Kṛṣṇasya Karṇam Prati Sāntvavacana
Kṛṣṇa’s Conciliatory Address to Karṇa
वास एव यथा त्यक्तं प्रावृण्वानो $भिमन्यसे । स्रजं त्यक्तामिव प्राप्य लोभाद् यौधिष्ठिरी श्रियम्
जैसे कोई दूसरे का छोड़ा हुआ वस्त्र पहनकर उसे अपना मान बैठता है, वैसे ही तुम त्यागी हुई माला की भाँति युधिष्ठिर की राजलक्ष्मी को पाकर अब लोभवश उसे अपनी समझ रहे हो।
भीष्म उवाच