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Kishkindha KandaSarga 2116 Verses

Sarga 21

ताराशोकविनोदनम् (Consolation of Tara and Counsel on Succession)

किष्किन्धाकाण्ड

इस सर्ग में वालि के निधन के बाद शोक-परामर्श का प्रसंग आता है। वरिष्ठ वानर-यूथपति और स्थिरता देने वाले मंत्री-तुल्य हनुमान, गिरी हुई तारा-सी शोकाकुल तारा के पास जाकर उसे धैर्य बँधाते हैं। वे कर्मफल के तत्त्व से समझाते हैं कि देहधारी प्राणी मृत्यु के बाद अपने पुण्य-पाप के फल भोगते हैं; शरीर क्षणभंगुर है, इसलिए अंधाधुंध विलाप तत्त्वदृष्टि से स्थिर नहीं रहता। फिर हनुमान व्यावहारिक धर्म की ओर ध्यान दिलाते हैं—शेष उत्तराधिकारी अंगद की रक्षा आवश्यक है; तत्काल कर्तव्यकर्म पूरे हों और शुभ, सुव्यवस्थित आचरण किया जाए, क्योंकि संसार अनित्य है। वे राजनीतिक रूप से भी निर्देश देते हैं कि अंगद और सुग्रीव—दोनों को प्रोत्साहित किया जाए, हरिराज के लिए अंत्येष्टि तथा राज्य-परिवर्तन के विधि-कर्म संपन्न हों, और अंगद का अभिषेक करके वैध शासन की स्थापना दिखाई दे, जिससे तारा का मन शांत हो। तारा प्रत्युत्तर में आसक्ति और अधिकार की बात रखती हैं—भविष्य के किसी विकल्प की अपेक्षा मारे गए राजा को भी अपनाना श्रेष्ठ है। वह राजनिर्णय का अधिकार अपने लिए नहीं मानती और पितृव्य होने के कारण कार्यों में सुग्रीव की प्रधानता स्वीकार करती है। अंत में वह नियति-भाव से वालि के साथ जाने का संकल्प व्यक्त करती है और गिरे हुए वीर की चिता/विश्राम-स्थली को ही अपना उचित आश्रय मानती है।

Shlokas

Verse 1

ततो निपतितां तारां च्युतां तारामिवाम्बरात्।शनैराश्वासयामास हनुमान्हरियूथपः।।

तब वानर-सेनाओं के नायक हनुमान् ने आकाश से गिरी हुई तारा के समान धरती पर पड़ी हुई तारा को धीरे-धीरे ढाढ़स बँधाया।

Verse 2

गुणदोषकृतं जन्तुस्स्वकर्म फलहेतुकम्।अव्यग्रस्तदवाप्नोति सर्वं प्रेत्य शुभाशुभम्।।

गुण और दोष से प्रेरित कर्मों के फल का कारण यह जीव स्वयं है; और वह परलोक में जाकर, बिना व्याकुल हुए, अपने कर्मानुसार शुभ-अशुभ सब फल भोगता है।

Verse 3

शोच्या शोचसि कं शोच्यं दीनं दीनाऽनुकम्पसे।कस्य कोवाऽनुशोच्योऽस्ति देहेऽस्मिन् बुद्बुदोपमे।।

तुम स्वयं करुणा के योग्य होकर किसके लिए शोक करती हो, और किस दीन पर दया करती हो? इस बुलबुले-से क्षणभंगुर शरीर में किसका कौन है, जो शोक का पात्र हो?

Verse 4

अङ्गदस्तु कुमारोऽयं द्रष्टव्यो जीवपुत्रया।अयत्यां च विधेयानि समर्थान्यस्य चिन्तय।।

यह कुमार अङ्गद तुम्हारे द्वारा अवश्य सँभाला जाए, क्योंकि तुम्हारा पुत्र (वंश) जीवित है; और इसके भविष्य के लिए जो-जो उचित कर्तव्य तुम कर सकती हो, उनका विचार करो।

Verse 5

जानास्यनियतामेवं भूतानामागतिं गतिम्।तस्माच्छुभं हि कर्तव्यं पण्डितेनैह लौकिकम्।।।।

तुम भली-भाँति जानते हो कि प्राणियों का आना-जाना अनिश्चित है। इसलिए इस लोक में पण्डित पुरुष को निश्चय ही शुभ और धर्मसम्मत कर्म करना चाहिए॥

Verse 6

यस्मिन्हरिसहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च।वर्तयन्ति कृतांशानि सोऽयं दिष्टान्तमागतः।।

जिस पर हजारों वानर—हाँ, लाखों-करोड़ों तक—अपनी आशाएँ स्थिर करके निर्भर थे, वही अब अपने कर्मों के फल भोगने हेतु नियति के अन्त को प्राप्त हो गया है।

Verse 7

यदयं न्यायदृष्टार्थस्सामदानक्षमापरः।गतो धर्मजितां भूमिं नैनं शोचितुमर्हसि।।

यह वीर न्याय को स्पष्ट देखता था और साम, दान तथा क्षमा में तत्पर था। वह धर्म से विजय पाने वालों के लोक को गया है; इसलिए तुम्हें उसके लिए शोक करना उचित नहीं।

Verse 8

सर्वे हि हरिशार्दूलाः पुत्रश्चायं तवाङ्गदः।इदं हर्यृक्षपतिराज्यं च त्वत्सनाथमनिन्दिते।।

हे अनिन्दिते, ये सब सिंह-सम वानर और तुम्हारा पुत्र अङ्गद—तथा यह समस्त वानर-ऋक्षों का राज्य—सब तुम्हारे ही सहारे सुरक्षित और समर्थ हैं।

Verse 9

ताविमौ शोकसन्तप्तौ शनैः प्रेरय भामिनि।त्वया परिगृहीतोऽयमङ्गदश्शास्तु मेदिनीम्।।

हे भामिनि! शोक से संतप्त इन दोनों को धीरे-धीरे धैर्य बँधाकर प्रेरित करो। तुम्हारे संरक्षण में यह अंगद पृथ्वी (राज्य) का शासन करे।

Verse 10

सन्ततिश्च यथा दृष्टा कृत्यं यच्चापि साम्प्रतम्।राज्ञस्तत्क्रियतां सर्वमेष कालस्य निश्चयः4.21.10।।

उत्तराधिकारी को जैसा देखा गया है और इस समय जो कर्तव्य है, वह सब राजा के लिए यथाविधि किया जाए—यही काल की निश्चित माँग है।

Verse 11

संस्कार्यो हरिराजश्च अङ्गदश्चाभिषिच्यताम्।सिंहासनगतं पुत्रं पश्यन्ती शान्तिमेष्यसि।।

वानर-राज के अन्त्येष्टि तथा राजोचित संस्कार विधिपूर्वक किए जाएँ और अङ्गद का अभिषेक हो। अपने पुत्र को सिंहासन पर आसीन देखकर तुम शान्ति पाओगी॥

Verse 12

सा तस्य वचनं श्रुत्वा भर्तृव्यसनपीडिता।अब्रवीदुत्तरं तारा हनूमन्तमवस्थितम्।।

उसके वचन सुनकर, पति-विपत्ति से पीड़ित तारा ने, प्रतीक्षा में खड़े हनुमान् को उत्तर दिया॥

Verse 13

अङ्गदप्रतिरूपाणां पुत्राणामेकतश्शतम्।हतस्याप्यस्य वीरस्य गात्रसंश्लेषणं वरम्।।

अङ्गद के समान रूप वाले सौ पुत्र भी एक ओर हों, तो भी इस वीर के—मृत होने पर भी—शरीर का आलिंगन करना ही श्रेष्ठ है॥

Verse 14

न चाहं हरिराजस्य प्रभवाम्यङ्गदस्य वा।पितृव्यस्तस्य सुग्रीवस्सर्वकार्येष्वनन्तरः4.21.14।।

अब न तो वानर-राज पर मेरा अधिकार है, न अङ्गद पर। उसके लिए पितृव्य सुग्रीव ही समस्त कार्यों में निकटतम अधिकारी हैं॥

Verse 15

न ह्येषाबुद्धिरास्थेया हनूमन्नङ्गदं प्रति।पिता हि बन्धुः पुत्रस्य न माता हरिसत्तम।।

हे हनुमान्, अङ्गद के विषय में ऐसी बुद्धि धारण करना उचित नहीं। पुत्र का सच्चा बन्धु और रक्षक पिता ही होता है, माता नहीं, हे वानरश्रेष्ठ।

Verse 16

न हि मम हरिराजसंश्रयात्क्षमतरमस्ति परत्र चेह वा।अभिमुखहतवीरसेवितंशयनमिदं मम सेवितुं क्षमम्।।

मेरे लिए—इस लोक में हो या परलोक में—वानरराज का आश्रय लेने से बढ़कर कोई सुरक्षित और उपयुक्त शरण नहीं। जो शय्या मेरे सामने मारे गए उस वीर द्वारा सेवित थी, उसी पर शयन करना मेरे लिए उचित है।

Frequently Asked Questions

The chapter addresses the governance dilemma immediately after a ruler’s death: how to balance personal grief (Tara’s mourning) with public duty—performing rites, stabilizing the polity, and establishing succession through Angada’s consecration while managing Sugriva’s role.

Hanuman’s upadeśa links mourning to metaphysics: beings reap karmic results after death, the body is bubble-like and impermanent, and therefore the wise redirect emotion into auspicious, duty-aligned action—yet Tara’s response preserves the text’s realism about attachment and limits of agency.

Cultural institutions are central rather than geography: royal saṃskāra (transition rites), abhiṣeka (consecration), the siṃhāsana (throne) as legitimacy-symbol, and the funerary resting place/pyre as the locus of Tara’s final resolve; the setting presumes the Kishkindha vanara kingdom.