Dyumatsena’s Restoration and Sāvitrī’s Disclosure of Yama’s Boons (आरण्यकपर्व, अध्याय २८२)
गन्धर्वाप्सरसो भद्रे मामापानगतं सदा । उपतिष्ठन्ति वामोरु यथैव भ्रातरं मम,“भद्रे! वामोरु! जब मैं मधुपानकी गोष्ठीमें बैठता हूँ, उस समय मेरे भाईकी ही भाँति मेरी सेवामें भी गन्धर्वोंसहित अप्सराएँ उपस्थित होती हैं
gandharvāpsaraso bhadre mām āpānagataṃ sadā | upatiṣṭhanti vāmoru yathaiva bhrātaraṃ mama ||
भद्रे! वामोरु! जब मैं मधुपान की गोष्ठी में बैठता हूँ, तब गन्धर्वों सहित अप्सराएँ सदा मेरी सेवा में उपस्थित रहती हैं—जैसे वे मेरे भाई की सेवा में रहती हैं।
मार्कण्डेय उवाच