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Sarga 53

स्वयम्प्रभा-विमोचनम् — Svayamprabha Leads the Vanaras Out (Time-Limit Crisis and Counsel)

किष्किन्धाकाण्ड

इस सर्ग में गुहा-बन्धन से निकलकर धर्म-संकट तक की कथा आती है। हनुमान् तपस्विनी स्वयम्प्रभा के शुभ, धर्मानुकूल वचनों का विनयपूर्वक उत्तर देते हैं। वानर शरण लेकर निवेदन करते हैं कि माया-सम्बन्धित उस अद्भुत गुहा-समूह में भटकते-भटकते सुग्रीव द्वारा दिया गया एक मास का समय बीत गया है। स्वयम्प्रभा तप और नियम के बल से उद्धार का वचन देती हैं और एक विधि बताती हैं—सब वानर आँखें मूँदकर और ढँककर रहें; तब वह क्षणभर में उन्हें बाहर पहुँचा देती हैं। बाहर लाकर वह उन्हें दिशा-देश का बोध कराती हैं—विन्ध्य, प्रस्रवण पर्वत और महा-सागर—और मंगलकामना करके पुनः गुहा में प्रवेश कर जाती हैं। बाहर वानर पुष्पित वृक्षों से वसन्त का संकेत देखकर समय-व्यतीत होने को समझते हैं; चिंता बढ़कर विषाद बन जाती है। अङ्गद विचार करके वृद्धों और वनवासियों से कहता है कि उत्तरदायित्व स्वीकार कर दण्ड से बचने हेतु प्रायोपवेशन (उपवास द्वारा देह-त्याग) ही उचित है, क्योंकि सीता का कोई चिह्न बिना लौटना प्राणदण्ड का कारण हो सकता है। अन्य वानर भी मानते हैं कि राम की तुष्टि के लिए सुग्रीव कठोर दण्ड देगा। तब तारा एक दूसरा उपाय बताती है—उसी दुर्गम, अन्न-सम्पन्न मायावी गुहा में रहना, जहाँ इन्द्र, राम या सुग्रीव का भी भय न हो। इस प्रकार वे दण्ड से बचते हुए जीवित रहकर कर्तव्य निभाने की युक्ति खोजते हैं।

Shlokas

Verse 1

एवमुक्तश्शुभं वाक्यं तापस्या धर्मसंहितम्।उवाच हनुमान्वाक्यं तामनिन्दितचेष्टिताम्।।।।

निर्दोष आचरण वाली तपस्विनी द्वारा धर्मयुक्त शुभ वचन इस प्रकार कहे जाने पर हनुमान् ने उसे उत्तर दिया।

Verse 2

शरणं त्वां प्रपन्ना स्म सर्वे वै धर्मचारिणीं।यः कृतस्समयोऽस्माकं सुग्रीवेण महात्मना।।।।स च कालो ह्यतिक्रान्तो बिले च परिवर्तताम्।

हे धर्मपरायणा देवी, हम सबने आपकी शरण ली है। महात्मा सुग्रीव ने हमारे लिए जो समय-सीमा ठहराई थी, वह अब बीत गई है, और हम इस गुफा में भटकते-भटकते ही रह गए हैं।

Verse 3

सा त्वमस्माद्बिलाद्घोरादुत्तारयितुमर्हसि।।4.53.3।।तस्मात्सुग्रीववचनादतिक्रान्तान्गतायुषः।

हे देवी, आप हमें इस भयानक बिल से निकालने योग्य हैं। सुग्रीव की आज्ञा का उल्लंघन करके हम तो मानो मृतप्राय हो गए हैं।

Verse 4

त्रातुमर्हसि नस्सर्वान्सुग्रीवभयकर्शितान्।।।।महच्चकार्यमस्माभिः कर्तव्यं धर्मचारिणि।तच्चापि न कृतं कार्यमस्माभिरिह वासिभिः।।।।

हे धर्मपरायणे! सुग्रीव के भय से पीड़ित हम सबकी रक्षा करना तुम्हें उचित है। हमारे लिए एक महान कर्तव्य करना शेष है; पर यहाँ निवास करते हुए हमसे वह कार्य अभी तक नहीं हो सका।

Verse 5

त्रातुमर्हसि नस्सर्वान्सुग्रीवभयकर्शितान्।।4.53.4।।महच्चकार्यमस्माभिः कर्तव्यं धर्मचारिणि।तच्चापि न कृतं कार्यमस्माभिरिह वासिभिः।।4.53.5।।

हे धर्मचारिणी देवी! सुग्रीव के भय से पीड़ित हम सबकी आप रक्षा कीजिए। हमारे लिए एक महान कर्तव्य करना शेष है, पर यहाँ निवास करते हुए हमसे वह कार्य भी पूरा नहीं हो सका।

Verse 6

एवमुक्ता हनुमता तापसी वाक्यमब्रवीत्।जीवता दुष्करं मन्ये प्रविष्टेन निवर्तितुम्।।।।

हनुमान् के ऐसा कहने पर तपस्विनी बोली—“जो इस स्थान में प्रवेश कर चुका हो, उसके लिए जीवित लौट आना मुझे अत्यन्त कठिन प्रतीत होता है।”

Verse 7

तपसस्तु प्रभावेन नियमोपार्जितेन च।सर्वानेव बिलादस्मादुद्धरिष्यामि वानरान्।।।।

“अपने तप के प्रभाव से और नियमों द्वारा अर्जित सामर्थ्य से मैं इस बिल से समस्त वानरों को बाहर निकाल दूँगी।”

Verse 8

निमीलयत चक्षूंषि सर्वे वानरपुङ्गवाः।न हि निष्क्रमितुं शक्यमनिमीलितलोचनैः।।4.53.8।।

“हे वानरश्रेष्ठो! तुम सब अपनी आँखें मूँद लो; क्योंकि आँखें खुली रखकर यहाँ से निकल पाना संभव नहीं है।”

Verse 9

ततस्सम्मीलितास्सर्वे सुकुमाराङ्गुलैः करैः।सहसाऽपिदधुर्दृष्टिं हृष्टा गमनकाङ्क्षया।।।।

तब प्रस्थान की उत्कंठा से हर्षित वे सब एक साथ आँखें मूँदकर, अपनी कोमल उँगलियों वाले हाथों से दृष्टि को ढँकने लगे।

Verse 10

वानरास्तु महात्मानो हस्तरुद्धमुखास्तदा।निमेषान्तरमात्रेण बिलादुत्तारितास्तया।।।।

तब वे महात्मा वानर हाथों से मुख ढाँके हुए थे; और वह उन्हें एक पलक झपकते ही उस गुफा से बाहर निकाल लाई।

Verse 11

ततस्तान्वानरान्सर्वांस्तापसी धर्मचारिणी।निस्सृतान्विषमात्तस्मात्समाश्वास्येदमब्रवीत्।।।।

फिर धर्माचरण में स्थित उस तपस्विनी ने उस संकट से निकल आए उन सब वानरों को ढाढ़स बँधाकर ये वचन कहे।

Verse 12

एष विन्ध्यो गिरिश्श्रीमान्नानाद्रुमलताकुलः।एष प्रस्रवणश्शैलस्सागरोऽयं महोदधिः।।।।स्वस्ति वोऽस्तु गमिष्यामि भवनं वानरर्षभाः।इत्युक्त्वा तद्बिलं श्रीमत्प्रविवेश स्वयम्प्रभा।।।।

“यह नाना वृक्षों और लताओं से घिरा हुआ श्रीमान् विन्ध्य पर्वत है; यह प्रस्रवण शैल है; और यह महान् समुद्र है। वानरश्रेष्ठो! तुम्हारा कल्याण हो; मैं अब अपने निवास को जाती हूँ।” ऐसा कहकर स्वयम्प्रभा उस शोभायमान गुफा में फिर प्रवेश कर गई।

Verse 13

एष विन्ध्यो गिरिश्श्रीमान्नानाद्रुमलताकुलः।एष प्रस्रवणश्शैलस्सागरोऽयं महोदधिः।।4.53.12।।स्वस्ति वोऽस्तु गमिष्यामि भवनं वानरर्षभाः।इत्युक्त्वा तद्बिलं श्रीमत्प्रविवेश स्वयम्प्रभा।।4.53.13।।

स्वयम्प्रभा ने विन्ध्य, प्रस्रवण पर्वत और उस महोदधि का दर्शन कराकर वानरश्रेष्ठों को आशीर्वाद दिया—“आप सबका कल्याण हो, अब मैं अपने धाम को जाती हूँ” ऐसा कहकर वह उस शोभायमान गुफा में फिर प्रवेश कर गई।

Verse 14

ततस्ते ददृशुर्घोरं सागरं वरुणालयम्।अपारमभिगर्जन्तं घोरैरूर्मिभिरावृतम्।।।।

तब उन्होंने वरुण के आलय उस भयानक समुद्र को देखा—जो अपार था, प्रचण्ड गर्जना कर रहा था और डरावनी तरंगों से आच्छादित था।

Verse 15

मयस्य मायाविहितं गिरिदुर्गं विचिन्वताम्।तेषां मासो व्यतिक्रान्तो यो राज्ञा समयः कृतः।।।।

मय की माया से रचित उस पर्वतीय दुर्ग में खोज करते-करते उनके लिए राजा द्वारा निश्चित एक मास की अवधि बीत गई।

Verse 16

विन्ध्यस्य तु गिरेः पादे सम्प्रपुष्पितपादपे।उपविश्य महाभागाश्चिन्तामापेदिरे तदा।।।।

तब वे महाभाग वानर विन्ध्य पर्वत के पाद में, जहाँ वृक्ष पूर्ण पुष्पित थे, बैठकर चिंता में डूब गए।

Verse 17

ततः पुष्पातिभाराग्रान् लताशतसमावृतान्।द्रुमान्वासन्तिकान्दृष्टवा बभूवुर्भयशङ्किताः।।।।

फिर वसन्तकालीन उन वृक्षों को देखकर—जिनकी चोटियाँ पुष्पों के अतिभार से झुकी थीं और जो सैकड़ों लताओं से आवृत थे—वे भय और शंका से भर गए।

Verse 18

ते वसन्तमनुप्राप्तं प्रतिबुद्ध्वा परस्परम्।नष्टसन्देशकालार्था निपेतुर्धरणीतले।।।।

वे आपस में समझ गए कि वसन्त आ पहुँचा है; और संदेश देने की नियत अवधि भी बीत चुकी है। इस बोध से व्याकुल होकर वे धरती पर गिर पड़े।

Verse 19

ततस्तान्कपिवृद्धांस्तु शिष्टांश्चैव वनौकसः।वाचा मधुरयाऽभाष्य यथावदनुमान्य च।।।।स तु सिंहवृषस्कन्धः पीनायतभुजः कपिः।युवराजो महाप्राज्ञः अङ्गदो वाक्यमब्रवीत्।।।।

तब वनवासी वानरों में जो वृद्ध और शिष्ट थे, उनसे मधुर वाणी में यथोचित बात कहकर और सब कुछ भली-भाँति विचारकर, सिंह-बैल के समान विशाल कंधों वाले, पुष्ट दीर्घ भुजाओं वाले, महाप्राज्ञ युवराज वानर अंगद ने वचन कहा।

Verse 20

ततस्तान्कपिवृद्धांस्तु शिष्टांश्चैव वनौकसः।वाचा मधुरयाऽभाष्य यथावदनुमान्य च।।4.53.19।।स तु सिंहवृषस्कन्धः पीनायतभुजः कपिः।युवराजो महाप्राज्ञः अङ्गदो वाक्यमब्रवीत्।।4.53.20।।

सिंह या वृषभ के समान विशाल कंधों वाले, पुष्ट दीर्घ भुजाओं वाले, महाप्राज्ञ युवराज वानर अंगद ने ये वचन कहे।

Verse 21

शासनात्कपिराजस्य वयं सर्वे विनिर्गताः।मासः पूर्णो बिलस्थानां हरयः किं न बुद्ध्यते।।।।

कपिराज की आज्ञा से हम सब निकले थे। और जो हम इस गुफा में ठहरे हैं, उनके लिए एक पूरा मास बीत चुका है—क्या तुम यह नहीं समझते?

Verse 22

वयमाश्वयुजे मासि कालसङ्ख्याव्यवस्थिताः।प्रस्थितास्सोऽपि चातीतः किमतः कार्यमुत्तरम्।।।।

हमने आश्वयुज मास में समय-गणना निश्चित करके प्रस्थान किया था; वह नियत काल भी अब बीत गया। अब आगे क्या कर्तव्य रह गया है?

Verse 23

भवन्तः प्रत्ययं प्राप्ताः नीतिमार्गविशारदाः।हितेष्वभिरता भर्तुर्निसृष्टास्सर्वकर्मसु।।4.53.23।।

आप सब विश्वासपात्र हैं, नीति-मार्ग में निपुण हैं; स्वामी के हित में रत रहते हैं और प्रत्येक आवश्यक कार्य के लिए नियुक्त किए गए हैं।

Verse 24

कर्मस्वप्रतिमास्सर्वे दिक्षु विश्रुतपौरुषाः।मां पुरस्कृत्य निर्याताः पिङ्गाक्षप्रतिचोदिताः।।।।

तुम सब कर्म में अनुपम हो, चारों दिशाओं में पराक्रम के लिए प्रसिद्ध हो; पिंगल-नेत्र सुग्रीव की प्रेरणा से तुमने मुझे आगे रखकर प्रस्थान किया था।

Verse 25

इदानीमकृतार्थानां मर्तव्यं नात्र संशयः।हरिराजस्य सन्देशमकृत्वा कस्सुखी भवेत्।।।।

अब हम उद्देश्य सिद्ध न कर सके, तो निःसंदेह मरना ही होगा। वानर-राज की आज्ञा पूरी किए बिना कौन सुखी रह सकता है?

Verse 26

तस्मिन्नतीते काले तु सुग्रीवेण कृते स्वयम्।प्रायोपवेशनं युक्तं सर्वेषां च वनौकसाम्।।।।

सुग्रीव द्वारा निश्चित किया हुआ समय बीत जाने पर, हम सब वनवासी वानरों के लिए प्रायोपवेशन—उपवासपूर्वक देहत्याग—करना ही उचित है।

Verse 27

तीक्ष्णः प्रकृत्या सुग्रीवस्स्वामिभावे व्यवस्थितः।न क्षमिष्यति नस्सर्वानपराधकृतो गतान्।।।।

सुग्रीव स्वभाव से ही कठोर है और अब राजा-भाव में दृढ़ प्रतिष्ठित है। हम अपराधी बनकर लौटेंगे तो वह हम सबको कभी क्षमा नहीं करेगा।

Verse 28

अप्रवृत्तौ च सीतायाः पापमेव करिष्यति।तस्मात् क्षममिहाद्यैव गन्तुं प्रायोपवेशनम् हि नः।।4.53.28।।त्यक्त्वा पुत्रांश्च दारांश्च धनानि च गृहाणि च।

सीता के विषय में प्रगति न होने पर वह केवल पाप ही करेगा (अत्यधिक या अन्यायपूर्ण दण्ड देकर)। इसलिए हमारे लिए उचित है कि आज ही यहीं प्रायोपवेशन करें—पुत्रों, पत्नियों, धन और घरों का त्याग करके।

Verse 29

धृवं नो हिंसिता राजा सर्वान्प्रतिगतानितः।।।।वधेनाप्रतिरूपेण श्रेयान्मृत्युरिहैव नः।

निश्चय ही राजा, यहाँ से लौटने पर, हम सबको सताएगा और भयानक, असाधारण प्रकार से वध का दण्ड देगा। इसलिए हमारे लिए यहीं मृत्यु ही श्रेष्ठ है।

Verse 30

न चाहं यौवराज्येन सुग्रीवेणाभिषेचितः।।।।नरेन्द्रेणाभिषिक्तोऽस्मि रामेणाक्लिष्टकर्मणा।

मुझे सुग्रीव ने युवराज्य के लिए अभिषिक्त नहीं किया। मुझे तो मनुष्यों के राजा, अक्लिष्टकर्मा श्रीराम ने अभिषेकित किया है।

Verse 31

स पूर्वं बद्धवैरो मां राजा दृष्ट्वा व्यतिक्रमम्।।।।घातयिष्यति दण्डेन तीक्ष्णेन कृतनिश्चयः।

वह राजा सुग्रीव, जो पहले से ही मुझसे बैर रखता है, मेरी इस आज्ञा-उल्लंघन रूपी गलती को देखकर निश्चय ही कठोर दंड देकर मेरा वध करवा देगा।

Verse 32

किं मे सुहृदभिर्व्यसनं पश्यद्भिर्जीवितान्तरे।।।।इहैव प्रायमासिष्ये पुण्ये सागररोधसि।

जीवन के अंत में मित्रों द्वारा मेरी विपत्ति देखने से क्या लाभ? मैं यहीं इस पवित्र समुद्र तट पर प्रायोपवेश (आमरण अनशन) करूँगा।

Verse 33

एतच्छ्रुत्वा कुमारेण युवराजेन भाषितम्।।।।सर्वे ते वानरश्रेष्ठाः करुणं वाक्यमब्रुवन्।

युवराज अंगद के द्वारा कहे गए ये वचन सुनकर, वे सभी वानरश्रेष्ठ अत्यंत करुणापूर्ण वाणी में बोले।

Verse 34

तीक्ष्णः प्रकृत्या सुग्रीवः प्रियासक्तश्च राघवः।।।।अदृष्टायां तु वैदेह्यां दृष्ट्वाऽस्मांश्त समागतान्।राघवप्रियकामार्थं घातयिष्यत्यसंशयम्।।।।

सुग्रीव स्वभाव से ही कठोर हैं और राम अपनी पत्नी के प्रति आसक्त हैं। सीता का पता न लगने पर और हमें वापस आया देख, राम को प्रसन्न करने के लिए वे निस्संदेह हमारा वध करवा देंगे।

Verse 35

तीक्ष्णः प्रकृत्या सुग्रीवः प्रियासक्तश्च राघवः।।4.53.34।।अदृष्टायां तु वैदेह्यां दृष्ट्वाऽस्मांश्त समागतान्।राघवप्रियकामार्थं घातयिष्यत्यसंशयम्।।4.53.35।।

सुग्रीव स्वभाव से ही कठोर हैं और राम अपनी पत्नी के प्रति आसक्त हैं। सीता का पता न लगने पर और हमें वापस आया देख, राम को प्रसन्न करने के लिए वे निस्संदेह हमारा वध करवा देंगे।

Verse 36

न क्षमं चापराद्धानां गमनं स्वामिपार्श्वतः।इहैव सीतामन्विष्य प्रवृत्तिमुपलभ्य वा।।।।नो चेद्गच्छाम तं वीरं गमिष्यामो यमक्षयम्।

अपराधियों के लिए स्वामी के समीप जाना उचित नहीं। हम यहीं सीता की खोज करेंगे और उसका समाचार पाकर फिर उस वीर के पास जाएंगे; और यदि ऐसा न हो सका, तो यम के अक्षय धाम को ही प्रस्थान करेंगे।

Verse 37

प्लवङ्गमानां तु भयार्दितानांश्रुत्वा वचस्तार इदं बभाषे।अलं विषादेन बिलं प्रविश्यवसाम सर्वे यदि रोचते वः।।।।

भय से व्याकुल वानरों की बातें सुनकर तारा बोली— “विषाद छोड़ो। यदि तुम्हें अच्छा लगे, तो हम सब इस गुफा में प्रवेश करके यहीं निवास करें।”

Verse 38

इदं हि मायाविहितं सुदुर्गमंप्रभूतवृक्षोदकभोज्यपेयकम्।इहास्ति नो नैव भयं पुरन्दरान्न राघवाद्वानरराजतोऽपि वा।।।।

यह स्थान माया से रचा गया अत्यन्त दुर्गम है और यहाँ बहुत-से वृक्ष, जल, भोजन और पेय उपलब्ध हैं। यदि हम यहीं रहें, तो हमें न पुरन्दर इन्द्र से भय होगा, न राघव (राम) से, और न ही वानरराज से।

Verse 39

श्रुत्वाऽङ्गदस्यापि वचोऽनुकूलमूचुश्च सर्वे हरयः प्रतीताः।यथा न हिंस्येम तथा विधानमसक्तमद्यैव विधीयतां नः।।।।

अंगद के अनुकूल वचन सुनकर सब वानर सहमत हो गए और बोले— “ऐसी युक्ति आज ही बनाई जाए कि हमें हानि न पहुँचे; और राजा की कठोर शर्तों में बँधे बिना हमारा मार्ग निश्चित किया जाए।”

Frequently Asked Questions

The dilemma is mission failure under a fixed royal deadline: the vānaras exceed Sugrīva’s one-month samaya while trapped in Maya’s magical mountain-cave, and must decide whether to return as offenders or adopt an extreme penance. Aṅgada frames prāyopaveśana (fasting unto death) as a response to breached obligation and anticipated royal punishment.

The chapter contrasts dharma-protected refuge with fear-driven despair: Svayaṃprabhā’s tapas enables liberation when approached respectfully, yet liberation immediately reopens the moral burden of accountability. The upadeśa emphasizes that ethical agency requires counsel (deliberation), truthful assessment of time and duty, and choosing strategies that preserve both collective welfare and fidelity to rightful purpose.

Svayaṃprabhā identifies key wayfinding markers for the search mission: Vindhya mountain, Prasravaṇa hill, and the great ocean (Varuṇālaya/Mahodadhi). The vānaras also infer seasonal change—spring—through flowering trees and creepers, using ecological signs as a narrative signal that time has elapsed.