
सीताविलापः (Sita’s Lament and Resolve under Threat)
सुन्दरकाण्ड
अशोक-वाटिका में रावण के कटु और अप्रिय वचन सुनते ही सीता का मन अत्यन्त व्याकुल हो उठता है। वह सिंह के वश में पड़े नवगज-शिशु के समान असहाय प्रतीत होती है। राक्षसियों से घिरी, धमकियों से पीड़ित सीता सोचती है—बुज़ुर्ग कहते हैं कि अकाल मृत्यु नहीं होती, फिर भी मैं दीन भय में जीवित क्यों रह गई? मेरा हृदय वज्र से आहत पर्वत-शिखर की तरह टूट क्यों नहीं जाता? वह रावण के प्रति किसी भी प्रकार का अनुराग स्वीकार नहीं करती—जैसे अयोग्य को ब्राह्मण मंत्र नहीं देता, वैसे ही वह अपना मन उसे नहीं दे सकती। उसे भय होता है कि यदि राम समय पर न आए तो राक्षस उसे अंग-भंग कर देंगे। वह राम, लक्ष्मण और माताओं को पुकारकर विलाप करती है और मृग-प्रसंग को ‘काल’ का छल मानती है, जिसने उसे दोनों भाइयों को दूर भेजने के लिए विवश किया। निराशा में वह विष या शस्त्र से आत्महत्या का विचार करती है, फिर पुष्पित शिंशुपा वृक्ष के पास जाकर शाखा पकड़ती है और यमलोक जाने के लिए अपनी चोटी को साधन बनाने का निश्चय-सा करती है। पर उसी क्षण राम-लक्ष्मण और उनके कुल का स्मरण करते हुए उसके शरीर में शुभ लक्षण प्रकट होते हैं, जो शोक को शांत कर साहस लौटाते हैं; इस प्रकार सर्ग का अंत आत्मघात-चिन्ता के विरुद्ध मंगल-संकेत से होता है।
Verse 1
सा राक्षसेन्द्रस्य वचो निशम्य तद्रावणस्याप्रियमप्रियार्ता।सीता वितत्रास यथा वनान्ते सिंहाभिपन्ना गजराजकन्या।।5.28.1।।
राक्षसों के स्वामी रावण के वे अप्रिय वचन सुनकर, प्रिय-वियोग से पीड़ित सीता काँप उठीं—जैसे घने वन में सिंह द्वारा पकड़ी गई गजराज की कन्या।
Verse 2
सा राक्षसीमध्यगता च भीरु र्वाग्भिर्भृशं रावणतर्जिता च। कान्तारमध्ये विजने विसृष्टा बालेव कन्या विललाप सीता।।5.28.2।।
राक्षसियों के बीच पड़ी हुई, भयभीत, और रावण के कठोर वचनों से अत्यन्त तर्जित, निर्जन कान्तार के मध्य अकेली छोड़ी गई सीता बालिका-सी विलाप करने लगी।
Verse 3
सत्यं बतेदं प्रवदन्ति लोके नाकालमृत्युर्भवतीति सन्तः।यत्राहमेवं परिभर्त्स्यमानाजीवामि दीना क्षणमप्यपुण्या।।5.28.3।।
सचमुच इस लोक में सज्जन जो कहते हैं, वही सत्य है—अकाल मृत्यु नहीं होती। यहाँ मैं इस प्रकार तिरस्कृत और भयभीत की जाती हुई भी, दीन होकर, क्षणभर भी पुण्यहीन-सी, जीवित रह रही हूँ।
Verse 4
सुखाद्विहीनं बहुदुःखपूर्णमिदं तु नूनं हृदयं स्थिरं मे।विशीर्यते यन्न सहस्रधाऽद्य वज्राहतं शृङ्गमिवाचलस्य।।5.28.4।।
सुख से रहित और अनेक दुःखों से भरा हुआ मेरा यह हृदय निश्चय ही कठोर है; क्योंकि आज भी यह सहस्र टुकड़ों में नहीं टूटता—जैसे वज्र से आहत पर्वत-शिखर।
Verse 5
नैवास्ति दोषो मम नूनमत्र वध्याहमस्याप्रियदर्शनस्य।भावं न चास्याहमनुप्रदातु मलं द्विजो मन्त्रमिवाद्विजाय।।5.28.5।।
यदि मैं यहाँ मर भी जाऊँ तो निश्चय ही मेरा कोई दोष नहीं; उस अप्रिय-दर्शन वाले के हाथों मेरा वध निश्चित है। उसे अपना हृदय देना या स्वीकार करना मेरे लिए उचित नहीं—जैसे कोई ब्राह्मण अयोग्य को पवित्र मंत्र नहीं देता।
Verse 6
नूनं ममाङ्गान्यचिरादनार्यः शस्त्रैश्शितैश्छेत्स्यति राक्षसेन्द्रः।तस्मिननागच्छति लोकनाथे गर्भस्थजन्तोरिव शल्यकृन्तः।।5.28.6।।
निश्चय ही वह अनार्य राक्षस-राज शीघ्र ही तीक्ष्ण शस्त्रों से मेरे अंग काट डालेगा—यदि लोकनाथ समय पर यहाँ न आए; जैसे शल्यकृन्त गर्भस्थ शिशु को निकालने हेतु चीरता है।
Verse 7
दुःखं बतेदं मम दुःखिताया मासौ चिरायाधिगमिष्यतो द्वौ। बद्धस्य वध्यस्य तथा निशान्ते राजापराधादिव तस्करस्य।।5.28.7।।
हाय, दुःख से पीड़ित मेरी यह कैसी विपत्ति है—ये दो मास युग के समान बीतेंगे। मैं उस चोर के समान हूँ जो राजा के अपराध से बँधा हुआ वध के लिए ठहरा है और प्रभात तक रात काटता है।
Verse 8
हा राम हा लक्ष्मण हा सुमित्रे हा राममातः सह मे जनन्या। एषा विपद्याम्यहमल्पभाग्या महार्णवे नौरिव मूढवाता।।5.28.8।।
हाय राम! हाय लक्ष्मण! हाय सुमित्रा! हाय राम-माता, मेरी जननी सहित! मैं अल्पभाग्यवती विपत्ति में पड़कर महा-समुद्र में भटकती वायु से आहत छोटी नौका की भाँति नष्ट हो रही हूँ।
Verse 9
तरस्विनौ धारयता मृगस्यसत्त्वेन रूपं मनुजेन्द्रपुत्रौ।नूनं विशस्तौ मम कारणात्तौ सिंहर्षभौ द्वाविव वैद्युतेन।।5.28.9।।
मनुज-राज के वे दोनों पराक्रमी पुत्र, मृग-रूप धारण करने वाले प्राणी से मोहित होकर सामने गए। निश्चय ही मेरे कारण वे दोनों बिजली से आहत दो सिंह-ऋषभों की भाँति मारे गए हैं।
Verse 10
नूनं स कालो मृगरूपधारीमामल्पभाग्यां लुलुभे तदानीम्।यत्रार्यपुत्रं विससर्ज मूढा रामानुजं लक्ष्मणपूर्वजं च।।5.28.10।।
निश्चय ही वही काल मृग-रूप धारण कर उस समय मुझे—अल्पभाग्यिनी को—बहका ले गया, जब मैंने मूढ़ता से आर्यपुत्र को और राम के अनुज लक्ष्मण को भी भेज दिया।
Verse 11
हा राम सत्यव्रत दीर्घबाहो हा पूर्णचन्द्रप्रतिमानवक्त्र। हा जीवलोकस्य हितः प्रियश्च वध्यां न मां वेत्सि हि राक्षसानाम्।।5.28.11।।
हाय राम! सत्यव्रत, दीर्घबाहु! हाय, पूर्णचन्द्र-सम मुखवाले! हाय, जीव-जगत् के हितैषी और प्रिय! क्या तुम नहीं जानते कि मैं राक्षसों के हाथों वध के लिए ठहरी हूँ?
Verse 12
अनन्य दैवत्वमियं क्षमा चभूमौ च शय्या नियमश्च धर्मे।पतिव्रतात्वं विफलं ममेदंकृतं कृतघ्नेष्विव मानुषाणाम्।।5.28.12।।
तुम्हीं को एकमात्र देव मानकर मेरी अनन्य भक्ति, मेरी क्षमा, भूमि पर शयन, और धर्म में मेरा नियम—यह मेरा पतिव्रत भी निष्फल हो गया है, जैसे कृतघ्न मनुष्यों पर किया हुआ उपकार व्यर्थ हो जाता है।
Verse 13
मोघो हि धर्मश्चरितो मयायंतथैकपत्नीत्वामिदं निरर्थम्।या त्वां न पश्यामि कृशा विवर्णा हीना त्वया सङ्गमने निराशा।।5.28.13।।
सचमुच मेरे द्वारा आचरित यह धर्म व्यर्थ हो गया; वैसे ही एकपत्नी-व्रत भी निरर्थक है—क्योंकि मैं तुम्हें नहीं देखती। तुमसे वियोग में मैं कृश और विवर्ण हो गई हूँ, मिलन की आशा से रहित।
Verse 14
पितुर्निदेशं नियमेन कृत्वा वनान्निवृत्तश्चरितव्रतश्च।स्त्रीभिस्तु मन्ये विपुलेक्षणाभिस्त्वं रंस्यसे वीतभयः कृतार्थः।।5.28.14।।
पिता की आज्ञा को नियमपूर्वक पूरा करके, व्रताचरण सम्पन्न कर तुम वन से लौट आओगे; तब, मुझे लगता है, भय से रहित और कृतार्थ होकर तुम विशाल-नेत्री स्त्रियों के साथ रमण करोगे।
Verse 15
अहं तु राम त्वयि जातकामा चिरं विनाशाय निबद्धभावा।मोघं चरित्वाथ तपो व्रतञ्च त्यक्ष्यामिधिग्जीवितमल्पभाग्याम्।।5.28.15।।
हे राम! मैं तो तुममें ही कामना बाँधकर, बहुत काल से अपने ही विनाश के लिए आसक्त रही। तप और व्रत व्यर्थ करके अब मैं प्राण त्याग दूँगी—धिक्कार है मेरे इस जीवन को, मैं अल्पभाग्यवती हूँ।
Verse 16
सा जीवितं क्षिप्रमहं त्यजेयं विषेण शस्त्रेण शितेन वापि।विषस्य दाता न हि मेऽस्ति कश्चि च्छस्त्रस्य वा वेश्मनि राक्षसस्य।।5.28.16।।
मैं अभी विष से, या शस्त्र से, यहाँ तक कि तीक्ष्ण खड्ग से भी, तुरंत प्राण त्याग दूँ। पर इस राक्षस के गृह में न कोई मुझे विष देने वाला है, न शस्त्र देने वाला।
Verse 17
इतीव देवी बहुधा विलप्य सर्वात्मना राममनुस्मरन्ती।प्रवेपमाना परिशुष्कवक्त्रा नगोत्तमं पुष्पितमाससाद।।5.28.17।।
इस प्रकार देवी सीता अनेक प्रकार से विलाप करती हुई, सम्पूर्ण चित्त से श्रीराम का स्मरण करती रही। काँपती हुई, मुख सूखकर पीला पड़ गया; तब वह पुष्पित श्रेष्ठ वृक्ष के पास जा पहुँची।
Verse 18
सा शोकतप्ता बहुधा विचिन्त्यसीताऽथ वेण्युद्ग्रथनं गृहीत्वा।उद्बुध्य वेण्युद्ग्रथनेन शीघ्रमहंगमिष्यामि यमस्य मूलम्।।5.28.18।।
शोक से दग्ध सीता ने अनेक प्रकार से विचार करके अपने केशों की वेणी को पकड़ लिया। वेणी से ही बँधकर शीघ्र निश्चय करती हुई बोली—“मैं तुरंत यमराज के समीप चली जाऊँगी।”
Verse 19
उपस्थिता सा मृदुसर्वगात्री शाखां गृहत्वाऽध नगस्य तस्य।तस्यास्तु रामं प्रविचिन्तयन्त्या रामानुजं स्वं च कुलं शुभाङ्ग्या:।।5.28.19।।शेकानिमित्तानि तथा बहूनिधैर्यार्जितानि प्रवराणि लोके।प्रादुर्निमित्तानि तदा बभूवुः पुरापि सिद्धान्युपलक्षितानि।।5.28.20।।
वह मृदु सर्वांगिनी सीता उस वृक्ष के पास आकर उसकी एक शाखा पकड़कर खड़ी हो गई। उस शुभांगी ने श्रीराम, रामानुज लक्ष्मण और अपने कुल का स्मरण करते हुए—तभी संसार में विख्यात, शोक-निवारक और धैर्य-प्रद, प्राचीनकाल से सिद्ध माने गए अनेक शुभ निमित्त प्रकट हो उठे।
Sītā confronts a dharma-crisis under coercion: whether to preserve life by yielding to Rāvaṇa or to preserve moral integrity by refusing him—even contemplating self-chosen death. The chapter emphasizes her categorical rejection of surrendering affection to adharma (5.28.5) despite imminent threat (5.28.6–7).
The sarga teaches that inner virtue can remain intact even when external agency is constrained. Sītā’s speech frames fidelity and disciplined righteousness as non-negotiable values, while the emergence of auspicious omens (5.28.19–20) signals that despair is not the final truth—ethical steadfastness becomes the condition for renewed courage and meaningful hope.
The key landmark-object is the flowering śiṃśupā (simsupa) tree in the grove where Sītā stands and grasps a branch (5.28.17–19), functioning as a physical anchor for her crisis. Cultural-religious references include Yama (death’s lord), the concept of kāla (time-fate), and the tradition of bodily omens (nimitta) as validated signs in ancient lore (5.28.20).
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