अध्याय २९ — वासुदेव–संजय संवादः
Karma, Varṇa-Dharma, and the Ethics of Governance
भ्राता कनीयानपि तस्य मन्द- स्तथाशील: संजय सो<पि शश्चवत् | महेष्वास: शूरतम: कुरूणां दुःशासन: कुशलं तात वाच्य:,तात संजय! जो दुर्योधनका छोटा भाई है तथा उसीके समान मूर्ख और सदा पापमें संलग्न रहनेवाला है, कुरुकुलके उस महाधनुर्धर एवं विख्यात वीर दुःशासनसे भी कुशल पूछकर मेरा कुशल-समाचार कहना
bhrātā kanīyān api tasya mandaḥ tathāśīlaḥ saṃjaya so 'pi śaśvat | maheṣvāsaḥ śūratamaḥ kurūṇāṃ duḥśāsanaḥ kuśalaṃ tāta vācyaḥ ||
तात संजय! दुर्योधन का छोटा भाई, जो उसी के समान मंदबुद्धि और सदा पाप में प्रवृत्त रहनेवाला है—कुरुओं में महाधनुर्धर और विख्यात वीर दुःशासन से भी कुशल पूछकर मेरा कुशल-समाचार कहना।
युधिछिर उवाच