प्रच्छन्न॑ चापि धर्मज्ञ हरिणारिविनिग्रहे । वज्ज प्रविश्य शक्रस्य यत् कृतं तच्च ते श्रुतम्,“धर्मज्ञ! भगवान् श्रीहरिने शत्रुओंके विनाशके लिये छिपे तौरपर इन्द्रके वज्॒में प्रवेश करके जो कार्य किया, वह भी तुम्हारे कानोंमें पड़ा होगा
pracchannaṃ cāpi dharmajña hariṇārivinigrāhe | vajraṃ praviśya śakrasya yat kṛtaṃ tac ca te śrutam ||
हे धर्मज्ञ! शत्रुओं के विनाश के लिए भगवान् श्रीहरि ने छिपे तौर पर शक्र (इन्द्र) के वज्र में प्रवेश करके जो कार्य किया था, वह भी तुमने सुना है।
वैशम्पायन उवाच