Udyoga-parva Adhyāya 50 — Dhṛtarāṣṭra’s Appraisal of Bhīmasena (भीमसेनभयवर्णनम्)
अपारमप्लवागाध॑ समुद्र शरवेगिनम् । भीमसेनमयं दुर्ग तात मन्दास्तितीर्षव:
धृतराष्ट्र बोले—तात! भीमसेन एक अपार, दुर्गम समुद्र है; इसे पार करने को न कोई नौका है, न कहीं इसकी थाह—बाण ही इसका वेग है। फिर भी मेरे मंदबुद्धि पुत्र इस भीमसेनमय दुर्गम समुद्र को पार करना चाहते हैं।
धृतराष्ट उवाच