अशुभै: कर्मभिश्चापि प्रायश: परिचिद्विता: । दौष्कुल्या व्याधिबहुला दुरात्मानो5प्रतापिन:,उनके शरीरमें प्रायः उनके अशुभ कर्मोंके चिह्न (कोढ़ आदि) प्रकट होने लगे। कोई अधम कुलमें जन्म लेते, कोई बहुत-से रोगोंके शिकार बने रहते और कोई दुष्ट स्वभावके हो जाते थे। उनमेंसे कोई भी प्रतापी नहीं होता था
वे प्रायः अपने अशुभ कर्मों के चिह्नों से चिह्नित हो गए—उनके शरीर में कोढ़ आदि विकार प्रकट होने लगे। कोई नीच कुल में जन्म लेने लगा, कोई अनेक रोगों से ग्रस्त रहने लगा और कोई दुष्ट स्वभाव का हो गया। उनमें से कोई भी प्रतापी न रहा।
मार्कण्डेय उवाच