Uttara BhagaAdhyaya 127 Verses

The Description of the Glory of Dvādaśī

अध्याय की शुरुआत हरि के भुजाओं और कमल-चरणों की मंगल-वंदना से होती है, जिससे वैष्णव संरक्षण और कृपा का भाव स्थापित होता है। राजा मंधाता वसिष्ठ से पूछते हैं कि पापरूपी भयावह ईंधन को जलाने वाली ‘अग्नि’ कौन-सी है—अज्ञान से किए पाप ‘सूखे’ और जान-बूझकर किए पाप ‘गीले’ कैसे भेदित हैं, तथा भूत-भविष्य-वर्तमान के पापों का क्या उपाय है। वसिष्ठ बताते हैं कि यह शुद्धि-अग्नि हरि का पवित्र दिन एकादशी है—संयम, उपवास, मधुसूदन-पूजन, धात्री/आँवला-स्नान और रात्रि-जागरण सहित। एकादशी सैकड़ों जन्मों के पाप भस्म करती है और अश्वमेध-राजसूय से भी बढ़कर फल देती है; आरोग्य, उत्तम दांपत्य, पुत्र, राज्य, स्वर्ग और मोक्ष का वरदान बताती है। प्रसिद्ध तीर्थों की तुलना में हरि-दिन का व्रत ही विष्णुधाम-प्राप्ति का निर्णायक साधन कहा गया है; इसका फल मातृ, पितृ और वैवाहिक कुल के संबंधियों तक का उद्धार करता है। द्वादशी को इस व्रत की पूर्णता देने वाली अंतिम ‘अग्नि’ कहा गया है, जो विष्णुलोक ले जाकर पुनर्जन्म रोकती है।

Shlokas

Verse 1

पांतु वो जलदश्यामाः शार्ङ्गज्याघातकर्कशाः । त्रैलोक्यमंडपस्तंभाश्चत्वारो हरिबाहवः ॥ १ ॥

मेघ-श्याम, शार्ङ्ग धनुष की प्रत्यंचा के आघात से कठोर, और त्रैलोक्य-मंडप के स्तम्भ समान—हरि की वे चार भुजाएँ आप सबकी रक्षा करें।

Verse 2

सुरा सुरशिरोरत्ननिघृष्टमणिरंजितम् । हरिपादांबुजद्वंद्वमभीष्टप्रदमस्तु नः ॥ २ ॥

देवों और असुरों के मुकुट-रत्नों के स्पर्श से दमकते मणियों से विभूषित श्रीहरि के चरण-कमलों का युगल हमारे समस्त अभीष्टों को प्रदान करे।

Verse 3

मांधातोवाच । पापेंधनस्य घोरस्य शुष्कार्द्रस्य द्विजोत्तम । को वह्निर्दहते तस्य तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥ ३ ॥

मांधाता बोले—हे द्विजश्रेष्ठ! पापरूपी भयानक ईंधन—चाहे सूखा हो या आर्द्र—उसे कौन-सी अग्नि भस्म करती है? कृपा कर मुझे बताइए।

Verse 4

नाज्ञातं त्रिषु लोकेषु चतुर्मुखसमुद्भव । विद्यते तव विप्रेंद्र त्रिविधस्य सुनिश्चितम् ॥ ४ ॥

हे विप्रेंद्र! चतुर्मुख ब्रह्मा से उत्पन्न आप के लिए तीनों लोकों में कुछ भी अज्ञात नहीं है; त्रिविध उपदेश में आपका निश्चय दृढ़ रूप से स्थापित है।

Verse 5

अज्ञातं पातकं शुष्कं ज्ञातं चार्द्रमुदाहृतम् । भाव्यं वाप्यथवातीतं वर्तमानं वदस्व नः ॥ ५ ॥

अज्ञान से किया गया पातक ‘शुष्क’ कहा जाता है और जान-बूझकर किया गया ‘आर्द्र’ (चिपकने वाला) कहा गया है; जो होने वाला है, जो बीत गया है और जो वर्तमान है—उस पाप के विषय में भी हमें बताइए।

Verse 6

वह्निना केन तद्भस्म भवेदेतन्मतं मम । वसिष्टं उवाच । श्रूयतां नृपशार्दूल वह्निना येन तद्भवेत् ॥ ६ ॥

“किस अग्नि से वह भस्म उत्पन्न होती है—यही मेरा मत है।” वसिष्ठ बोले—“हे नृपशार्दूल! सुनो, जिस अग्नि से वह (भस्म) बनती है, उसे मैं बताता हूँ।”

Verse 7

भस्म शुष्कं तथार्द्रं च पापमस्य ह्यशेषतः ॥ ७ ॥

उसका पाप पूर्णतः नष्ट हो जाता है—भस्म के समान—चाहे वह भस्म सूखी हो या गीली।

Verse 8

अवाप्य वासरं विष्णोर्यो नरः संयतेंद्रियः । उपवासपरो भूत्वा पूजयेन्मधुसूदनम् ॥ ८ ॥

विष्णु के पावन दिन को पाकर, इन्द्रियों को वश में रखने वाला मनुष्य उपवास में तत्पर होकर मधुसूदन की पूजा करे।

Verse 9

स धात्रीस्नानसहितो रात्रौ जागरणान्वितः । विशोधयति पापानि कितवो हि यथा धनम् ॥ ९ ॥

जो धात्री (आँवला) से संबद्ध स्नान करता है और रात्रि में जागरण करता है, वह पापों को वैसे शुद्ध कर देता है जैसे जुआरी धन को (चतुराई से) साफ कर देता है।

Verse 10

एकदाशीसमाख्येन वह्निना पातकेंधनम् । भस्मतां याति राजेंद्र अपि जन्मशतोद्भवम् ॥ १० ॥

हे राजेन्द्र! एकादशी नामक अग्नि से पापरूपी ईंधन—जो सौ जन्मों में भी संचित हो—भस्म हो जाता है।

Verse 11

नेदृश पावनं किंचिन्नराणां भूप विद्यते । यादृशं पद्मनाभस्य दिनं पातकहानिदम् ॥ ११ ॥

हे भूप! मनुष्यों के लिए पद्मनाभ (विष्णु) का वह पावन दिन—जो पापों का नाश करता है—उसके समान कोई और पवित्र करने वाला नहीं है।

Verse 12

तावत्पापानि देहेऽस्मिंस्तिष्ठंति मनुजाधिप । यावन्नोपवसेज्जंतुः पद्मनाभदिनं शुभम् ॥ १२ ॥

हे मनुजाधिप! जब तक जीव पद्मनाभ (विष्णु) के पावन दिन का शुभ उपवास नहीं करता, तब तक इस देह में पाप जमे रहते हैं।

Verse 13

अश्वमेधसहस्राणि राजसूयशतानि च । एकादश्युपवासस्य कलां नार्हंति षोडशीम् ॥ १३ ॥

हज़ार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ भी एकादशी-उपवास के पुण्य के सोलहवें अंश के बराबर नहीं होते।

Verse 14

एकादशेंद्रियैः पापं यत्कृतं भवति प्रभो । एकादश्युपवासेन तत्सर्वं विलयं व्रजेत् ॥ १४ ॥

हे प्रभो! ग्यारह इन्द्रियों से जो पाप किया जाता है, एकादशी-उपवास से वह सब नष्ट हो जाता है।

Verse 15

एकादशीसमं किंचित्पापनाशं न विद्यते । व्याजेनापि कृता राजन्न दर्शयति भास्करिम् ॥ १५ ॥

हे राजन्! एकादशी के समान पाप-नाशक कोई साधन नहीं। बहाने से भी की जाए तो भी वह पाप-फल के प्रकट होने नहीं देती।

Verse 16

स्वर्गमोक्षप्रदा ह्येषा राज्यपुत्रप्रदायिनी । सुकलत्रप्रदा ह्येषा शरीरारोग्यदायिनी ॥ १६ ॥

यह व्रत स्वर्ग और मोक्ष देने वाला है, राज्य और सुपुत्र प्रदान करने वाला है; यह सुकलत्र देता है और शरीर को निरोग करता है।

Verse 17

न गंगा न गया भूप न काशी न च पुष्करम् । न चापि कैरवं क्षेत्रं न रेवा न च देविका ॥ १७ ॥

हे भूप! न गंगा, न गया, न काशी, न पुष्कर; न कैरव-क्षेत्र, न रेवा, न देविका—ये सब अपने-आप में परम-लक्ष्य का निर्णायक साधन नहीं हैं।

Verse 18

यमुना चंद्रभागा च पुण्या भूप हरेर्दिनात् । अनायासेन राजेंद्र प्राप्यते हरिमंदिरम् ॥ १८ ॥

हे भूप! यमुना और चंद्रभागा पवित्र हैं; हे राजेंद्र, हरि के दिन का पालन करने से अनायास ही हरि-धाम प्राप्त होता है।

Verse 19

रात्रौ जागरण कृत्वा समुपोष्य हरेर्दिनम् । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके व्रजेन्नरः ॥ १९ ॥

रात्रि में जागरण करके और हरि के दिन का विधिपूर्वक उपवास करके मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को जाता है।

Verse 20

दशैव मातृके पक्षे दश राजेंद्र पैतृके । भार्याया दश पक्षे च पुरुषानुद्धरेत्तथा ॥ २० ॥

हे राजेंद्र! मातृ-पक्ष में दस, पितृ-पक्ष में भी दस, और पत्नी-पक्ष में भी दस—इस प्रकार (इन) पुरुषों का उद्धार करना चाहिए।

Verse 21

आत्मानमपि राजेंद्र स नयेद्वैष्णवं पुरम् । चिंतामणिसमा ह्येषा अथवापि निधेः समा ॥ २१ ॥

हे राजेंद्र! वह अपने-आप को भी वैष्णव-पुर (विष्णु-धाम) तक ले जाता है। यह तो चिंतामणि के समान, अथवा खजाने के समान है।

Verse 22

संकल्पपादपप्रख्या वेदवाक्योपमाथवा । द्वादशीं ये प्रपन्ना हि नरा नरवरोत्तम ॥ २२ ॥

हे नरश्रेष्ठ! जो लोग द्वादशी का आश्रय लेकर उसका व्रत करते हैं, वे अपने संकल्प में कल्पवृक्ष के समान और वेद-वचनों के तुल्य माने जाते हैं।

Verse 23

ते द्वंद्वबाहवो जाता नागारिकृतवाहनाः । स्रग्विणः पीतवस्त्राश्च प्रयांति हरिमंदिरम् ॥ २३ ॥

वे सुडौल और बलवान भुजाओं से युक्त हो जाते हैं; उनके वाहन शोभायमान और सुसज्जित होते हैं; माला धारण किए, पीत वस्त्र पहने, वे हरि के मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं।

Verse 24

एष प्रभावो हि मया द्वादश्याः परिकीर्तितः । पापेंधनस्य घोरस्य पावकाख्यो महीपते ॥ २४ ॥

हे महीपते! मैंने इस प्रकार द्वादशी का प्रभाव कहा है; वह घोर पापरूपी ईंधन को भस्म करने वाली ‘पावक’ अर्थात अग्नि कहलाती है।

Verse 25

हरेर्द्दिनं सदोपोष्यं नरैर्धर्मपरायणैः । इच्छद्भिर्विपुलान्योगान्पुत्रपौत्रादिकाँस्तथा ॥ २५ ॥

धर्मपरायण मनुष्यों को हरि के दिन का सदा उपवासपूर्वक पालन करना चाहिए—विशेषकर उन्हें जो पुत्र, पौत्र आदि सहित विपुल कल्याण-फल चाहते हैं।

Verse 26

हरिदिनमिह मर्त्यो यः करोत्यादरेण नरवर स तु कुक्षिं मातुराप्नोति नैव । बहुवृजिनसमेतोऽकामतः कामतो वा व्रजति पदमनंतं लोकनाथस्य विष्णोः ॥ २६ ॥

हे नरश्रेष्ठ! जो मर्त्य इस लोक में हरिदिन को श्रद्धापूर्वक करता है, वह फिर माता के गर्भ में नहीं आता। बहुत पापों से युक्त हो—अनजाने या जान-बूझकर—तथापि वह लोकनाथ विष्णु के अनंत पद को प्राप्त होता है।

Verse 27

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणोत्तरभागे द्वादशीमाहात्म्यवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

इस प्रकार श्री बृहन्नारदीय पुराण के उत्तर-भाग में ‘द्वादशी-माहात्म्य-वर्णन’ नामक प्रथम अध्याय समाप्त हुआ ॥१॥

Frequently Asked Questions

Because the chapter treats Ekādaśī observance (fasting, self-mastery, worship, vigil) as a ritualized purifier that reduces pāpa to ‘ashes,’ explicitly destroying both unintentional (‘dry’) and intentional (‘moist’) sin, even across many births.

Self-restraint, fasting, worship of Madhusūdana (Viṣṇu), bathing linked with dhātrī/āmalakī, and keeping vigil through the night; Dvādaśī is praised as the powerful completion that seals the sin-burning result.

It claims Ekādaśī’s purifying power surpasses famed tīrthas as a decisive means and exceeds large śrauta rites (Aśvamedha, Rājasūya) in merit, presenting vrata-bhakti as a more direct path to Viṣṇuloka and mokṣa.