साहमद्य भृशं भीता गृहीता च करे भृशम् | कथं त्वकार्य कुर्या वै प्रदानं ह्वात्मन: स्वयम्,'परंतु मैं तो आज अत्यन्त भयभीत हो भगवान् सूर्यदेवके हाथमें पड़ गयी हूँ, तो भी स्वयं अपने शरीरको देने-जैसा न करनेयोग्य नीच कर्म कैसे करूँ?”
sāham adya bhṛśaṃ bhītā gṛhītā ca kare bhṛśam | kathaṃ tv akāryaṃ kuryā vai pradānaṃ hy ātmanāḥ svayam ||
“परन्तु आज मैं अत्यन्त भयभीत हूँ और सूर्यदेव के हाथ में दृढ़ता से पकड़ी गई हूँ; फिर भी अपने-आप को दे देना—ऐसा अकार्य, ऐसा अधर्म—मैं कैसे करूँ?”
वैशम्पायन उवाच