दत्तरक्षाप्रतिसरामन्वालम्भनशो भनाम् । ऊर्मीतरज्जैर्जाह्विव्या: समानीतामुपह्दरम्,पिटारीके ऊपर उसकी रक्षाके लिये लता लपेट दी गयी थी और सिन्दूरका लेप लगा होनेसे उसकी बड़ी शोभा हो रही थी। गंगाकी तरंगोंके थपेड़े खाकर वह पिटारी तटके समीप आ लगी
dattarakṣāpratisarām anvālambhanaśobhanām | ūrmītarajjair jāhnavyāḥ samānītām upahradam ||
उस पिटारी पर रक्षा के लिए बन्धन बाँधे गए थे और सिन्दूर-लेप से वह शोभायमान थी। जाह्नवी (गंगा) की तरंगें मानो रस्सियों की भाँति उसे खींचती हुई तट के समीप ले आईं।
वैशम्पायन उवाच