
आरम्भमङ्गलम् (Ārambhamaṅgalam)
Invocatory Introduction
इस पुराण के आरम्भ में मंगलाचरण किया जाता है। नारायण, वाणी की अधिष्ठात्री सरस्वती और वेदव्यास का श्रद्धापूर्वक स्मरण व नमस्कार करके, श्रोताओं के कल्याण तथा ग्रन्थ की निर्विघ्न पूर्णता के लिए प्रार्थना की जाती है।
Verse 1
यद्योगिभिर्भवभयार्तिविनाशयोग्यम् आसाद्य वन्दितमतीव विवक्तचित्तैः । तद्वः पुनातु हरिपादसरोजयुग्मम् अविर्भवत्क्रमविलङ्घितभूर्भुवः स्वः ॥
हरि के कमल-चरणों की वह युगल-शोभा आप सबको पवित्र करे—जिन्हें गहन समाधि और विवेक से युक्त योगी संसार-भयजन्य दुःख के नाशक मानकर प्राप्त कर पूजते हैं; और जो प्रकट होकर अपने पग-प्रसार से भूः, भुवः और स्वः लोकों को भी लाँघ जाते हैं।
Verse 2
पायात् स वः सकलकल्मषभेददक्षः क्षीरोदकुक्षिफणिभोगनिविष्टमूर्तिः । श्वासावधूतसलिलोत्कणिकाकरालः सिन्धुः प्रनृत्यमिव यस्य करोति सङ्गात् ॥
वह आपकी रक्षा करे—जो समस्त पापों को विदीर्ण करने में निपुण है, जो क्षीरसागर-गर्भ समुद्र में शेषनाग की शय्या पर विराजमान है; जिसकी श्वास से उछलती जल-बूँदों के कारण सागर भयावह हो उठता है, और जिसके स्पर्श मात्र से समुद्र मानो नृत्य करने लगता है।
Verse 3
नारायणं समस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
नारायण को नमस्कार करके, तथा नरश्रेष्ठ नरा को भी; देवी सरस्वती और व्यास को प्रणाम कर, तब ‘जय’ का उच्चारण करके (पाठ) आरम्भ करना चाहिए।
Rather than posing a narrative question, this adhyāya establishes the ethical and soteriological premise: Purāṇic discourse is framed as a purifier of kalmaṣa (moral impurity) and a support for yogic clarity that overcomes bhava-bhaya (existential fear).
It does not yet enter Manvantara chronology; it prepares the reader for later analytical sections by sanctifying the text and grounding authority in the Nārāyaṇa–Vyāsa transmission line.
Direct Devi Māhātmya content is not present here; the only Shākta-adjacent element is the conventional invocation of Devī Sarasvatī as the presiding deity of speech and learning, authorizing the forthcoming discourse.