Bhīmasena’s Discourse on Kāla, Resolve, and the Feasibility of Ajñātavāsa (भीमसेनस्य कालोपदेशः)
चरन्तो मृगयां नित्यं शुद्धैर्बाणै्मगार्थिन: । पितृदैवतविप्रेभ्यो निर्वपन्तो यथाविधि,वे प्रतेदिन हिंसक पशुओंको मारनेके लिये शुद्ध (शास्त्रानुकूल) बाणोंद्वारा शिकार खेलते थे एवं शास्त्रकी विधिके अनुसार नित्य पितरों तथा देवताओंको अपना-अपना भाग देते थे अर्थात् नित्य श्राद्ध और नित्य होम करते थे
caranto mṛgayāṃ nityaṃ śuddhair bāṇair mṛgārthinaḥ | pitṛ-daivata-viprebhyo nirvapanto yathā-vidhi ||
वे प्रतिदिन हिंसक पशुओं का वध करने हेतु शुद्ध (शास्त्रानुकूल) बाणों से नित्य शिकार करते थे और विधिपूर्वक पितरों, देवताओं तथा ब्राह्मणों को उनका-उनका भाग अर्पित करते थे—अर्थात् नित्य श्राद्ध और नित्य होम करते थे।
वैशम्पायन उवाच