Sarasvatī–Tārkṣya Saṃvāda: Agnihotra-vidhi, Dāna-phala, and Mokṣa-prasaṅga (सरस्वती–तार्क्ष्यसंवादः)
भवन्त्यल्पायुष: पापा रौद्रकर्मफलोदया: । नाथन्त: सर्वकामानां नास्तिका भिन्नचेतस:,इस प्रकार पापकर्मामें प्रवृत्त होनेवाले पापियोंकी आयु उनके कर्मानुसार बहुत कम हो गयी। उनके पापकर्मोंके भयंकर फल प्रकट होने लगे। वे अपनी सभी अभीष्ट वस्तुओंके लिये दूसरोंके सामने हाथ फैलाकर याचना करने लगे। कितने ही नास्तिक और विचलितचित्त हो गये
bhavanty alpāyuṣaḥ pāpā raudrakarmaphalodayāḥ | nāthantaḥ sarvakāmānāṃ nāstikā bhinnacetasaḥ ||
इस प्रकार पापकर्म में प्रवृत्त वे पापी अपने कर्मानुसार अल्पायु हो गए। उनके दुष्कर्मों के भयानक फल प्रकट होने लगे। अपनी समस्त कामनाओं के लिए वे दूसरों के आगे हाथ फैलाकर आश्रय माँगने लगे। बहुत-से नास्तिक हो गए और बहुतों का चित्त विभक्त व विचलित हो गया।
मार्कण्डेय उवाच