Dhaumya’s Counsel on Incognito Conduct in a Royal Household (राजवसतौ आचरण-निति)
समवेषं न कुर्वीत नोच्चै: संनिहितो वसेत् । न मन्त्र बहुधा कुयदिवं राज्ञ: प्रियो भवेत्,राजाके समान वेशभूषा न धारण करे। उसके अत्यन्त निकट न रहे। उसके सामने उच्च आसनपर न बैठे। अपने साथ राजाने जो गुप्त सलाह की हो, उसे दूसरोंपर प्रकट न करे। ऐसा करनेसे ही मनुष्य राजाका प्रिय हो सकता है
samaveṣaṃ na kurvīta noccaiḥ saṃnihito vaset | na mantraṃ bahudhā kuryād evaṃ rājñaḥ priyo bhavet ||
राजा के समान वेश-भूषा न धारण करे; अत्यन्त निकट रहकर न बसे; उसके सामने ऊँचे आसन पर न बैठे; और राजा की गोपनीय मंत्रणा को बहुतों में न फैलाए—ऐसा करने से ही मनुष्य राजा का प्रिय बनता है।
धौग्य उवाच