और्वेण वसता छन्नमूरौ ब्रह्मर्षिणा तदा । यत् कृतं तात देवेषु कर्म तत्तेडनघ श्रुतम्,“तात! निष्पाप नरेश! ब्रह्मर्षि और्वने (माताके) ऊरुमें गुप्तरूपसे निवास करते हुए जो देवकार्य सिद्ध किया था, वह भी तुम्हारे सुननेमें आया ही होगा
aurveṇa vasatā channam ūrau brahmarṣiṇā tadā | yat kṛtaṃ tāta deveṣu karma tat te ’n-agha śrutam ||
वैशम्पायन बोले— तात! निष्पाप नरेश! ब्रह्मर्षि और्व ने जाँघ में छिपकर निवास करते हुए देवताओं के लिए जो कार्य सिद्ध किया था, वह तुमने अवश्य सुना ही होगा।
वैशम्पायन उवाच