इन्द्रजिद्-लक्ष्मणयुद्धम्
Indrajit and Lakṣmaṇa: Escalation through Concealment
अनेन वीर्येण कथं स्त्रियं प्रार्थथसे बलात्,“राजकुमार! लौटो, तुम्हें पीठ दिखाकर भागना शोभा नहीं देता। अपने सेवकोंको शत्रुओंके बीचमें छोड़कर कैसे भागे जा रहे हो? क्या इसी बलसे तुम दूसरेकी स्त्रीको बलपूर्वक हरकर ले जाना चाहते थे?”
anena vīryeṇa kathaṃ striyaṃ prārthathase balāt | rājaputra! lauto, tvāṃ pṛṣṭhaṃ darśayitvā palāyanaṃ na śobhate | sva-sevakān śatrūṇāṃ madhye parityajya kathaṃ palāyase | kim anenaiva balena parasya striyaṃ balād āhṛtya netum icchasi ||
वैशम्पायन बोले—“इस वीर्य के सहारे तुम कैसे किसी स्त्री को बलपूर्वक चाहने चले थे? राजकुमार, लौटो; पीठ दिखाकर भागना तुम्हें शोभा नहीं देता। अपने सेवकों को शत्रुओं के बीच छोड़कर तुम कैसे भाग रहे हो? क्या इसी बल से तुम पराई स्त्री को छीनकर ले जाना चाहते थे?”
वैशम्पायन उवाच