Adhyaya 90
DharmaVirtueTeachings27 Shlokas

Adhyaya 90: The Slaying of Shumbha and the Reabsorption of the Goddesses into Ambika

शुम्भवधः (Śumbhavadhaḥ)

Dharma Teachings

इस अध्याय में देवी अम्बिका शुम्भ के साथ घोर युद्ध करती हैं। शुम्भ का अहंकार, उसकी माया और दानव-सेना देवी के तेज से नष्ट हो जाती है और अंततः शुम्भ का वध होता है। फिर जो-जो देवियाँ अलग-अलग रूपों में प्रकट हुई थीं, वे सब अम्बिका में पुनः लीन हो जाती हैं; देवगण स्तुति करते हैं और जगत में शांति स्थापित होती है।

Divine Beings

Ambikā (Devī, Caṇḍikā, Parameśvarī)Brahmāṇī (as part of the reabsorbed devī host)Other devīs (collective vibhūtayaḥ, reabsorbed manifestations)Deva-gaṇas (celestial gods as witnesses)GandharvasApsarogaṇas

Celestial Realms

Gagana (the aerial sphere where niyuddha occurs)

Key Content Points

Śumbha, enraged by Niśumbha’s death, challenges the Goddess and charges her with depending on allied powers (balāśraya).The Goddess articulates a non-dual śāktic claim: all devīs are her own vibhūtis, which visibly re-enter Ambikā, leaving a single combatant.A prolonged, multi-phased battle unfolds—astric exchanges, disarming sequences, and hand-to-hand combat including aerial niyuddha—demonstrating the Goddess’s supremacy over asuric force.Śumbha is slain when the Goddess pierces his chest with a śūla; his fall is depicted as shaking the earth with oceans and mountains.Cosmic auspiciousness returns immediately: portents cease, weather calms, the sun shines clearly, and devas, gandharvas, and apsarases celebrate the restoration of dharmic order.

Focus Keywords

Markandeya Purana Adhyaya 90Devi Mahatmyam Chapter 90Shumbha VadhaŚumbhavadha Markandeya PuranaAmbika Chandika battleSavarṇika Manvantara Devi Mahatmyamnon-dual Shakti doctrinegoddesses reabsorbed into Ambika

Shlokas in Adhyaya 90

Verse 1

ऋषिर्उवाच। निशुम्भं निहतं दृष्ट्वा भ्रातरं प्राणसम्मितम्। हन्यमानं बलं चैव शुम्भः क्रुद्धोऽब्रवीद्वचः॥

ऋषि बोले—अपने प्राणों के समान प्रिय भाई निशुम्भ को मरा हुआ और अपनी सेना को नष्ट होते देखकर, क्रोध से भरकर शुम्भ ने ये वचन कहे।

Verse 2

बलावलेपाद्दुष्टे त्वं मा दुर्गे गर्वमावह । अन्यासां बलमाश्रित्य युध्यसे यातिमानिनी ॥

अरे दुष्टे! हे दुर्गा, अपने बल के कारण घमंड मत कर। तू दूसरों के बल का सहारा लेकर युद्ध करती है, हे अत्यन्त अभिमानिनी!

Verse 3

श्रीदेव्युवाच । एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा । पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः ॥

देवी बोली—इस जगत में मैं ही एकमात्र हूँ; मेरे अतिरिक्त दूसरा कौन है? हे दुष्ट, देखो, मेरी ये विभूतियाँ मुझमें ही पुनः प्रवेश कर रही हैं।

Verse 4

ऋषिरुवाच । ततः समस्तास्ता देव्यो ब्रह्माणीप्रमुखा लयम् । तस्या देव्यास्तनौ जग्मुरेकावासीत्तदाम्बिका ॥

ऋषि बोले—तब ब्राह्मणी आदि समस्त देवियाँ देवी के शरीर में लीन हो गईं। तब केवल अम्बिका ही शेष रहीं।

Verse 5

श्रीदेव्युवाच । अहं विभूत्या बहुभिरिह रूपैर्यदास्थिता । तत्संहृतं मयैकैव तिष्ठाम्याजौ स्थिरो भव ॥

देवी बोलीं—‘जब मैं अपनी दिव्य विभूति से अनेक रूपों में यहाँ प्रतिष्ठित हुई थी, वह सब अब मैंने समेट लिया है। मैं सचमुच अकेली खड़ी हूँ। युद्ध में धैर्य रखो!’

Verse 6

ऋषिह्रुवाच । ततः प्रववृते युद्धं देव्याः शुम्भस्य चोभयोः । पश्यतां सर्वदेवानां असुराणां च दारुणम् ॥

ऋषि बोले—तब देवी और शुम्भ के बीच अत्यन्त भयानक युद्ध आरम्भ हुआ, जिसे सभी देवों और दैत्यों ने देखा।

Verse 7

शरवर्षैः शितैः शस्त्रैस्तथा चास्त्रैः सुदारुणैः । तयोर्युद्धमभूद् भूयः सर्वलोकभयङ्करम् ॥

तीक्ष्ण बाणों की वर्षा, शस्त्रों और अत्यन्त भयानक अस्त्रों के प्रहार से उन दोनों का युद्ध फिर छिड़ गया, जो समस्त लोकों के लिए आतंककारी था।

Verse 8

दिव्यान्यस्त्राणि शतशो मुमुचे यान्यथाम्बिका । बभञ्ज तानि दैत्येन्द्रस्तत्प्रतीघातकर्तृभिः ॥

अम्बिका ने जो-जो दिव्य अस्त्र सैकड़ों की संख्या में छोड़े, दैत्यों के स्वामी ने उन्हें निष्प्रभावी करने वाले अपने शस्त्रों से एक-एक कर तोड़ डाला।

Verse 9

मुक्तानि तेन चास्त्राणि दिव्यानि परमेś्वरि । बभञ्ज लीलयैवोग्रहुंकारोच्चारणादिभिः ॥

हे परमेश्वरी! उसके द्वारा छोड़े गए दिव्य अस्त्रों को देवी ने भयानक हुंकार आदि तीव्र नादों से सहज ही चूर-चूर कर दिया।

Verse 10

ततः शरशतैर्देवीमाच्छादयत सोऽसुरः । सा च तत्कुपिता देवी धनुश्चिच्छेद चेṣुभिः ॥

तब उस असुर ने सैकड़ों बाणों से देवी को ढक दिया। इससे क्रुद्ध होकर देवी ने अपने बाणों से उसका धनुष टुकड़े-टुकड़े कर दिया।

Verse 11

छिन्ने धनुषि दैत्येन्द्रस्तथा शक्तिमथाददे । चिच्छेद देवी चक्रेण तामप्यस्य करे स्थिताम् ॥

धनुष कट जाने पर दैत्यों के स्वामी ने शक्ति (भाला) उठा ली। देवी ने उसे भी, उसके हाथ में रहते हुए ही, अपने चक्र से काट डाला।

Verse 12

ततः खड्गमुपादाय शतचन्द्रं च भानुमत् । अभ्यधावत्तदा देवीṃ दैत्यानामधिपेś्वरः ॥

फिर दैत्यों का वह राजा तलवार और सौ चंद्रचिह्नों से अंकित चमकती ढाल लेकर देवी पर झपट पड़ा।

Verse 13

तस्यापतत एवाशु खड्गं चिच्छेद चण्डिका । धनुर्मुक्तैः शितैर्बाणैश्चर्म चार्ककरामलम् ॥

उसके आक्रमण करते ही चण्डिका ने शीघ्र उसका खड्ग काट दिया; और धनुष से छोड़े गए तीक्ष्ण बाणों से सूर्यकिरणों-सा चमकता उसका ढाल भी बेध दिया।

Verse 14

अश्वांश्च पातयामास रथं सारथिना सह । हताश्वः स तदा दैत्यश्छिन्नधान्वा विसारथिः । जग्राह मुद्गरं घोरमम्बिकानिधनodyataḥ ॥

उसने उसके घोड़ों को, रथ को और सारथी सहित सबको मार गिराया। तब वह दैत्य, घोड़े मारे गए, धनुष टूट गया और सारथी रहित होकर, अम्बिका का वध करने को उद्यत भयंकर गदा उठा लाया।

Verse 15

चिच्छेदापततस्तस्य मुद्गरं निशितैः शरैः । तथापि सोऽभ्यधावत्तां मुṣ्टिमुद्यम्य वेगवान् ॥

वह आगे बढ़ा तो देवी ने तीखे बाणों से उसकी गदा काट दी। फिर भी क्रोध से वेगवान होकर वह मुट्ठी उठाए हुए उस पर झपटा।

Verse 16

स मुṣ्टिं पातयामास हृदये दैत्यपुṅ्गवः । देव्यास्तं चापि सा देवी तलेनोरस्यताडयत् ॥

दैत्य-श्रेष्ठ उस ने मुट्ठी से उसके वक्ष पर प्रहार किया; और देवी ने भी उसके वक्ष पर अपने कर-तल से आघात किया।

Verse 17

तलप्रहाराभिहतो निपपात महीतले । स दैत्यराजः सहसा पुनरेव तथोत्थितः ॥

उसके कर-तल के प्रहार से वह दैत्यराज भूमि पर गिर पड़ा; परन्तु वह सहसा फिर उठ खड़ा हुआ।

Verse 18

उत्पत्य च प्रगृह्योच्चैर्देवीं गगनमास्थितः । तत्रापि सा निराधारा युयुधे तेन चण्डिका ॥

उछलकर और देवी को पकड़कर वह आकाश में बहुत ऊँचा उठ गया। वहाँ भी, बिना किसी आधार के, चण्डिका उससे युद्ध करती रही।

Verse 19

नियुद्धं खे तदा दैत्यश्चण्डिका च परस्परम् । चक्रतुः प्रथमं सिद्धमुनिविस्मयकारकम् ॥

तब वह दैत्य और चण्डिका आकाश में पहले-पहल निकट युद्ध में भिड़े; वह अद्भुत संग्राम सिद्ध ऋषियों को विस्मित करने वाला था।

Verse 20

ततो नियुद्धं सुचिरं कृत्वा तेनाम्बिका सह । उत्पाट्य भ्रामयामास चिक्षेप धरणीतले ॥

फिर अम्बिका के साथ बहुत देर तक निकट युद्ध करने के बाद उसने उसे पकड़ लिया, घुमाया और भूमि पर पटक दिया।

Verse 21

स क्षिप्तो धरणीं प्राप्य मुष्टिमुद्यम्य वेगितः । अभ्यधावत दुष्टात्मा चण्डिकानिधनेच्छया ॥

भूमि पर गिराई गई वह धरती पर आ लगी; तब वह दुष्टात्मा मुट्ठी उठाकर क्रोध में दौड़ा और चण्डिका को मार डालने की इच्छा से आगे बढ़ा।

Verse 22

तमायान्तं ततो देवी सर्वदैत्यजनेश्वरम् । जगत्यां पातयामास भित्त्वा शूलेन वक्षसि ॥

तब देवी ने पृथ्वी पर आते हुए समस्त दैत्य-गणों के अधिपति उस अग्रसर को अपने शूल से वक्षस्थल भेदकर धरती पर गिरा दिया।

Verse 23

स गतासुः पपातोर्व्यां देवीशूलाग्रविक्षतः । चालयन् सकलां पृथ्वीं साब्धिद्वीपां स पर्वताम् ॥

देवी के शूल की नोक से विद्ध होकर वह निर्जीव भूमि पर गिर पड़ा; उसके गिरने से समुद्र, द्वीप और पर्वतों सहित समस्त जगत् काँप उठा।

Verse 24

ततः प्रसन्नमखिलं हते तस्मिन् दुरात्मनि । जगत्स्वास्थ्यमतीवाप निर्मलं चाभवन्नभः ॥

तब उस दुष्ट के मारे जाने पर सब कुछ शांत हो गया; जगत् ने महान कल्याण पाया और आकाश निर्मल हो गया।

Verse 25

उत्पातमेघाः सोल्का ये प्रागासंस्ते शमं ययुः । सरितो मार्गवाहिन्यस्तथासंस्तत्र पातिते ॥

पहले जो उल्काओं सहित अपशकुन-सूचक बादल थे वे शांत हो गए; और जो नदियाँ विकृत मार्गों में बह रही थीं, उसके वहीं गिरने पर अपने-अपने उचित पथ में लौट आईं।

Verse 26

ततो देवगणाः सर्वे हर्षनिर्भमानसाः । बभूवुर्निहते तस्मिन् गन्धर्वा ललितं जगुः ॥

उसके मारे जाने पर तब समस्त देवगण आनंद से भर गए, और गन्धर्व मधुर गान करने लगे।

Verse 27

अवादयंस् तथैवान्ये ननृतुश्चाप्सरोगणाः । ववुः पुण्यास्तथा वाताः सुप्रभोऽभूद्दिवाकरः ॥

अन्योंने वाद्य बजाए; अप्सराओं के समूह नृत्य करने लगे। शुभ पवन बहने लगे और सूर्य अद्भुत तेज से चमक उठा।

Frequently Asked Questions

The chapter addresses the theological challenge of apparent plurality in divine power: Śumbha claims the Goddess depends on others, and she replies with a non-dual assertion that all devīs are her own vibhūtis, collapsing multiplicity into a single sovereign śakti.

Placed within the Sāvarṇika Manvantara setting of the Devīmāhātmya, this Adhyaya functions as a Manvantara-era exemplum: a crisis of asuric rule is resolved by the Goddess, reaffirming cosmic governance and dharmic stability characteristic of Manvantara historiography.

It delivers the Devīmāhātmya’s climactic doctrinal and narrative closure: the devī host is reabsorbed into Ambikā to demonstrate ekatva (oneness) of śakti, and Śumbha’s death by the śūla confirms the Goddess as the supreme, self-sufficient divine agency restoring universal auspiciousness.