द्वारा पकड़े गए मनुष्य को छुड़ाया जाता है।

Verse 20

सुवारिणाराघवसागरेणप्रच्छाद्यमानस्तरसाभवद्भि: ।युक्तस्त्वयंतारयितुंसमेत्यकाकुत्स्थपातालमुखेपतन्सः ।।।।

वह तुम्हारे द्वारा शीघ्र ही ‘राघव-सागर’ रूपी उत्तम जल में डूबाया जा रहा है, मानो काकुत्स्थ ही पाताल का मुख हो और वह उसमें गिर रहा हो; अतः तुम सबका एकत्र होकर उसे पार उतारना और उस विनाश से छुड़ाना उचित है।

Verse 21

इदंपुरस्यास्यसराक्षसस्यराज्ञश्चपथ्यंससुहृज्जनस्य ।सम्यग्घिवाक्यंस्वमतंब्रवीमिनरेन्द्रपुत्रायददामपत्नीम् ।।।।

यह इस नगर के, समस्त राक्षसों के, राजा के और उसके सुहृदों के लिए हितकर परामर्श है। मैं अपना सम्यक् मत कहता हूँ—राजा के पुत्र को उसकी पत्नी लौटा दी जाए।

Verse 22

परस्यवीर्यंस्वबलंचबुध्वास्थानंक्षयंचैवतथैववृद्धिम् ।तथास्वपक्षेप्यनुमृश्यबुध्वावदेत् क्षमंस्वामिहितंसमन्त्री ।।।।

शत्रु के पराक्रम और अपने बल को, तथा अपनी स्थिति, हानि और वृद्धि को भली-भाँति जानकर, और अपने पक्ष का भी विचार करके, मंत्री को चाहिए कि वह स्वामी के हित में उचित और कल्याणकारी परामर्श दे।

Frequently Asked Questions

The pivotal action is Vibhīṣaṇa’s insistence that Sītā must be returned to Rāma immediately for the welfare of Laṅkā and its people—framing restitution as the only ethically and strategically viable course against impending destruction.

The upadeśa is that power without deliberation is self-destructive: a minister must counsel by measuring enemy valour, one’s own strength, and the state’s rise or decline, and must prioritize the king’s true welfare over pride-driven escalation.

Laṅkā is the primary political setting, while ‘the great ocean’ and ‘pātāla (underworld)’ appear as instructive metaphors to convey impossibility and ruin; the approaching vānaras function as a cultural-military landmark of the siege context.

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