
रामरावणयोर्युद्धवैषम्यं तथा रावणशिरश्छेदनम् (Rama–Ravana Duel Intensifies; Ravana’s Heads Severed and Reappear)
युद्धकाण्ड
इस 110वें सर्ग में श्रीराम और रावण का द्वंद्व समस्त प्राणियों के लिए अद्भुत दृश्य बन जाता है। देवगण, सिद्ध-चारण और गंधर्व विस्मय तथा चिंता के साथ युद्ध देखते हैं। दोनों रथ तीव्र गति से घूमते, आगे बढ़ते और पीछे हटते हैं; सारथियों की कुशलता और प्रतिघात की समानता स्पष्ट होती है। रावण मेघगर्जन-से बाणों से राम के सारथि मातलि को लक्ष्य करता है, पर मातलि तनिक भी विचलित नहीं होता। तब श्रीराम अपने सहायक के अपमान से धर्मयुक्त क्रोध में प्रत्युत्तर देते हैं, व्यक्तिगत पीड़ा से नहीं। बाणों और भारी आयुधों—गदा, मुद्गर, लोहे के दंड आदि—की घोर मार से जगत् में क्षोभ फैलता है: समुद्र मथने लगते हैं, पातालवासी व्याकुल होते हैं, पृथ्वी कांपती है, सूर्य का तेज मंद पड़ता है और वायु थम-सी जाती है। देव और ऋषि गो-ब्राह्मणों के कल्याण हेतु मंगलपाठ करते हुए राम-विजय का आह्वान करते हैं, जिससे युद्ध का धर्ममय लक्ष्य प्रकट होता है। श्रीराम रावण का एक सिर काट देते हैं, पर उसी क्षण दूसरा सिर उग आता है; बार-बार शिरच्छेदन भी राक्षसराज का अंत नहीं कर पाता। सर्वास्त्र-निपुण राम विचार करते हैं कि जो बाण पहले निर्णायक होते थे, वे अब निष्फल-से क्यों प्रतीत हो रहे हैं। सर्ग के अंत में युद्ध बिना विराम जारी रहता है और मातलि कुछ कहने को उद्यत होते हैं—मानो रावण के प्राणाधार और उसके वध के उचित उपाय का रहस्य बताने वाले हों।
Verse 1
तौतथायुध्यमानौतुसमरेरामरावणौ ।ददृशुस्सर्वभूतानिविस्मितेनान्तरात्मना ।।।।
इस प्रकार रणभूमि में राम और रावण युद्ध कर रहे थे; उन्हें देखकर समस्त प्राणी अंतःकरण में विस्मित हो उठे।
Verse 2
अर्धयन्तौतुसमरेतयोस्तौस्यन्दनोत्तमौ ।परस्परमभिक्रुद्धौपरस्परमभिद्रुतौ ।।।।
उस संग्राम में उन दोनों के श्रेष्ठ रथ एक-दूसरे की ओर बढ़े; दोनों योद्धा परस्पर क्रुद्ध होकर अडिग निश्चय से एक-दूसरे पर टूट पड़े।
Verse 3
परस्परवधेयुक्तौघोररूपौबभूवतुः ।मण्डलानि च वीधीश्चगतप्रत्यागतानि च ।।।।दर्शयन्तौबहुविधांसूतसामर्थ्यजांगतिम् ।
एक-दूसरे का वध करने में तत्पर वे दोनों भयानक रूप धारण कर बैठे। वे रथों को मंडलाकार घुमाते, विविध मार्गों में दौड़ाते, आगे-पीछे आते-जाते, सारथि-कौशल से उत्पन्न अनेक प्रकार की गतियाँ दिखा रहे थे।
Verse 4
अर्धयन्रावणंरामोराघवंचापिरावणः ।।।।गतिवेगंसमापन्नौप्रतिवेगप्रवर्तने ।
राम ने रावण पर प्रहार किया और रावण ने भी राघव पर प्रत्याघात किया; प्रतिवेग के उस प्रवर्तन में दोनों के अस्त्र-वेग से युद्ध तीव्र गति को प्राप्त हुआ।
Verse 5
क्षिपतोश्शरजालानितयोस्तौस्यन्दनोत्तमौ ।।।।चेरतुस्सम्युगमहीं सासारौ जलदाविव ।
दोनों जब बाणों के जाल बरसा रहे थे, तब वे दोनों उत्तम रथ रणभूमि में ऐसे विचरते थे मानो धाराएँ बरसाते दो मेघ हों।
Verse 6
दर्शयित्वातदातौतुगतिंबहुविधांरणे ।।।।परस्परस्याभिमुखौपुनरेव च तस्थतुः ।
रण में अनेक प्रकार की गतियाँ दिखाकर वे दोनों फिर एक-दूसरे के सम्मुख आकर ठहर गए।
Verse 7
धुरंधुरेणरथयोर्वक्त्रंवक्त्रेणवाजिनाम् ।।।।पताकाश्चपताकाभिस्समीयुस्स्थितयोस्तदा ।
तब दोनों रथ रुककर धुरी से धुरी सट गए; घोड़ों के मुख मुख से मिलते-से हो गए; और ध्वज ध्वजों से ऐसे आ मिले मानो दोनों एक ही हो गए हों।
Verse 8
रावणस्यततोरामोधनुर्मुस्तैश्शितैश्शरैः ।।।।चतुर्भिश्चतुरोदीप्तान्हयान्प्रत्यपसर्पयत् ।
तब राम ने धनुष को दृढ़ मुट्ठी में थामकर चार तीक्ष्ण, दीप्तिमान बाण छोड़े और रावण के चारों घोड़ों को पीछे हटा दिया।
Verse 9
सक्रोधवशमापन्नोहयानामपसर्पणे ।।।।मुमोचनिशितान्बाणान्राघवायदशाननः ।
घोड़ों के पीछे हटने से क्रोध में भरकर दशानन ने राघव पर तीखे बाणों की वर्षा कर दी।
Verse 10
सोतिविद्धोबलवतादशग्रीवेणराघवः ।।।।जगाम न विकारं च न चापिव्यथितोऽभवत् ।
बलवान दशग्रीव द्वारा अत्यन्त विद्ध होने पर भी राघव के मुख-मुद्रा में कोई विकार न आया, न ही वे युद्ध में व्यथित हुए।
Verse 11
चिक्षेप च पुनर्भाणान्वज्रपातसमस्वनान् ।।।।सारथिंवज्रहस्तस्यसमुद्दिश्यदशाननः ।
तब वज्रहस्त-सम राम के सारथि (मातलि) को लक्ष्य करके वज्रपात-सा गर्जन करने वाले बाणों को दशानन ने फिर से चलाया।
Verse 12
मातलेस्तुमहावेगाश्शरीरेपतिताश्शराः ।।।।न सूक्ष्ममपिसम्मोहंव्यथांवाप्रददुर्युधि ।
मातलि के शरीर पर महावेग बाण गिरने पर भी युद्ध में उन्हें न रंचमात्र मोह हुआ, न कोई पीड़ा हुई।
Verse 13
तयाधर्षणयाक्रुद्धोमातलेर्नतथात्मनः ।।।।चकारशरजालेनराघवोविमुखंरिपुम् ।
मातलि के उस अपमान से राघव अधिक क्रुद्ध हो उठे, अपने ऊपर हुए आघात से भी नहीं। तब उन्होंने बाणों के जाल से शत्रु को विमुख कर दिया।
Verse 14
विंशतिंत्रिंशतिंषष्टिंशतशोऽथसहस्रशः ।।।।मुमोचराघवोवीरस्सायकान्स्यन्दनेरिपोः ।
तब वीर राघव ने शत्रु के रथ पर बीस-तीस, साठ-साठ, फिर सैकड़ों और सहस्रों की संख्या में बाण छोड़े।
Verse 15
रावणोऽपिततःक्रुद्धोरथस्थराक्षसेश्वरः ।।।।गदामुसलवर्षेणरामंप्रत्यर्दयद्रणे ।
तब रथ पर स्थित राक्षस-राज रावण भी क्रुद्ध हो उठा और गदा तथा मुसलों की वर्षा से रण में राम को पीछे ढकेलने लगा।
Verse 16
तत्प्रवृतंपुनर्युद्धंतुमुलंरोमहर्षणम् ।।।।गदानांमुसलानां च परिघाणांचनिस्स्वनैः ।शराणांपुङ्खवातैश्चक्षुभितास्सप्तसागराः ।।।।
फिर वह युद्ध पुनः प्रवृत्त हुआ—अत्यन्त तुमुल और रोमांचकारी। गदाओं, मुसलों और परिघों के घनघोर नाद से, तथा बाणों के पंखों से उठी वायु के झोंकों से, सातों सागर तक क्षुब्ध हो उठे।
Verse 17
तत्प्रवृतंपुनर्युद्धंतुमुलंरोमहर्षणम् ।।6.110.16।।गदानांमुसलानां च परिघाणांचनिस्स्वनैः ।शराणांपुङ्खवातैश्चक्षुभितास्सप्तसागराः ।।6.110.17।।
फिर वह युद्ध पुनः प्रवृत्त हुआ—अत्यन्त तुमुल और रोमांचकारी। गदाओं, मुसलों और परिघों के घनघोर नाद से, तथा बाणों के पंखों से उठी वायु के झोंकों से, सातों सागर तक क्षुब्ध हो उठे।
Verse 18
क्षुब्दानांसागराणां च पातालतलवासिनः ।व्यथितादानवाःसर्वेपन्नगाश्चसहस्रशः ।।।।
सागरों के क्षुब्ध होने पर पाताल-लोक में रहने वाले प्राणी व्याकुल हो उठे; समस्त दानव और सहस्रों नाग भी पीड़ित हो गए।
Verse 19
चकम्पेमेदिनीकृत्स्नासशैलवनकानना ।भास्करोनिष्प्रभश्चासीन्नवनौचापिमारुतः ।।।।
समस्त पृथ्वी पर्वतों, वनों और उपवनों सहित काँप उठी। सूर्य भी मानो तेजहीन हो गया और पवन तक नहीं बहा।
Verse 20
ततोदेवास्सगन्धर्वास्सिद्धाश्चपरमर्षयः ।चिन्तामापेदिरेसर्वेसकिन्नरमहोरगाः ।।।।
तब देवगण, गन्धर्वों सहित, सिद्ध और परमर्षि, किन्नर तथा महोरग—सबके सब चिन्ता में पड़ गए।
Verse 21
स्वस्तिगोब्राह्मणेभ्योऽस्तुलोकास्तिष्ठन्तुशाश्वताः ।जयतांराघयसङ्ख्येरावणंराक्षसेश्वरम् ।।।।एवंजपन्तोऽपश्यंस्तेदेवास्सर्षिगणास्तदा ।रामरावणयोर्युद्धंसुघोरंरोमहर्षणम् ।।।।
“गौओं और ब्राह्मणों का कल्याण हो; लोक सदा स्थिर रहें; संग्राम में राघव राक्षसेश्वर रावण पर विजय पाएं।” ऐसा जपते हुए देवगण और ऋषिगण ने तब राम-रावण का अत्यन्त घोर, रोमांचकारी युद्ध देखा।
Verse 22
स्वस्तिगोब्राह्मणेभ्योऽस्तुलोकास्तिष्ठन्तुशाश्वताः ।जयतांराघयसङ्ख्येरावणंराक्षसेश्वरम् ।।6.110.21।।एवंजपन्तोऽपश्यंस्तेदेवास्सर्षिगणास्तदा ।रामरावणयोर्युद्धंसुघोरंरोमहर्षणम् ।।6.110.22।।
इस प्रकार जपते हुए देवगण और ऋषिगण ने तब राम-रावण का अत्यन्त घोर, रोमांचकारी युद्ध देखा।
Verse 23
गन्धर्वाप्सरसांसङ्घादृष्टवायुद्धमनूपमम् ।गगनंगगनाकारंसागरस्सागरोपमः ।।।।रामरावणयोर्युद्धंरामरावणयोरिव ।एवंब्रुवन्तोददृशुस्तद्युद्धंरामरावणम् ।।।।
गन्धर्वों और अप्सराओं के समूह उस अनुपम युद्ध को देखकर बोले—“आकाश की उपमा आकाश ही है, और सागर की उपमा सागर ही”; अर्थात् इस संग्राम का कोई सच्चा समान नहीं।
Verse 24
गन्धर्वाप्सरसांसङ्घादृष्टवायुद्धमनूपमम् ।गगनंगगनाकारंसागरस्सागरोपमः ।।6.110.23।।रामरावणयोर्युद्धंरामरावणयोरिव ।एवंब्रुवन्तोददृशुस्तद्युद्धंरामरावणम् ।।6.110.24।।
वे कहते रहे—“राम और रावण का युद्ध राम-रावण के युद्ध के समान ही है।” ऐसा बोलते हुए वे उसी राम-रावण के संग्राम को निहारते रहे।
Verse 25
ततःक्रोधान्महाबासूरघूणांकीर्तिवर्धनः ।सन्धायधनुषारामश्शरमाशीविषोपमम् ।।।।रावणस्यशिरोऽच्छिन्दच्छ्रीमज्ज्वलितकुण्डलम् ।तछचिरःपतितंभूमौदृष्टंइलोकैस्त्रिभिस्तदा ।।।।
तब क्रोध से भरकर महाबाहु, रघुवंश की कीर्ति बढ़ाने वाले श्रीराम ने धनुष पर विषधर-सदृश बाण चढ़ाया और रावण का वह तेजस्वी सिर, जो दहकते कुण्डलों से शोभित था, काट गिराया। वह सिर पृथ्वी पर गिरा और तब तीनों लोकों ने उसे देखा।
Verse 26
ततःक्रोधान्महाबासूरघूणांकीर्तिवर्धनः ।सन्धायधनुषारामश्शरमाशीविषोपमम् ।।6.110.25।।रावणस्यशिरोऽच्छिन्दच्छ्रीमज्ज्वलितकुण्डलम् ।तछचिरःपतितंभूमौदृष्टंइलोकैस्त्रिभिस्तदा ।।6.110.26।।
उन्होंने रावण का वह तेजस्वी सिर, जो ज्वलित कुण्डलों से शोभित था, काट दिया; और वह सिर भूमि पर गिरा, जिसे तब तीनों लोकों ने देखा।
Verse 27
तस्यैवसदृशंचान्यद्रावणस्योत्थितंशिरः ।तत्क्षिप्तंक्षिप्रहस्तेनरामेणक्षिप्रकारिणा ।।।।
उसी के समान रावण का एक और सिर फिर उठ खड़ा हुआ; पर शीघ्रकर्मी, शीघ्रहस्त श्रीराम ने उसे तुरंत काटकर गिरा दिया।
Verse 28
द्वितीयंरावणशिरश्छिन्नंसम्यतिसायकैः ।छिन्नमात्रं च तच्चीर्षंपुनरेवप्रदृश्यते ।।।।
रण में राम के बाणों से रावण का दूसरा सिर भली-भाँति कट गया; पर कटते ही वह सिर फिर उसी क्षण पुनः प्रकट हो गया।
Verse 29
तदप्यशनिसङ्काशैश्छिन्नंरामस्यसायकैः ।एवमेवशतंछिन्नंशिरसांतुल्यवर्चसाम् ।।।।
वह सिर भी राम के वज्र-सम तेजस्वी बाणों से कट गया; इसी प्रकार समान तेज वाले सौ सिर काट डाले गए।
Verse 30
न चैवरावणस्यान्तोदृश्यतेजीवितक्षये ।ततस्सर्वास्त्रविद्वीरःकौसल्यानन्दवर्धनः ।।।।मार्गणैर्बहुभिर्युक्तश्चिन्तयामासराघवः ।
फिर भी रावण के प्राणान्त का कोई लक्षण दिखाई न देता था। तब समस्त अस्त्रों के ज्ञाता, वीर, कौसल्या के आनन्द को बढ़ाने वाले राघव—अनेक बाणों से सुसज्जित होकर भी—विचार करने लगे।
Verse 31
मारीचोनिहतोयैस्तुखरोयैस्तुसदूषणः ।।।।क्रौञ्चावनेविराधस्तुकबन्धोदण्डकेवने ।यैस्सालागिरयोभग्नावाली च क्षुभितोऽम्बुधिः ।।।।त इमेसायकास्सर्वेयुद्धेप्रात्ययिकाममकिनुतत्कारणंयेनरावणेमन्दतेजसः ।।।।
“जिन बाणों से मारीच मारा गया था, और जिनसे दूषण सहित खर का भी नाश हुआ था—”
Verse 32
मारीचोनिहतोयैस्तुखरोयैस्तुसदूषणः ।।6.110.31।।क्रौञ्चावनेविराधस्तुकबन्धोदण्डकेवने ।यैस्सालागिरयोभग्नावाली च क्षुभितोऽम्बुधिः ।।6.110.32।।त इमेसायकास्सर्वेयुद्धेप्रात्ययिकाममकिनुतत्कारणंयेनरावणेमन्दतेजसः ।।6.110.33।।
जिन बाणों से क्रौञ्चवन में विराध का वध हुआ और दण्डकारण्य में कबन्ध गिर पड़ा; जिनसे साल-वृक्ष और पर्वत तक चूर-चूर हुए; जिनसे वाली मारा गया और समुद्र भी क्षुब्ध हो उठा—।
Verse 33
मारीचोनिहतोयैस्तुखरोयैस्तुसदूषणः ।।6.110.31।।क्रौञ्चावनेविराधस्तुकबन्धोदण्डकेवने ।यैस्सालागिरयोभग्नावाली च क्षुभितोऽम्बुधिः ।।6.110.32।।त इमेसायकास्सर्वेयुद्धेप्रात्ययिकाममकिनुतत्कारणंयेनरावणेमन्दतेजसः ।।6.110.33।।
ये मेरे वही बाण हैं, जो युद्ध में सदा विश्वसनीय रहे हैं; फिर क्या कारण है कि मन्द-तेज रावण के विरुद्ध ये सफल नहीं हो रहे?
Verse 34
इतिचिन्तापरश्चासीदप्रमत्तश्चसम्युगे ।ववर्षशरवर्षाणीराघवोरावणोरसि ।।।।
ऐसा विचार करते हुए भी राघव रण में पूर्णतः सतर्क रहे और रावण के वक्षःस्थल पर बाणों की वर्षा करने लगे।
Verse 35
रावणोऽपिततःक्रुद्धोरथस्थोराक्षसेश्वरः ।गदामुसलवर्षेणरामंप्रत्यर्दयद्रणे ।।।।
तब रथ पर स्थित राक्षसों का स्वामी रावण भी क्रोध से भर उठा और रण में गदा-मुसलों की वर्षा से राम को दबाने लगा।
Verse 36
तत्प्रवृत्तंमहद्युद्धंतुमुलंरोमहर्षणम् ।अन्तरिक्षे च भूमौ च पुनश्चगिरिमूर्धनि ।।।।
वह महान् युद्ध अत्यन्त घोर और रोमांचकारी होकर चल पड़ा—कभी आकाश में, कभी भूमि पर, और फिर पर्वत-शिखर पर।
Verse 37
देवदानवयक्षाणांपिशाचोरगरक्षसाम् ।पश्यतांतन्महायुद्धंसप्तरात्रमवर्तत ।।।।
देव, दानव, यक्ष, पिशाच, नाग और राक्षसों के देखते-देखते वह महायुद्ध सात रातों तक चलता रहा।
Verse 38
नैव रात्रिं न दिवसंमुहूर्तं न च क्षणम् ।रामरावणयोर्युद्धंविराममुपगच्छति ।।।।
न रात में, न दिन में—न एक मुहूर्त, न एक क्षण—राम और रावण का युद्ध कभी विराम को नहीं पहुँचा।
Verse 39
दशरथसुतराक्षसेन्द्रयोर्जयमनवेक्ष्यरणे स राघवस्य ।सुरवररथसारथिर्महात्मारणरतराममुवाचवाक्यमाशु ।।।।
दशरथनन्दन और राक्षसाधिपति के युद्ध को देखकर, राघव की विजय देखने की अभिलाषा से, देवेंद्र के रथ-सारथि महात्मा मातलि ने रण में तत्पर राम से शीघ्र वचन कहा।
Rāma’s pivotal action is his controlled wrath: he becomes furious at the torment inflicted on Mātali (an ally and charioteer) rather than reacting to his own wounds, illustrating retaliation guided by duty and protection rather than ego-driven anger.
The chapter teaches that power alone is not sufficient without right knowledge of causality: even a master of astras must discern the hidden condition sustaining adharma (Rāvaṇa’s continued life), and must align force with insight to restore order.
The text emphasizes cosmic-geographical markers rather than a single cityscape: the sapta-sāgarāḥ (seven seas) churn, pātāla-dwellers are distressed, and the whole earth with mountains and forests trembles—signaling that the duel is treated as a world-order event.
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