
हनूमद्विक्रम-प्रशंसा तथा महेन्द्रारोहणम् (Hanuman’s Self-Assertion of Power and Ascent of Mount Mahendra)
किष्किन्धाकाण्ड
इस सर्ग में लंका-गमन से पूर्व समुद्र-लाँघने के लिए मनोबल और नीति का निर्णायक मोड़ दिखाया गया है। हनुमान को शत-योजन की छलाँग हेतु देह-विस्तार करते देखकर वानर अपना शोक छोड़कर उनकी स्तुति करते हैं; प्रसंग वामन–त्रिविक्रम की उपमा और तेजस्वी, विस्तृत देह-छवि से आलोकित होता है। तब हनुमान सभा में उठकर वृद्धों को प्रणाम करते हैं और अपने सामर्थ्य का संतुलित वर्णन करते हैं—वे मरुत के धर्मसम्मत पुत्र हैं; मेरु की परिक्रमा, समुद्र को क्षुब्ध या निरस्त करना, आकाशचारी प्राणियों को पीछे छोड़ना, तथा गरुड़ और वायु के तुल्य वेग धारण करना उनके लिए संभव है। वे सूर्य के निकट जाकर बिना पृथ्वी स्पर्श किए लौट आने या इन्द्र के हाथ से अमृत ले आने जैसी महाकल्पनीय उपलब्धियों का भी उल्लेख कर सबके मन में आश्वासन और लक्ष्य-निश्चय दृढ़ करते हैं। जाम्बवान विधिपूर्वक मंगलाशीर्वाद देकर बताते हैं कि यह कार्य ऋषियों, वृद्धों और समस्त समुदाय के सहारे सिद्ध होगा। इसके बाद हनुमान प्रस्थान-स्थल के रूप में महेन्द्र पर्वत चुनते हैं—क्योंकि उनकी छलाँग के वेग का आघात पृथ्वी सह नहीं पाएगी; वे स्थिर शिखरों पर वेग संचित कर आरोहण करते हैं। उनके स्पर्श से नियंत्रित ‘जगत्-कम्प’ सा दृश्य बनता है—शिलाएँ बिखरती हैं, पशु भागते हैं, गन्धर्व-विद्याधर हटते हैं, नाग छिप जाते हैं—यह संकेंद्रित वीर्य का प्रभाव है। अंत में वे वेग पर मन को स्थिर कर, देह-लाँघन से पहले मन से ही लंका को पहुँचते हैं और दिखाते हैं कि अनुशासित संकल्प (मनःसमाधि) ही वीर कर्म का अंतःप्रेरक है।
Verse 1
तं दृष्ट्वा जृम्भमाणं ते क्रमितुं शतयोजनम्।वीर्येणापूर्यमाणं च सहसा वानरोत्तमम्।।4.67.1।।सहसा शोकमुत्सृज्य प्रहर्षेण समन्विताः।विनेदुस्तुष्टुवुश्चापि हनूमन्तं महाबलम्।।4.67.2।।
उस वानरश्रेष्ठ हनुमान को सहसा विशाल होते, सौ योजन पार करने हेतु शक्ति से परिपूर्ण होते देखकर वे सब तुरंत शोक त्यागकर हर्ष से भर उठे; उन्होंने जय-जयकार किया और महाबली हनुमान की स्तुति की।
Verse 2
तं दृष्ट्वा जृम्भमाणं ते क्रमितुं शतयोजनम्।वीर्येणापूर्यमाणं च सहसा वानरोत्तमम्।।4.67.1।।सहसा शोकमुत्सृज्य प्रहर्षेण समन्विताः।विनेदुस्तुष्टुवुश्चापि हनूमन्तं महाबलम्।।4.67.2।।
हनुमान्—वानरों में श्रेष्ठ—को सहसा विस्तार करते हुए, शत योजन लाँघने हेतु बल से परिपूर्ण होते देखकर वे सब तुरंत शोक त्यागकर हर्ष से भर उठे; ऊँचे स्वर से निनाद किया और महाबली हनुमान् की स्तुति करने लगे।
Verse 3
प्रहृष्टा विस्मिताश्चैव वीक्षन्ते स्म समन्ततः।त्रिविक्रमकृतोत्साहं नारायणमिव प्रजाः।।4.67.3।।
वे सब हर्षित और विस्मित होकर चारों ओर से देखते थे—मानो त्रिविक्रम के उत्साह से युक्त नारायण को प्रजा ने देखा हो॥
Verse 4
संस्तूयमानो हनुमान्व्यवर्धत महाबलः।समाविध्य च लाङ्गूलं हर्षाद्बलमुपेयिवान्।।4.67.4।।
वानरों द्वारा स्तुत होकर महाबली हनुमान् और अधिक बढ़ने लगे; पूँछ को घुमाकर वे हर्ष से अपने भीतर बल का संचार करने लगे।
Verse 5
तस्य संस्तूयमानस्य सर्वैर्वानरपुङ्गवैः।तेजसापूर्यमाणस्य रूपमासीदनुत्तमम्।।4.67.5।।
सब वानर-श्रेष्ठों द्वारा स्तुति किए जाते हुए, तेज से परिपूर्ण होते हुए हनुमान का रूप उस समय अनुपम हो गया॥
Verse 6
यथा विजृम्भते सिंहो विवृद्धो गिरिगह्वरे।मारुतस्यौरसः पुत्रस्तथा सम्प्रति जृम्भते।।4.67.6।।
जैसे पर्वत-गुहा में पला-बढ़ा सिंह अंगड़ाई लेता है, वैसे ही उस समय मारुत के औरस पुत्र हनुमान ने अंग-विस्तार किया॥
Verse 7
अशोभत मुखं तस्य जृम्भमाणस्य धीमतः।अम्बरीषमिवाऽदीप्तं विधूम इव पावकः।।4.67.7।।
उस बुद्धिमान् हनुमान् के जृम्भित होते समय उसका मुख शोभायमान हो उठा—दीप्त भट्ठी के समान प्रज्वलित और धूमरहित अग्नि की भाँति उज्ज्वल।
Verse 8
हरीणामुत्थितो मध्यात्सम्प्रहृष्टतनूरुहः।अभिवाद्य हरीन्वृद्धान्हनुमानिदमब्रवीत्।।4.67.8।।
वानरों के मध्य से उठकर, हर्ष से जिसके शरीर के रोम खड़े हो गए थे, उस हनुमान् ने वानर-समुदाय के वृद्धों को प्रणाम करके ये वचन कहे।
Verse 9
अरुजत्सर्वताग्राणि हुताशनसखोऽनिलः।बलवानप्रमेयश्च वायुराकाशगोचरः।।4.67.9।।
अग्नि का मित्र वह अनिल—आकाश में विचरण करने वाला वायु—बलवान् और अप्रमेय है; वह सर्वत्र पर्वत-शिखरों को भी चूर-चूर कर सकता है।
Verse 10
तस्याहं शीघ्रवेगस्य शीघ्रगस्य महात्मनः।मारुतस्यौरसः पुत्रः प्लवनेनास्मि तत्समः।।4.67.10।।
मैं महात्मा, शीघ्रवेग और शीघ्रगामी मारुत का औरस पुत्र हूँ; छलाँग लगाने में मैं उसी के समान हूँ।
Verse 11
उत्सहेयं हि विस्तीर्णमालिखन्तमिवाम्बरम्।मेरुं गिरिमसङ्गेन परिगन्तुं सहस्रशः।।4.67.11।।
आकाश को मानो खुरचता हुआ वह विशाल मेरु पर्वत—उसे छुए बिना भी—मैं सहस्र बार परिक्रमा करने का सामर्थ्य रखता हूँ।
Verse 12
बाहुवेगप्रणुन्नेन सागरेणाहमुत्सहे।समाप्लावयितुं लोकं सपर्वतनदीह्रदम्।।4.67.12।।
मेरे भुजबल से प्रतिहत होकर समुद्र ऐसा उफन सकता है कि पर्वतों, नदियों और सरोवरों सहित समस्त लोक को मैं जलमग्न कर देने में समर्थ हूँ।
Verse 13
ममोरुजङ्घावेगेन भविष्यति समुत्थितः।सम्मूर्च्छितमहाग्राहस्समुद्रो वरुणालयः।।4.67.13।।
मेरी जंघा और ऊरु के वेग से वरुणालय समुद्र उछल उठेगा; उसके महाग्राह आदि समुद्रचर प्राणी आघात से मूर्छित हो जाएंगे।
Verse 14
पन्नगाशनमाकाशे पतन्तं पक्षिसेविते।वैनतेयमहं शक्तः परिगन्तुं सहस्रशः।।4.67.14।।
मैं आकाश में पक्षियों से सेवित, सर्पभक्षक वैनतेय गरुड़ के उड़ते हुए रूप के चारों ओर सहस्र बार परिक्रमा करने में समर्थ हूँ।
Verse 15
उदयात्प्रस्थितं वापि ज्वलन्तं रश्मिमालिनम्।अनस्तमितमादित्यमभिगन्तुं समुत्सहे।।4.67.15।।ततो भूमिमसंस्पृश्य पुनरागन्तुमुत्सहे।प्रवेगेनैव महता भीमेन प्लवगर्षभाः।।4.67.16।।
हे वानरश्रेष्ठ! मैं उदय से प्रस्थित, ज्वलन्त किरणमालाधारी, अस्त न होने वाले आदित्य के साथ चलकर उसे पा लेने में समर्थ हूँ; और फिर पृथ्वी को स्पर्श किए बिना उसी महान् और भीषण वेग से पुनः लौट आने में भी समर्थ हूँ।
Verse 16
उदयात्प्रस्थितं वापि ज्वलन्तं रश्मिमालिनम्।अनस्तमितमादित्यमभिगन्तुं समुत्सहे।।4.67.15।।ततो भूमिमसंस्पृश्य पुनरागन्तुमुत्सहे।प्रवेगेनैव महता भीमेन प्लवगर्षभाः।।4.67.16।।
तब, हे वानरश्रेष्ठ! मैं पृथ्वी को स्पर्श किए बिना उसी महान् और भीषण वेग से पुनः लौट आने में समर्थ हूँ।
Verse 17
उत्सहेयमतिक्रान्तुं सर्वानाकाशगोचरान्।सागरं क्षोभयिष्यामि दारयिष्यामि मेदिनीम्।।4.67.17।।
मैं आकाश में विचरने वाले समस्त प्राणियों को भी पीछे छोड़ने में समर्थ हूँ; मैं सागर को क्षुब्ध कर दूँ और पृथ्वी को भी विदीर्ण कर दूँ।
Verse 18
पर्वतांश्चूर्णयिष्यामि प्लवमानः प्लवङ्गमाः।हरिष्याम्यूरुवेगेन प्लवमानो महार्णवम्।।4.67.18।।
हे वानरो! मैं जब आकाश में छलाँग लगाऊँगा, तो पर्वतों को चूर्ण कर दूँगा; और जाँघों के वेग से उछलता हुआ महा-समुद्र तक को खींच ले जाऊँगा।
Verse 19
लतानां विविधं पुष्पं पादपानां च सर्वशः।अनुयास्यन्ति मामद्य प्लवमानं विहायसा।।4.67.19।।
आज मैं जब आकाश में छलाँग लगाऊँगा, तब लताओं के विविध पुष्प और वृक्षों के फूल सर्वत्र से मेरे पीछे-पीछे बहते चले आएँगे।
Verse 20
भविष्यति हि मे पन्थास्स्वातेः पन्था इवाम्बरे।चरन्तं घोरमाकाशमुत्पतिष्यन्तमेव वा।।4.67.20।।द्रक्ष्यन्ति निपतिष्यन्तं च सर्वभूतानि वानराः।
हे वानरो! आकाश में मेरा मार्ग स्वाती नक्षत्र के पथ के समान होगा। इस भयानक आकाश में चलते हुए—कभी ऊपर उठता, कभी नीचे उतरता—मुझे समस्त प्राणी देखेंगे।
Verse 21
महामेरुप्रतीकाशं मां द्रक्ष्यथ वानराः।।4.67.21।।दिवमावृत्य गच्छन्तं ग्रसमानमिवाम्बरम्।
हे वानरो! तुम मुझे महा-मेरु पर्वत के समान देखोगे—आकाश को ढँककर आगे बढ़ता हुआ, मानो मैं स्वयं आकाश को ही निगल रहा हूँ।
Verse 22
विधमिष्यामि जीमूतान्कम्पयिष्यामि पर्वतान्।।4.67.22।।सागरं शोषयिष्यामि प्लवमानस्समाहितः।
मन को एकाग्र करके जब मैं छलाँग लगाऊँगा, तब बादलों को तितर-बितर कर दूँगा, पर्वतों को कंपा दूँगा और समुद्र को भी सुखा दूँगा।
Verse 23
वैनतेयस्य या शक्तिर्मम सा मारुतस्य वा।।4.67.23।।ऋते सुपर्णराजानं मारुतं वा महाजवम्।न तद्भूतं प्रपश्यामि यन्मां प्लुतमनुव्रजेत्।।4.67.24।।
वैनतेय (गरुड़) जैसी जो शक्ति है, वही मेरी है—और वैसी ही मारुत (पवन) की भी। सुपर्णराज गरुड़ और महावेगवान् पवन को छोड़कर मैं ऐसा कोई प्राणी नहीं देखता जो मेरे उड़ते हुए पीछे-पीछे चल सके।
Verse 24
वैनतेयस्य या शक्तिर्मम सा मारुतस्य वा।।4.67.23।।ऋते सुपर्णराजानं मारुतं वा महाजवम्।न तद्भूतं प्रपश्यामि यन्मां प्लुतमनुव्रजेत्।।4.67.24।।
वैनतेय (गरुड़) अथवा मारुत (पवन) जैसी उड़ान-शक्ति—वही मेरी है। सुपर्णराज गरुड़ और महावेगवान् वायु को छोड़कर, मैं ऐसा कोई प्राणी नहीं देखता जो मेरे आकाश में छलाँग लगाते हुए साथ चल सके।
Verse 25
निमेषान्तरमात्रेण निरालम्बनमम्बरम्।सहसा निपतिष्यामि घनाद्विद्युदिवोत्थिता।।4.67.25।।
पलभर—एक निमेष के भीतर—मैं आधारहीन आकाश में सहसा वैसे ही उतर पड़ूँगा, जैसे मेघ से उठी हुई बिजली।
Verse 26
भविष्यति हि मे रूपं प्लवमानस्य सागरे।विष्णोर्विक्रममाणस्य पुरा त्रीन्विक्रमानिव।।4.67.26।।
समुद्र पर छलाँग लगाते समय मेरा रूप वैसा ही हो जाएगा, जैसा प्राचीन काल में तीन पग बढ़ाते हुए विक्रमशील विष्णु का था।
Verse 27
बुद्ध्या चाहं प्रपश्यामि मनश्चेष्टा च मे तथा।अहं द्रक्ष्यामि वैदेहीं प्रमोदध्वं प्लवङ्गमाः।।4.67.27।।
अपनी बुद्धि से—और मन की गति से भी—मैं यह स्पष्ट देख रहा हूँ: मैं वैदेही को अवश्य देखूँगा। हे प्लवंगमों, आनंदित होओ!
Verse 28
मारुतस्य समो वेगे गरुडस्य समो जवे।अयुतं योजनानां तु गमिष्यामीति मे मतिः।।4.67.28।।
वेग में मैं मारुतदेव के समान हूँ और जवे में गरुड़ के तुल्य। मेरा निश्चय है कि मैं दस हज़ार योजन तक भी जा सकता हूँ॥
Verse 29
वासवस्य सवज्रस्य ब्रह्मणो वा स्वयम्भुवः।विक्रम्य सहसा हस्तादमृतं तदिहानये।।4.67.29।।लङ्कां वापि समुत्क्षिप्य गच्छेयमिति मे मतिः।
वज्रधारी वासव अथवा स्वयंभू ब्रह्मा के सामने भी मैं पराक्रम कर, उनके हाथ से अमृत झपटकर तुरंत यहाँ ले आऊँ—ऐसा मेरा मत है। और मेरा यह भी निश्चय है कि लंका को भी उखाड़कर उठा ले जाऊँ॥
Verse 30
तमेवं वानरश्रेष्ठं गर्जन्तममितौजसम्।।4.67.30।।प्रहृष्टा हरयस्तत्र समुदैक्षन्त विस्मिताः।
इस प्रकार गर्जना करते, अपरिमित तेज वाले उस वानरश्रेष्ठ को वहाँ हर्षित हरिगण विस्मित होकर देखते रहे॥
Verse 31
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ज्ञातीनां शोकनाशनम्।।4.67.31।।उवाच परिसंहृष्टो जाम्बवान्हरिसत्तमः।
उनके वचन—जो स्वजनों के शोक का नाश करने वाले थे—सुनकर, हरियों में श्रेष्ठ जाम्बवान् अत्यन्त हर्षित होकर बोले॥
Verse 32
वीर केसरिणः पुत्र हनुमान्मारुतात्मज।।4.67.32।।ज्ञातीनां विपुलश्शोकस्त्वया तात प्रणाशितः।
हे वीर! केशरी-नन्दन, मारुतात्मज हनुमान! प्रिय तात, तुम्हारे द्वारा अपने स्वजनों का महान् शोक नष्ट हो गया है।
Verse 33
तव कल्याणरुचयः कपिमुख्यास्समागताः।।4.67.33।।मङ्गलं कार्यसिद्ध्यर्थं करिष्यन्ति समाहिताः।
तुम्हारे कल्याणचिन्तक—वानर-श्रेष्ठ—एकत्र हो गए हैं; मन को एकाग्र करके वे तुम्हारे कार्य की सिद्धि हेतु मङ्गल-कर्म करेंगे।
Verse 34
ऋषीणां च प्रसादेन कपिवृद्धमतेन च।।4.67.34।।गुरूणां च प्रसादेन प्लवस्व त्वं महार्णवम्।
ऋषियों के आशीर्वाद से, वानर-वृद्धों की अनुमोदित सम्मति से, और गुरुओं की कृपा से—तुम इस महा-सागर को पार करो।
Verse 35
स्थास्यामश्चैकपादेन यावदागमनं तव।।4.67.35।।त्वद्गतानि च सर्वेषां जीवनानि वनौकसाम्।
तुम्हारे लौट आने तक हम एक पाँव पर खड़े रहकर प्रतीक्षा करेंगे; क्योंकि हम सब वनवासियों के प्राण अब तुम पर ही आश्रित हैं।
Verse 36
ततस्तु हरिशार्दूलस्तानुवाच वनौकसः।।4.67.36।।नेयं मम मही वेगं लङ्घने धारयिष्यति।
तब वानरों में व्याघ्र-तुल्य हनुमान ने उन वनवासियों से कहा—“मेरे लाँघने के वेग को यह पृथ्वी धारण नहीं कर सकेगी।”
Verse 37
एतानीह नगस्यास्य शिलासङ्कटशालिनः।।4.67.37।।शिखराणि महेन्द्रस्य स्थिराणि सुमहान्ति च।
यहाँ महेन्द्र पर्वत के ये शिखर हैं, जो विशाल शिलाओं से घने हैं; ये अचल और अत्यन्त महान् हैं।
Verse 38
एषु वेगं करिष्यामि महेन्द्रशिखरेष्वहम्।।4.67.38।।नानाद्रुमविकीर्णेषु धातुनिष्यन्दशोभिषु।
इन महेन्द्र-शिखरों पर मैं अपना वेग बढ़ाऊँगा—जहाँ नाना प्रकार के वृक्ष बिखरे हैं और धातु-रस की धाराएँ चमक रही हैं।
Verse 39
एतानि मम निष्पेषं पादयोः प्लवतां वराः।।4.67.39।।प्लवतो धारयिष्यन्ति योजनानामितश्शतम्।
हे श्रेष्ठ प्लवंगो! ये शिखर मेरे पैरों के प्रहार-जनित दबाव को सहेंगे, जब मैं यहाँ से सौ योजन दूर छलाँग लगाऊँगा।
Verse 40
ततस्तं मारुतप्रख्यस्सहरिर्मारुतात्मजः।।4.67.40।।आरुरोह नगश्रेष्ठं महेन्द्रमरिमर्दनः।वृतं नानाविधैः वृक्षैर्मृगसेवितशाद्वलम्।।4.67.41।।लताकुसुमसम्बाधं नित्यपुष्पफलद्रुमम्।सिंहशार्दूलचरितं मत्तमातङ्गसेवितम्।।4.67.42।।मत्तद्विजगणोद्घुष्टं सलिलोत्पीडसङ्कुलम्।
तब वायु के समान तेजस्वी, वायुपुत्र, शत्रु-मर्दन वह वानर पर्वतों में श्रेष्ठ महेन्द्र पर चढ़ गया—जो नाना प्रकार के वृक्षों से आच्छादित था, जिसके हरे-भरे तृणस्थल मृगों से सेवित थे; जो लताओं और पुष्पों से घना था, और जहाँ वृक्ष सदा फूल-फल से युक्त रहते थे; जहाँ सिंह-व्याघ्र विचरते थे और मदमत्त हाथी निवास करते थे; जो उन्मत्त पक्षी-समूहों के कलरव से गूँजता था और जलप्रपातों की धाराओं से परिपूर्ण था।
Verse 41
ततस्तं मारुतप्रख्यस्सहरिर्मारुतात्मजः।।4.67.40।।आरुरोह नगश्रेष्ठं महेन्द्रमरिमर्दनः।वृतं नानाविधैः वृक्षैर्मृगसेवितशाद्वलम्।।4.67.41।।लताकुसुमसम्बाधं नित्यपुष्पफलद्रुमम्।सिंहशार्दूलचरितं मत्तमातङ्गसेवितम्।।4.67.42।।मत्तद्विजगणोद्घुष्टं सलिलोत्पीडसङ्कुलम्।
अरिमर्दन हनुमान् पर्वतों में श्रेष्ठ महेन्द्र पर चढ़ गए। वह नाना प्रकार के वृक्षों से घिरा था, और मृगों से सेवित हरी-भरी घास की चादर से आच्छादित था॥
Verse 42
ततस्तं मारुतप्रख्यस्सहरिर्मारुतात्मजः।।4.67.40।।आरुरोह नगश्रेष्ठं महेन्द्रमरिमर्दनः।वृतं नानाविधैः वृक्षैर्मृगसेवितशाद्वलम्।।4.67.41।।लताकुसुमसम्बाधं नित्यपुष्पफलद्रुमम्।सिंहशार्दूलचरितं मत्तमातङ्गसेवितम्।।4.67.42।।मत्तद्विजगणोद्घुष्टं सलिलोत्पीडसङ्कुलम्।
वह पर्वत लताओं और पुष्पों से घना था; वहाँ के वृक्ष सदा फूल-फल से युक्त थे। सिंह-व्याघ्रों का विचरण था और मदोन्मत्त हाथियों का आवागमन; उन्मत्त पक्षियों के समूहों के कलरव से गूँजता, तथा झरनों के जल-छींटों और प्रवाह से परिपूर्ण था॥
Verse 43
महद्भिरुच्छ्रितं शृङ्गैर्महेन्द्रं स महाबलः।।4.67.43।।विचचार हरिश्रेष्ठो महेन्द्रसमविक्रमः।
महाबली वानर-श्रेष्ठ—पराक्रम में इन्द्र के समान—ऊँचे-ऊँचे विशाल शिखरों वाले महेन्द्र पर्वत पर विचरने लगे॥
Verse 44
पादाभ्यां पीडितस्तेन महाशैलो महात्मना।।4.67.44।।रराज सिंहाभिहतो महान्मत्त इव द्विपः।
उस महात्मा के चरणों से दबाया गया वह विशाल पर्वत, सिंह से आहत महान् मदोन्मत्त हाथी के समान दीप्तिमान हो उठा।
Verse 45
मुमोच सलिलोत्पीडान्विप्रकीर्णशिलोच्चयः।।4.67.45।।वित्रस्तमृगमातङ्गः प्रकम्पितमहाद्रुमः।
शिलाखण्ड बिखर जाने पर उस पर्वत ने जल की प्रचण्ड धाराएँ उगल दीं; मृग और गज भयभीत हो उठे, और महावृक्ष तीव्रता से काँपने लगे।
Verse 46
नानागन्धर्वमिथुनैः पानसंसर्गकर्कशैः।।4.67.46।।उत्पतद्भिश्च विहगैर्विद्याधरगणैरपि।त्यज्यमानमहासानुस्सन्निलीनमहोरगः।।4.67.47।।चलशृङ्गशिलोद्घातस्तदाऽभूत्स महागिरिः।
मदिरासंग से उग्र हुए नाना गन्धर्व-युगल, पक्षियों के झुंड और विद्याधरों की गण—सब उसके विस्तृत सानुओं को त्यागकर उड़ चले; महोरग छिप गए, और चलित शिखरों से शिलाखण्डों की वर्षा होने लगी—तब वह महागिरि कोलाहलमय हो उठा।
Verse 47
नानागन्धर्वमिथुनैः पानसंसर्गकर्कशैः।।4.67.46।।उत्पतद्भिश्च विहगैर्विद्याधरगणैरपि।त्यज्यमानमहासानुस्सन्निलीनमहोरगः।।4.67.47।।चलशृङ्गशिलोद्घातस्तदाऽभूत्स महागिरिः।
शिलाखण्ड बिखर जाने पर उस पर्वत ने जल की प्रचण्ड धाराएँ उगल दीं; मृग और गज भयभीत हो उठे, और महावृक्ष तीव्रता से काँपने लगे।
Verse 48
निश्श्वसद्भिस्तदाऽर्तैस्तु भुजङ्गैरर्धनि:सृतैः।।4.67.48।।सपताक इवाभाति स तदा धरणीधरः।
तब दरारों से आधे-आधे निकलकर फुफकारते हुए पीड़ित भुजंगों के कारण वह धरणीधर पर्वत मानो ध्वज-पताकाओं से सुसज्जित-सा दीख पड़ा।
Verse 49
ऋषिभिस्त्राससम्भ्रान्तैस्त्यज्यमानः शिलोच्चयः।।4.67.49।।सीदन्महति कान्तारे सार्थहीन इवाध्वगः।
भय से व्याकुल ऋषियों द्वारा त्यागा गया वह शिलोच्चय, विशाल कान्तार में दुःख से धँसते हुए, मानो सार्थ-विहीन पथिक के समान प्रतीत हुआ।
Verse 50
सवेगवान् वेगसमाहितात्माहरिप्रवीरः परवीरहन्ता।मनस्समाधाय महानुभावोजगाम लङ्कां मनसा मनस्वी।।4.67.50।।
वेग से परिपूर्ण, वेग में ही चित्त को स्थिर किए हुए, वानर-वीरों में श्रेष्ठ और शत्रु-वीरों का संहारक वह महात्मा हनुमान् मन को समाधि में रखकर—पहले मन से ही लङ्का को प्राप्त करते हुए—लङ्का की ओर चल पड़ा।
The pivotal action is the assumption of responsibility under collective crisis: Hanuman publicly commits to the hundred-yojanas crossing, converting the troop’s despair into coordinated resolve; the ethical axis is leadership-through-service, where capability is asserted not for pride but to secure a shared dharmic objective (Sita’s discovery).
Power becomes efficacious when joined to inner composure and right purpose: Hanuman’s catalogue of feats culminates in manas-samādhi—he ‘reaches’ Lanka mentally before physically—teaching that disciplined intention, supported by blessings and communal trust, is the catalyst that turns potential into successful action.
Mount Mahendra is highlighted as the practical launch-site whose peaks can bear Hanuman’s leap-force; the Ocean (Varuṇa’s abode) is the main barrier to be crossed; Lanka is the target; and cosmic reference points—Meru, the Sun’s course, and the Swāti constellation path—function as cultural-geographical markers for scale and navigation imagery.