कृष्णेन विदुरं प्रति आगमन-हेतु-निवेदनम् / Krishna explains the purpose of his coming to Vidura
कामात्मा प्राज्ञमानी च मित्रध्रुक् सर्वशड्कितः । अकर्ता चाकृतज्ञश्न त्यक्तधर्मा प्रियानृत:,“उसका मन भोगोंमें आसक्त है, वह अपनेको पण्डित मानता, मित्रोंके साथ द्रोह करता और सबको संदेहकी दृष्टिसे देखता है। वह स्वयं तो किसीका उपकार करता ही नहीं, दूसरोंके किये हुए उपकारको भी नहीं मानता। वह धर्मको त्यागकर असत्यसे ही प्रेम करने लगा है
kāmātmā prājñamānī ca mitradhruk sarvaśaṅkitaḥ | akartā cākṛtajñaś ca tyaktadharmo priyānṛtaḥ ||
वैशम्पायन बोले— वह काम-भोगों के वश में है और अपने को बड़ा पण्डित मानता है। मित्रों से द्रोह करता है और सब पर संदेह करता है। वह न स्वयं किसी का उपकार करता है, न अपने ऊपर किये उपकार को मानता है। धर्म को त्यागकर वह असत्य से ही प्रेम करने लगा है।
वैशम्पायन उवाच