वैशम्पायनजी कहते हैं--नृपश्रेष्ठ! कुन्ती शापसे अत्यन्त डरकर मन-ही-मन तरह- तरहकी बातें सोच रही थी। उसके सारे अंग मोहसे व्याप्त हो रहे थे। वह बार-बार आश्चर्यचवकित हो रही थी। एक ओर तो वह शापसे आतंकित थी, दूसरी ओर उसे भाई- बन्धुओंका भय लगा हुआ था। भूपाल! उस दशामें वह लज्जाके कारण विशृंखल वाणीद्वारा सूर्यदेवसे इस प्रकार बोली ।। कुन्त्युवाच पिता मे प्रियते देव माता चान्ये च बान्धवा: । न तेषु प्रियमाणेषु विधिलोपो भवेदयम्,कुन्तीने कहा--देव! मेरे पिता, माता तथा अन्य बान्धव जीवित हैं। उन सबके जीते- जी स्वयं आत्मदान करनेपर कहीं शास्त्रीय विधिका लोप न हो जाय?
vaiśampāyana uvāca |
nṛpaśreṣṭha! kuntī śāpāt atyantaṁ bhītvā manasā bahudhā vicintayantī āsīt | tasyāḥ sarvāṅgāni mohena vyāptāni babhūvuḥ | sā punaḥ punaḥ vismayam ājagāma | ekato hi śāpāt trastā, aparato bhrātṛ-bandhūnāṁ bhayam āśaṅkamānā | bhūpāla! sā tathāvasthāyāṁ lajjayā visṛṣṭa-vāṇī sūryadevaṁ praty evaṁ uvāca ||
kuntī uvāca |
pitā me priyate deva mātā cānye ca bāndhavāḥ |
na teṣu priyamāṇeṣu vidhilopo bhaved ayam ||
वैशम्पायन बोले—नृपश्रेष्ठ! कुन्ती शाप से अत्यन्त डरकर मन-ही-मन अनेक प्रकार की बातें सोचने लगी। मोह उसके समस्त अंगों में फैल गया और वह बार-बार विस्मय में पड़ जाती थी। एक ओर वह शाप से आतंकित थी, दूसरी ओर उसे बन्धु-बान्धवों का भय भी था। उस दशा में लज्जा से व्याकुल होकर, लड़खड़ाती वाणी में उसने सूर्यदेव से कहा— कुन्ती बोली—देव! मेरे पिता, माता तथा अन्य बान्धव जीवित हैं। उनके रहते-रहते यदि मैं स्वयं को अर्पित कर दूँ, तो क्या यह विधि का लोप—शास्त्रीय मर्यादा का उल्लंघन—न होगा?
वैशम्पायन उवाच