
कूर्मनिवेशो नाम एकोनषष्टितमोऽध्यायः (Kūrmaniveśa-nāma Ekonaṣaṣṭitamo ’dhyāyaḥ)
Markandeya and Vishnu
इस अध्याय में जगत् की दिव्य भूगोल-रचना और युगों का क्रम बताया गया है। जम्बूद्वीप में मेरु के चारों ओर स्थित भद्राश्व और केतुमाल क्षेत्रों का स्वरूप, वहाँ के निवासियों की प्रकृति, देव-पूजन और समृद्धि का वर्णन है। उत्तरकुरु प्रदेश को विशेष पुण्यभूमि कहा गया है, जहाँ धर्म सहज है, ऋतुएँ सम हैं, आयु दीर्घ और जीवन सुखमय है। कूर्मनिवेश के प्रसंग से लोक-विभाग, दिशाओं की मर्यादा तथा युगानुसार धर्म के ह्रास-वृद्धि का संक्षिप्त निरूपण किया गया है।
Verse 1
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे कूर्मनिवेशो नामाष्टपञ्चाशोऽध्यायः । ऊनषष्टितमोऽध्यायः- ५९ । मार्कण्डेय उवाच । एवंतु भारतं वर्षं यथावत् कथितं मुने । कृतं त्रेता द्वापरञ्च तथाथिष्यम् चतुष्टयम् ॥
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराण का ‘कूर्म-निवेश’ नामक अट्ठावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ। अब उनसठवाँ अध्याय (आरम्भ होता है)। मार्कण्डेय बोले—हे मुनिवर! इस प्रकार भारतवर्ष का सम्यक् वर्णन किया गया; तथा कृत, त्रेता, द्वापर और कली—ये चार युग भी जानने योग्य हैं।
Verse 2
अत्रैवैतद्युगानान्तु चातुर्वर्ण्योऽत्र वै द्विज । चत्वारि त्रीणि द्वे चैव तथैकञ्च शरच्छतम् ॥
हे द्विजश्रेष्ठ! यहाँ निश्चय ही चातुर्वर्ण्य व्यवस्था विद्यमान है। और यहाँ युग-क्रम के अनुसार आयु क्रमशः चार सौ, तीन सौ, दो सौ और एक सौ वर्ष होती है।
Verse 3
जीवन्त्यत्र नरा ब्रह्मन् ! कृतत्रेतादिके क्रमात् । देवकूटस्य पूर्वस्य शैलेन्द्रस्य महात्मनः ॥
हे ब्राह्मण! यहाँ मनुष्य कृत और त्रेता आदि युगों के क्रम के अनुसार रहते हैं। यह प्रदेश महापर्वतराज देवकूट के पूर्व में स्थित है।
Verse 4
पूर्वेण यत् स्थितं वर्षं भद्राश्वं तन्निबोध मे । श्वेतपर्णश्च नीलश्च शैवालश्चाचलोत्तमः ॥
मेरे वचन से पूर्व में स्थित ‘भद्राश्व’ नामक वर्ष को जानो। वहाँ श्वेतपर्ण, नील और शैवाल नामक उत्तम पर्वत हैं।
Verse 5
कौरञ्जः पर्णशालाग्रः पञ्चैते तु कुलाचलाः । तेषां प्रसूतिरन्ये ये बहवः क्षुद्रपर्वताः ॥
कौरञ्ज और पर्णशालाग्र—ये (पूर्वोक्त पर्वतों सहित) पाँच प्रधान कुलाचल हैं। इन्हीं से अनेक अन्य छोटे-छोटे पर्वत उत्पन्न होते हैं।
Verse 6
तैर्विशिष्टा जनपदा नानारूपाः सहस्रशः । ततः कुमुदसंकाशाः शुद्धसानुसुमङ्गलाः ॥
उन पर्वतों से विभूषित होकर नाना प्रकार के सहस्रों देश-प्रदेश हैं। तत्पश्चात श्वेत कमलों के समान, शुद्ध ढालों वाले और शुभ शोभा से युक्त प्रदेश हैं।
Verse 7
इत्येवमादयोऽन्येऽपि शतशोऽथ सहस्रशः । सीता शङ्खावती भद्रा चक्रावर्तादिकास्तथा ॥
इसी प्रकार सैकड़ों-हज़ारों अन्य भी हैं—जैसे सीता, शंखावती, भद्रा तथा चक्रावर्ता और अन्य।
Verse 8
नद्योऽथ बह्व्यो विस्तीर्णाः शीततोयौघवाहिकाः । अत्र वर्षे नराः शङ्खशुद्धहेमसमप्रभाः ॥
और अनेक विशाल नदियाँ शीतल जलधाराएँ बहाती हैं। इस वर्ष में लोग शंख-शुभ्र, शुद्ध स्वर्ण-सम और ऐसे ही तेजस्वी दिखाई देते हैं।
Verse 9
दिव्यसङ्गमिनः पुण्या दशवर्षशतायुषः । मन्दोत्तमौ न तेषु स्तः सर्वे ते समदर्शनाः ॥
वे देवताओं के साथ संगति करते हैं, पुण्यशील हैं और सहस्र वर्ष तक जीते हैं। उनमें न कोई ‘मंद’ है न ‘उत्कृष्ट’; सबकी दृष्टि समान है।
Verse 10
तितिक्षादिभिरष्टाभैः प्रकृत्या ते गुणैर्युताः । तत्राप्यश्वशिरा देवश्चतुर्बाहुर्जनार्दनः ॥
वे स्वभाव से क्षमा आदि आठ गुणों से युक्त हैं। और वहाँ अश्वशिरा देव—चतुर्भुज जनार्दन—भी हैं।
Verse 11
शिरोहृदयमेड्ह्राङ्घ्रिहस्तैश्चाक्षित्रयान्वितः । तस्याप्यथैवं विषयाः विज्ञेया जगतः प्रभोः ॥
शिर, हृदय, उपस्थ, पाँव और हाथों से युक्त—और त्रिनेत्र—ऐसे ही उस जगदीश्वर के क्षेत्रों को वहाँ उसी प्रकार समझना चाहिए।
Verse 12
केतुमालमतो वर्षं निबोध मम पश्चिमम् । विशालः कम्बलः कृष्णो जयन्तो हरिपर्वतः ॥
मुझसे पश्चिम दिशा के ‘केतुमाल-वर्ष’ नामक प्रदेश का वर्णन सुनो। वहाँ विशाल, कंबल, कृष्ण, जयंत और हरि-पर्वत नामक पर्वत हैं।
Verse 13
विशोको वर्धमानश्च सप्तैते कुलपर्वताः । अन्ये सहस्रशः शैला येषु लोकगणः स्थितः ॥
विशोक और वर्धमान—ये सातों कुल-पर्वत हैं। इनके अतिरिक्त भी हजारों अन्य पर्वत हैं, जिन पर असंख्य प्राणी-समूह निवास करते हैं।
Verse 14
मौलयस्ते महाकायाः शाकपोतकम्बकाः । अङ्गुलप्रमुखाश्चापि वसन्ति शतशो जनाः ॥
वहाँ महाकाय मौलय लोग रहते हैं; तथा शाक, पोटक और कंभक भी। और अङ्गुल-प्रमुख आदि जातियाँ भी वहाँ सैकड़ों की संख्या में निवास करती हैं।
Verse 15
ये पिबन्ति महानद्यो वङ्क्षुं श्यामां सकम्बलाम् । अमोघां कामिनीं श्यामां तथैवान्याः सहस्रशः ॥
वे महान नदियों—वङ्क्षु, श्यामा, सकंबला, अमोघा, कामिनी, श्यामा—से जल पीते हैं; और इसी प्रकार हजारों अन्य नदियाँ भी हैं।
Verse 16
अत्राप्यायुḥ समं पूर्वैरत्रापि भगवान् हरिः । वराहरूपी पादास्यहृत्पृष्ठपार्श्वतस्तथा ॥
यहाँ भी आयु पूर्व प्रदेश के समान ही है। यहाँ भी भगवान् हरि वराह-रूप में विद्यमान हैं—पैर, मुख, हृदय, पृष्ठ और पार्श्व के रूप में प्रकट।
Verse 17
त्रिनक्षत्रयुते देशे नक्षत्राणि शुभानि च । इत्येतत् केतुमालान्ते कथितं मुनिसत्तम ॥
उस त्रिनक्षत्र-सम्पन्न देश में तारे शुभफलदायक हैं। हे मुनिश्रेष्ठ, इस प्रकार केतुमाल का वृत्तान्त कहा गया।
Verse 18
अतः परं कुरून् वक्ष्ये निबोधेह ममोत्तरान् । तत्र वृक्षाः मधुफलाः नित्यपुष्पफलोपगाः ॥
अब मैं कुरुओं का वर्णन करूँगा; मेरे उत्तर प्रदेश को जानो। वहाँ वृक्ष मधु-सम मीठे फल देते हैं और सदा पुष्प-फल से युक्त रहते हैं।
Verse 19
वस्त्राणि च प्रसूयन्ते फलेष्वाभरणानि च । सर्वकामप्रदास्ते हि सर्वकामफलप्रदाः ॥
वहाँ वस्त्र भी उत्पन्न होते हैं और फलों में ही आभूषण प्रकट होते हैं। वे निश्चय ही सब इच्छित वस्तुएँ देते हैं और प्रत्येक कामना का फल प्रदान करते हैं।
Verse 20
भूमिर्मणिमयी वायुः सुगन्धः सर्वदा सुखः । जायन्ते मानवास्तत्र देवलोकपरिच्युताः ॥
वहाँ की भूमि रत्नमयी है; वायु सुगन्धित और सदा सुखद है। वहाँ मनुष्य जन्म लेते हैं—जो देव-लोक से पतित हुए हैं।
Verse 21
मिथुनानि प्रसूयन्ते समकालस्थितानि वै । अन्योन्यमनुरक्तानि चक्रवाकोपमानि च ॥
वहाँ युगल एक साथ, उसी समय जन्म लेते हैं। वे परस्पर अनुरक्त रहते हैं, जैसे चक्रवाक पक्षियों का युगल।
Verse 22
चतुर्दशसहस्राणि तेषां सार्धानि वै स्थितिः । चन्द्रकान्तश्च शैलेन्द्रः सूर्यकान्तस्तथापरः ॥
उनका विस्तार चौदह हजार योजन है; ऊँचाई भी उतनी ही और उसका आधा अधिक है। वहाँ पर्वतराज चन्द्रकान्त है और उसी प्रकार दूसरा सूर्यकान्त नामक भी है।
Verse 23
तस्मिन् कुलाचलौ वर्षे तन्मध्ये च महानदी । भद्रसोमा प्रयात्युर्व्यां पुण्यामलजलौघिनी ॥
उस वर्ष में, उन सीमा-पर्वतों के बीच, और उसके ठीक मध्य में, पृथ्वी पर एक महान नदी बहती है—भद्रसोमा—जो पवित्र, निर्मल जलधाराएँ धारण करती है।
Verse 24
सहस्रशस्तथैवान्या नद्यो वर्षेऽपि चोत्तरे । तथान्याः क्षीरवाहिन्यो घृतवाहिन्य एव च ॥
उसी प्रकार उस उत्तरी वर्ष में हजारों अन्य नदियाँ हैं; और कुछ दूध बहाने वाली हैं, तथा कुछ घी बहाने वाली भी हैं।
Verse 25
दध्नो ह्रदास्तथा तत्र तथान्ये चानुपर्वताः । अमृतास्वादकल्पानि फलानि विविधानि च ॥
वहाँ दही के सरोवर भी हैं, और पर्वतों के पास अन्य (वस्तुएँ/स्थल) भी हैं; तथा अनेक प्रकार के फल हैं, जिनका स्वाद अमृत के समान है।
Verse 26
वनेषु तेषु वर्षेषु शतशोऽथ सहस्रशः । तत्रापि भगवान् विष्णुः प्राक्शिरा मत्स्यरूपवान् ॥
उन प्रदेशों के वनों में, सैकड़ों और हजारों स्थानों पर, वहाँ भी भगवान् विष्णु—प्राक्शिरा—मत्स्यरूप धारण किए हुए विराजमान हैं।
Verse 27
विभक्तो नवधा विप्र ! नक्षत्राणां त्रयं त्रयम् । दिशस्तथापि नवधा विभक्ता मुनिसत्तम ॥
हे ब्राह्मण, यह व्यवस्था नौ प्रकार से विभक्त है—नक्षत्र तीन-तीन के समूहों में; और दिशाएँ भी नौ प्रकार से विभाजित हैं, हे मुनिश्रेष्ठ।
Verse 28
चन्द्रद्वीपः समुद्रे च भद्रद्वीपस्तथापरः । तत्रापि पुण्यो विख्यातः समुद्रान्तर्महामुने ॥
समुद्र में चन्द्रद्वीप है और उसी प्रकार दूसरा भद्रद्वीप भी है। वहाँ भी समुद्र के भीतर एक पवित्र स्थान प्रसिद्ध है, हे महर्षि।
Verse 29
इत्येतत् कथितं ब्रह्मन् ! कुरुवर्षं मयोत्तरम् । शृणु किंपुरुषादीनि वर्षाणि गदतो मम ॥
इस प्रकार, हे ब्राह्मण, मैंने तुम्हें उत्तर-कुरुवर्ष का वर्णन किया। अब सुनो, जैसा मैं कहता हूँ—किंपुरुष से आरम्भ होने वाले वर्षों का।
The chapter frames geography as a moral-anthropological map: regions are distinguished not only by mountains and rivers but by the innate virtues, longevity, and social harmony of their inhabitants, implying that cosmic order (dharma-like regularity) is legible through spatial arrangement.
While not narrating a specific Manu’s reign, Adhyāya 59 supplies Manvantara-adjacent cosmography: it stabilizes the world-stage (varṣas, kulaparvatas, rivers, astral divisions) upon which Manvantara histories and dharmic conditions unfold, and it reiterates yuga-sequencing as the temporal logic for Bhārata.
This chapter is not part of the Devī Māhātmya corpus (Adhyāyas 81–93). Its theological emphasis is instead Vaiṣṇava-cosmographic: it associates specific regions with Hari/Viṣṇu’s manifestations (including varāha- and matsya-associated forms), integrating divine presence into the cosmological map.
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