Mahabharata Adhyaya 25
Stree ParvaAdhyaya 2551 Versesयुद्ध समाप्त; रणभूमि पर मृतकों का दृश्य और शोक-विलाप का प्रभुत्व

Adhyaya 25

स्त्री-विलापः — गान्धार्याः रणभूमिदर्शनं शापवचनं च (Battlefield Lament and Gāndhārī’s Curse)

Upa-parva: Strī-vilāpa (Lamentation of the Kuru Women) — Battlefield Survey and Gāndhārī’s Accusation

This chapter presents a two-part discourse. First, Gāndhārī, addressing Kṛṣṇa (Mādhava/Janārdana/Hṛṣīkeśa), surveys the battlefield and points out prominent fallen warriors and kings (e.g., Kāmboja, Kāliṅga, Jayatsena of Magadha, Bṛhadbala of Kosala, Drupada of Pāñcāla, Dhṛṣṭaketu of Cedi, and the Avanti brothers Vinda and Anuvinda). The narration emphasizes corporeal detail—weapon wounds, scattered ornaments, and the women’s lamentations—functioning as evidentiary testimony to the cost of strategic engagement. Second, Gāndhārī’s grief intensifies into anger: she questions why Kṛṣṇa, portrayed as capable and influential, allowed mutual destruction between Pāṇḍavas and Dhārtarāṣṭras. She then pronounces a curse that Kṛṣṇa will, in a specified time frame, lose his kin and meet an ignoble end, and that Yādava women will later grieve similarly. Kṛṣṇa responds with controlled acknowledgment, indicating the inevitability of the Yādavas’ internal collapse (mutual destruction), shifting the frame to daiva and the limits of external agency. The Pāṇḍavas react with distress, recognizing the gravity of the pronouncement.

Chapter Arc: रणभूमि में बिखरे शवों के बीच गान्धारी अपने पुत्रों और अन्य वीरों के मरे हुए शरीर देखती है; शोक का ज्वार उसे वाणी देता है और वह करुण विलाप आरम्भ करती है। → वह एक-एक करके वीरों के पतन का चित्र खींचती है—पत्नी द्वारा रक्तस्नात चन्दनचर्चित भुजाओं पर विलाप, युद्ध-वैभव का अब शून्य में बदल जाना, और द्रोण द्वारा द्रुपद-वध जैसे प्रसंगों को स्मरण कर कृष्ण से प्रश्न करती है कि यह विनाश क्यों और कैसे हुआ। → शोक क्रोध में बदलता है; गान्धारी श्रीकृष्ण को लक्ष्य कर यदुवंश-विनाश का शाप देती है—यह कहते हुए कि वृष्णिचक्र का संहार करने वाला उसके सिवा कोई नहीं होगा, और यादव परस्पर-कलह से नष्ट होंगे। → कृष्ण शाप को स्वीकार करते हैं—उसका प्रतिकार नहीं करते; पाण्डव यह सुनकर भीतर से भयभीत और जीवन के प्रति निराश हो उठते, क्योंकि धर्म-रक्षक कृष्ण पर भी नियति का विधान उतर आता है। → यदुवंश के भविष्य-विनाश की घोषणा के साथ कथा आगे के अनिवार्य परिणामों की ओर मुड़ती है—शाप कब और कैसे फलित होगा, यह आसन्न प्रश्न बनकर रह जाता है।

Shlokas

Verse 1

अपन बक। है २ >> पञ्चविशो< ध्याय: अन्यान्य वीरोंको मरा हुआ देखकर गान्धारीका शोकातुर होकर विलाप करना और क्रोधपूर्वक श्रीकृष्णको यदुवंशविनाशविषयक शाप देना गान्धायुवाच काम्बोजं पश्य दुर्धर्ष काम्बोजास्तरणोचितम्‌ । शयानमृषभस्कन्ध॑ हत॑ पांसुषु माधव

गान्धारी बोलीं— माधव! इस दुर्धर्ष काम्बोजराज सुदक्षिण को देखो। जो काबुल (काम्बोज) के बने कोमल बिछौनों पर शयन करने योग्य था, वही बैल-से पुष्ट कंधों वाला वीर अब मारा जाकर धूल में पड़ा है।

Verse 2

यस्य क्षतजसंदिग्धौ बाहू चन्दनभूषितौ । अवेक्ष्य करुणं भार्या विलपत्यतिदु:खिता,उसकी चन्दनचर्चित भुजाओंको रक्तमें सनी हुई देख उसकी पत्नी अत्यन्त दुःखी हो करुणाजनक विलाप कर रही है

वैशम्पायन बोले— जिसके चन्दन-लेप से सुशोभित भुजाएँ अब रक्त से सनी हैं, उन्हें देखकर उसकी पत्नी अत्यन्त दुःखी होकर करुण विलाप कर रही है।

Verse 3

इमौ तौ परिघप्रख्यौ बाहू शुभतलाड्गुली । ययोर्विवरमापन्नां न रतिर्मा पुराजहात्‌

वैशम्पायन बोले— ये दोनों भुजाएँ परिघ (लोहे के गदा-दण्ड) के समान हैं, जिनकी हथेलियाँ और उँगलियाँ शुभ हैं। जब इन दोनों के बीच दूरी आ गई, तब भी मेरा अनुराग-रस मुझे पहले की भाँति छोड़कर नहीं गया।

Verse 4

हतबन्धुरनाथा च वेपन्ती मधुरस्वरा

वैशम्पायन बोले— श्रीकृष्ण! बन्धु मारे जाने से और रक्षक छिन जाने से यह रानी अनाथ हो गई है; काँपती हुई मधुर स्वर में विलाप कर रही है। और वे राज-रानियाँ—धूप से मुरझाती विविध पुष्पमालाओं के समान—सूर्यताप से तप गई हैं; फिर भी उनके शरीरों से सौन्दर्य-श्री और राज-गरिमा नहीं छूटी।

Verse 5

आततपे क्लाम्यमानानां विविधानामिव स््रजाम्‌ । क्लान्तानामपि नारीणां श्रीर्जहाति न वै तनू:

वैशम्पायन बोले— धूप में तपकर मुरझाती विविध पुष्पमालाओं के समान वे स्त्रियाँ क्लान्त हो रही थीं; परन्तु थकी हुई होने पर भी उनके शरीरों से सौन्दर्य-श्री और राज-दीप्ति सचमुच नहीं छूटी।

Verse 6

शयानमभित: शूरं कालिज्ुं मधुसूदन । पश्य दीप्ताड्भदयुगप्रतिनद्धमहाभुजम्‌,मधुसूदन! देखो, पास ही वह शूरवीर कलिंगराज सो रहा है, जिसकी दोनों विशाल भुजाओंमें चमकीले अंगद (बाजूबन्द) बँधे हुए हैं

वैशम्पायन बोले—हे मधुसूदन! देखो, पास ही कलिंगों का वह शूरवीर राजा सोया पड़ा है; उसकी विशाल भुजाओं पर चमकते हुए अंगदों की जोड़ी बँधी है।

Verse 7

मागधानामधिपतिं जयत्सेनं जनार्दन | आवार्य सर्वतः पत्न्‍य: प्ररुदत्य: सुविह्दला:,जनार्दन! उधर मगधराज जयत्सेन पड़ा है, जिसे चारों ओरसे घेरकर उसकी पत्नियाँ अत्यन्त व्याकुल हो फूट-फ़ूटकर रो रही हैं

वैशम्पायन बोले—हे जनार्दन! मगधों का अधिपति जयत्सेन गिरा पड़ा है; उसे चारों ओर से घेरकर उसकी पत्नियाँ अत्यन्त व्याकुल होकर फूट-फूटकर रो रही हैं।

Verse 8

आसामायतलनेत्राणां सुस्वराणां जनार्दन । मन:श्रुतिहरो नादो मनो मोहयतीव मे,श्रीकृष्ण! मधुर स्वरवाली इन विशाललोचना रानियोंका मन और कानोंको मोह लेनेवाला आर्तनाद मेरे मनको मूर्च्छित-सा किये देता है

वैशम्पायन बोले—हे जनार्दन! इन विशाललोचना, मधुरस्वरा रानियों का जो आर्तनाद उठ रहा है, वह मन और कानों को हर लेनेवाला है; मानो मेरे मन को ही मोह-मूर्च्छित कर देता है।

Verse 9

प्रकीर्णवस्त्राभरणा रुदत्य: शोककर्शिता: । स्वास्तीर्णशयनोपेता मागध्य: शेरते भुवि

वैशम्पायन बोले—मगधदेश की स्त्रियाँ, जिनके वस्त्र और आभूषण बिखर गए हैं, शोक से कृश होकर रो रही हैं; जो सुन्दर बिछौनों वाली शय्याओं की अभ्यस्त थीं, वे अब भूमि पर पड़ी हैं।

Verse 10

कोसलानामधिपतिं राजपुत्रं बृहदूबलम्‌ । भर्तरें परिवार्यता: पृथक्‌ प्ररुदिता: स्त्रिय:

वैशम्पायन बोले—कोसलों के अधिपति, राजपुत्र बृहदूबल को अपना पति मानकर स्त्रियाँ उसे घेरकर बैठ गईं और अलग-अलग अपने-अपने शोक में रोने लगीं।

Verse 11

अपने पति कोसलनरेश राजकुमार बृहदबलको भी चारों ओरसे घेरकर उनकी रानियाँ अलग-अलग रो रही हैं ।।

वैशम्पायन बोले—कोसल-नरेश राजकुमार बृहद्बल को चारों ओर से घेरकर उनकी रानियाँ शोक से व्याकुल होकर, अभिमन्यु के बाहुबल से धँसे हुए उनके अंगों के बाणों को बार-बार निकालती हैं और फिर-फिर मूर्च्छित हो जाती हैं।

Verse 12

आसां सर्वानिवद्यानामातपेन परिश्रमात्‌ | प्रम्लाननलिनाभानि भान्ति वक्त्राणि माधव,माधव! इन सर्वांगसुन्दरी राजमहिलाओंके सुन्दर मुख धूप और परिश्रमके कारण मुरझाये हुए कमलोंके समान प्रतीत होते हैं

वैशम्पायन बोले—हे माधव! इन सर्वथा निर्दोष राजमहिलाओं के मुख धूप और परिश्रम से मुरझाए हुए कमलों के समान प्रतीत होते हैं।

Verse 13

द्रोणेन निहता: शूरा: शेरते रुचिराज्भदा: । धृष्टद्युम्नसुता: सर्वे शिशवो हेममालिन:

वैशम्पायन बोले—द्रोणाचार्य के मारे हुए धृष्टद्युम्न के वे सभी बाल-शूरवीर पुत्र वहाँ पड़े हैं; उनकी भुजाओं में सुन्दर अंगद और कंठ में स्वर्णहार शोभा पा रहे हैं।

Verse 14

रथाग्न्यगारं चापार्चि:शरशक्तिगदेन्धनम्‌ | द्रोणमासाद्य निर्दग्धा: शलभा इव पावकम्‌

वैशम्पायन बोले—द्रोण मानो रथरूपी अग्निशाला थे; धनुष उसकी ज्वाला, बाण-शक्ति-गदाएँ उसकी समिधा। उनके पास पहुँचकर वे ऐसे भस्म हो गए जैसे पतंगे अग्नि में।

Verse 15

द्रोणाचार्य प्रचलित अग्निके समान थे, उनका रथ ही अग्निशाला था, धनुष ही उस अग्निकी लपट था, बाण, शक्ति और गदाएँ समिधाका काम दे रही थीं, धृष्टद्युम्नके पुत्र पतंगोंके समान उस द्रोणरूपी अग्निमें चलकर भस्म हो गये ।।

वैशम्पायन बोले—इसी प्रकार सुन्दर अंगदों से विभूषित वे शूरवीर भी मारे जाकर पड़े हैं। केकय देश के पाँचों भाई राजकुमार द्रोण के सम्मुख युद्ध में डटे थे; आचार्य द्रोण के हाथों मारे जाकर अब वे निश्चेष्ट पड़े हैं।

Verse 16

तप्तकाञ्चनवर्माणस्तालध्वजरथव्रजा: । भासयन्ति महीं भासा ज्वलिता इव पावका:

वैशम्पायन बोले— तपे हुए, दमकते सुवर्ण के कवच धारण किए और ताल-चिह्नयुक्त ध्वजाओं वाले रथों के समूह में चलते हुए वे अपनी प्रभा से पृथ्वी को ऐसे प्रकाशित कर रहे हैं, मानो प्रज्वलित अग्नियाँ हों।

Verse 17

द्रोणेन द्रुपदं संख्ये पश्य माधव पातितम्‌ | महाद्विपमिवारण्ये सिंहेन महता हतम्‌

वैशम्पायन बोले— हे माधव, देखो! संग्राम में द्रोणाचार्य द्वारा गिराया गया द्रुपद—मानो वन में किसी महाबली सिंह ने महान् हाथी को मार गिराया हो।

Verse 18

माधव! देखो, युद्धस्थलमें ट्रोणाचार्यने जिन्हें मार गिराया था, वे राजा द्रुपद सो रहे हैं, मानो किसी वनमें विशाल सिंहके द्वारा कोई महान्‌ गजराज मारा गया हो ।।

वैशम्पायन बोले— हे माधव, देखो! रणभूमि में द्रोणाचार्य द्वारा मारा गया राजा द्रुपद ऐसा पड़ा है मानो सो रहा हो—जैसे वन में महाबली सिंह द्वारा मारा गया कोई महान् गजराज। और हे कमलनयन, पांचालराज का वह निर्मल श्वेत छत्र उसके ऊपर शरत्काल के चन्द्रमा की भाँति शोभा पा रहा है।

Verse 19

एतास्तु द्रुपदं वृद्ध स्नुषा भार्याश्व दुःखिता: । दग्ध्वा गच्छन्ति पाउचाल्यं राजानमपसव्यतः,इन बूढ़े पांचालराज ट्रपदको इनकी दुःखी रानियाँ और पुत्रवधुएँ चितामें जलाकर इनकी प्रदक्षिणा करके जा रही हैं

वैशम्पायन बोले— ये दुःख से व्याकुल रानियाँ और पुत्रवधुएँ वृद्ध द्रुपद को चिता में दग्ध कर, पाञ्चालराज की अपसव्य (वामावर्त) परिक्रमा करती हुई आगे बढ़ रही हैं।

Verse 20

धृष्टकेतुं महात्मानं चेदिपुड़वमड़ना: | द्रोणेन निहतं शूरं हरन्ति हृतचेतस:

वैशम्पायन बोले— द्रोणाचार्य द्वारा मारे गए शूर, महात्मा, चेदियों में अग्रगण्य धृष्टकेतु को वे स्त्रियाँ शोक से चेतना-शून्य-सी होकर दाह-संस्कार के लिए उठाकर ले जा रही हैं।

Verse 21

द्रोणास्त्रमभिहत्यैष विमर्दे मधुसूदन । महेष्वासो हतः शेते नद्या हत इव द्रुम:

मधुसूदन! संग्राम के घोर विमर्द में इस महाधनुर्धर ने द्रोण के अस्त्र को नष्ट कर दिया था; अब वह मारा जाकर नदी के वेग से कटे वृक्ष के समान धराशायी पड़ा है।

Verse 22

एष चेदिपति: शूरो धृष्टकेतुर्महारथ: । शेते विनिहत:ः संख्ये हत्वा शत्रूनू सहस्रशः,यह चेदिराज शूरवीर महारथी धृष्टकेतु सहस्रों शत्रुओंको मारकर मारा गया और रणशय्यापर सदाके लिये सो गया

यह चेदिराज शूरवीर महारथी धृष्टकेतु सहस्रों शत्रुओं को मारकर रण में मारा गया और अब रणशय्या पर सदा के लिए सो गया है।

Verse 23

वितुद्यमानं विहगैस्तं भार्या: पर्युपासिता: । चेदिराजं हृषीकेश हतं सबलबान्धवम्‌,हृषीकेश! सेना और बन्धुओंसहित मारे गये इस चेदिराजको पक्षी चोंच मार रहे हैं और उसकी स्त्रियाँ उसे चारों ओरसे घेरकर बैठी हैं

हृषीकेश! सेना और बन्धुओं सहित मारे गए इस चेदिराज को पक्षी चोंच मार रहे हैं और उसकी पत्नियाँ उसे चारों ओर से घेरकर बैठी हैं।

Verse 24

दाशार्हपुत्र॒जं वीरं शयानं सत्यविक्रमम्‌ | आरोप्याड्के रुदन्त्येताश्वेदिराजवराड़ना:

वैशम्पायन बोले—श्वेदिराज की श्रेष्ठ स्त्रियाँ दाशार्हवंशी वीर को, जो सत्यपराक्रमी होकर रण में शयन कर रहा था, गोद में उठाकर रोने लगीं।

Verse 25

दशाहईकुलकी कन्या (श्रुतश्रवा)-के पुत्र शिशुपालका यह सत्यपराक्रमी वीर पुत्र रणभूमिमें सो रहा है और इसे अंकमें लेकर ये चेदिराजकी सुन्दरी रानियाँ रो रही हैं ।।

हृषीकेश! देखो, इसका यह पुत्र—सुन्दर मुख और मनोहर कुण्डलों वाला—समर में द्रोण द्वारा अनेक बाणों से विद्ध होकर काट डाला गया है।

Verse 26

हृषीकेश! देखो तो सही, इस धृष्टकेतुके सुन्दर मुख और मनोहर कुण्डलोंवाले पुत्रको द्रोणाचार्यने समरांगणमें अपने बाणोंद्वारा मारकर उसके अनेक टुकड़े कर डाले हैं ।।

वैशम्पायन बोले— हे हृषीकेश! देखो, धृष्टकेतु के इस पुत्र का मुख कितना सुन्दर है और कुण्डल कितने मनोहर हैं; पर द्रोणाचार्य ने रणभूमि में अपने बाणों से इसे मारकर इसके शरीर के अनेक टुकड़े कर डाले हैं। हे मधुसूदन! जो वीर पिता युद्ध के घमासान में शत्रुओं से जूझ रहा था, उसे इसने निश्चय ही कभी नहीं छोड़ा; और आज भी, मानो, वह अपने उस वीर पिता को छोड़ नहीं पाया है।

Verse 27

मधुसूदन! रणभूमिमें स्थित होकर शत्रुओंके साथ जूझनेवाले अपने पिताका साथ इसने कभी नहीं छोड़ा था, आज युद्धके बाद भी वह पिताको नहीं छोड़ सका है ।।

वैशम्पायन बोले— हे मधुसूदन! रणभूमि में खड़े होकर शत्रुओं से जूझते हुए अपने पिता का साथ इसने कभी नहीं छोड़ा; और आज युद्ध समाप्त हो जाने पर भी वह पिता को छोड़ नहीं सका है। हे महाबाहो! इसी प्रकार मेरे पुत्र का पुत्र—शत्रुवीरों का संहारक लक्ष्मण—भी अपने पिता दुर्योधन के पीछे-पीछे चला है।

Verse 28

विन्दानुविन्दावावन्त्यौ पतितौ पश्य माधव । हिमान्ते पुप्पितो शालौ मरुता गलिताविव

हे माधव! अवन्ती के दोनों राजपुत्र विन्द और अनुविन्द गिरे पड़े हैं—इन पर दृष्टि डालो। मानो ग्रीष्मान्त में वायु के वेग से दो खिले हुए शालवृक्ष धराशायी हो गये हों।

Verse 29

काज्चनाड्ुदवर्माणौ बाणखड््‌गधनुर्धरी । ऋषभप्रतिरूपाक्षौो शयानौ विमलखस्रजी

ये दोनों सोने के कवच धारण किये हुए हैं, बाण, खड्ग और धनुष लिये हैं; बैल के समान बड़ी-बड़ी आँखोंवाले ये दोनों वीर निर्मल हार पहने हुए सोये पड़े हैं।

Verse 30

अवध्या: पाण्डवा: कृष्ण सर्व एव त्वया सह । ये मुक्ता द्रोणभीष्माभ्यां कर्णाद्‌ वैकर्तनात्‌ कृपात्‌

हे श्रीकृष्ण! तुम्हारे साथ ये समस्त पाण्डव अवध्य जान पड़ते हैं—जो द्रोण और भीष्म से, सूतपुत्र वैकर्तन कर्ण से तथा कृपाचार्य से भी बचकर जीवित निकल आये हैं।

Verse 31

दुर्योधनाद्‌ द्रोणसुतात्‌ सैन्धवाच्च जयद्रथात्‌ । सोमदत्ताद्‌ विकर्णाच्च शूराच्च कृतवर्मण:

दुर्योधन, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, सैन्धव-राज जयद्रथ, सोमदत्त, विकर्ण और शूरवीर कृतवर्मा—इन सबके हाथों से वे बच निकले। श्रीकृष्ण! तुम्हारे साथ रहने से ही ये समस्त पाण्डव अवध्य जान पड़ते हैं; द्रोण, भीष्म, वैकर्तन कर्ण, कृपाचार्य, दुर्योधन, अश्वत्थामा, जयद्रथ, सोमदत्त, विकर्ण और कृतवर्मा जैसे महारथियों के प्रहारों के बीच भी वे जीवित रह गये।

Verse 32

ये हन्यु: शस्त्रवेगेन देवानपि नरर्षभा: । त इमे निहता: संख्ये पश्य कालस्य पर्ययम्‌

जो नरश्रेष्ठ अपने शस्त्रों के वेग से देवताओं को भी मार सकते थे, वे ही आज रणभूमि में मारे पड़े हैं। काल का यह उलट-फेर देखो।

Verse 33

नातिभारो<स्ति दैवस्य ध्रुवं माधव कश्नन । यदिमे निहता: शूरा: क्षत्रियै: क्षत्रियर्षभा:

माधव! निश्चय ही दैव के लिए कोई भी कार्य अत्यधिक भार नहीं। क्योंकि ये क्षत्रियों में श्रेष्ठ शूरवीर क्षत्रियों के ही हाथों मारे गये हैं।

Verse 34

माधव! निश्चय ही दैवके लिये कोई भी कार्य अधिक कठिन नहीं है; क्योंकि उसने क्षत्रियोंद्वारा ही इन शूरवीर क्षत्रियशिरोमणियोंका संहार कर डाला है ।।

माधव! निश्चय ही दैव के लिये कोई भी कार्य अधिक कठिन नहीं है; क्योंकि उसने क्षत्रियों के द्वारा ही इन शूरवीर क्षत्रिय-शिरोमणियों का संहार करा दिया। श्रीकृष्ण! मेरे वेगशाली पुत्र उसी दिन मारे गये, जिस दिन तुम अपना प्रयोजन अपूर्ण रह जाने पर फिर उपप्लव्य लौट गये थे।

Verse 35

शान्तनोश्रैव पुत्रेण प्राज्ञेन विदुरेण च । तदैवोक्तास्मि मा स्नेहं कुरुष्वात्मसुतेष्विति,मुझे तो शान्तनुनन्दन भीष्म तथा ज्ञानी विदुरने उसी दिन कह दिया था “कि अब तुम अपने पुत्रोंपर स्नेह न करो”

उसी दिन शान्तनुनन्दन भीष्म और प्राज्ञ विदुर ने मुझसे कह दिया था—“अपने पुत्रों में अब स्नेह मत करो।”

Verse 36

कां गतिं तु गमिष्यामि त्वया हीना जनेश्वर । वह कहती है--'प्राणनाथ! सुन्दर हथेली और अंगुलियोंसे युक्त तथा परिघके समान मोटी ये वे ही दोनों भुजाएँ हैं

वैशम्पायन बोले— “हे जनेश्वर! आपके बिना मैं अब किस गति को, किस शरण को प्राप्त करूँ? उन दोनों का वह दर्शन मिथ्या नहीं हो सकता था; इसलिए, हे जनार्दन, बहुत ही थोड़े समय में मेरे सारे पुत्र युद्ध की आग में जलकर भस्म हो गए।”

Verse 37

वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वा न्यपतद्‌ भूमौ गान्धारी शोकमूर्च्छिता । दुःखोपहतविज्ञाना धैर्यमुत्सूज्य भारत

वैशम्पायन बोले— यह कहकर शोक से मूर्च्छित गान्धारी पृथ्वी पर गिर पड़ीं। हे भारत! दुःख ने उनकी विवेकशक्ति को आहत कर दिया और उन्होंने धैर्य त्याग दिया।

Verse 38

ततः कोपपरीताज्जी पुत्रशोकपरिप्लुता । जगाम शौरिं दोषेण गान्धारी व्यथितेन्द्रिया

तदनन्तर क्रोध से उसके अंग-प्रत्यंग व्याप्त हो गए। पुत्रशोक में डूबी हुई, व्याकुल इन्द्रियों वाली गान्धारी ने सारा दोष शौरि श्रीकृष्ण पर ही रख दिया।

Verse 39

गान्धायुवाच पाण्डवा धार्रराष्ट्राश्न दग्धा: कृष्ण परस्परम्‌ । उपेक्षिता विनश्यन्तस्त्वया कस्माज्जनार्दन

गान्धारी बोली— “हे कृष्ण! हे जनार्दन! पाण्डव और धृतराष्ट्र के पुत्र आपस में लड़कर भस्म हो गए। जब वे नष्ट हो रहे थे, तब तुमने उनकी उपेक्षा क्यों की?”

Verse 40

शक्तेन बहुभृत्येन विपुले तिष्ठता बले । उभयत्र समर्थन श्रुतवाक्येन चैव ह

“महाबाहु मधुसूदन! तुम समर्थ थे; तुम्हारे पास बहुत-से सेवक और सैनिक थे; तुम महान् बल में प्रतिष्ठित थे। दोनों पक्षों पर अपनी बात मनवाने की सामर्थ्य तुममें थी, और तुम वेद-शास्त्र तथा महात्माओं के वचनों को सुन-समझ चुके थे। फिर भी तुमने स्वेच्छा से कुरुवंश के विनाश को रोकने की उपेक्षा की—जानबूझकर इस कुल का नाश होने दिया। यह तुम्हारा भारी दोष है; अतः इसका फल तुम भोगो।”

Verse 41

इच्छतोपेक्षितो नाश: कुरूणां मधुसूदन । यस्मात्‌ त्वया महाबाहो फलं॑ तस्मादवाप्लुहि

वैशम्पायन बोले— हे मधुसूदन, हे महाबाहु! कुरुओं का विनाश तुम्हारे जानते-बूझते उपेक्षित रहा; इसलिए अब उस कर्म का फल तुम प्राप्त करो।

Verse 42

पतिशुश्रूषया यन्मे तप: किंचिदुपार्जितम्‌ | तेन त्वां दुरवापेन शप्स्ये चक्रगदाधर

वैशम्पायन बोले— हे चक्र-गदा-धारी केशव! पति-सेवा से मैंने जो थोड़ा-सा तप अर्जित किया है, उसी दुर्लभ तपोबल से मैं तुम्हें शाप देती हूँ।

Verse 43

यस्मात्‌ परस्परं घ्नन्तो ज्ञातय: कुरुपाण्डवा: | उपेक्षितास्ते गोविन्द तस्माज्ज्ञातीन्‌ वधिष्यसि

वैशम्पायन बोले— हे गोविन्द! कौरव-पाण्डव अपने ही ज्ञातियों को परस्पर मार रहे थे और तुमने उन्हें रोकने की उपेक्षा की; इसलिए तुम भी अपने ही बन्धु-बान्धवों का विनाश करोगे।

Verse 44

त्वमप्युपस्थिते वर्षे षट्त्रिंशे मधुसूदन । हतज्ञातिहतामात्यो हतपुत्रो वनेचर:

वैशम्पायन बोले— हे मधुसूदन! जब छत्तीसवाँ वर्ष उपस्थित होगा, तब तुम्हारे ज्ञाती मारे जाएँगे, तुम्हारे मन्त्री नष्ट होंगे और तुम्हारा पुत्र भी मारा जाएगा; तब तुम वन में विचरोगे।

Verse 45

अनाथवददविज्ञातो लोकेष्वनभिलक्षित: । कुत्सितेनाभ्युपायेन निधनं समवाप्स्यसि

वैशम्पायन बोले— तुम अनाथ के समान, सबसे अपरिचित और लोक में अनदेखे होकर विचरोगे; और किसी निन्दित उपाय से मृत्यु को प्राप्त होओगे।

Verse 46

तवाप्येवं हतसुता निहतज्ञातिबान्धवा: । स्त्रिय: परिपतिष्यन्ति यथैता भरतस्त्रिय:

इसी प्रकार तुम्हारे कुल की स्त्रियाँ भी—पुत्रों से वंचित और ज्ञाति-बान्धवों के मारे जाने पर—इन भरतवंश की स्त्रियों की भाँति अपने प्रियजनों के शवों पर गिर पड़ेंगी।

Verse 47

वैशम्पायन उवाच तच्छुत्वा वचन घोरं वासुदेवो महामना: । उवाच देवीं गान्धारीमीषदशभ्युत्स्मयन्निव

वैशम्पायन बोले—राजन्! वह घोर वचन सुनकर महामनस्वी वासुदेव (श्रीकृष्ण) ने, मानो हल्की-सी संयत मुसकान के साथ, देवी गान्धारी से कहा।

Verse 48

जाने5हमेतदप्येवं चीर्ण चरसि क्षत्रिये | दैवादेव विनश्यन्ति वृष्णयो नात्र संशय:

मैं यह भी जानता हूँ कि ऐसा ही होगा। हे क्षत्रिय-नारी! तुम तो केवल उसी का निर्वाह कर रही हो जो पहले ही रचा जा चुका है। इसमें संदेह नहीं—वृष्णिवंश दैववश ही नष्ट होगा।

Verse 49

संहर्ता वृष्णिचक्रस्य नान्यो मद्‌ विद्यते शुभे | अवध्यास्ते नरैरन्यैरपि वा देवदानवै:

हे शुभे! वृष्णि-समूह का संहारक मेरे सिवा और कोई नहीं जाना जाता। वे अन्य मनुष्यों से—यहाँ तक कि देवों और दानवों से भी—वध योग्य नहीं हैं।

Verse 50

इत्युक्तवति दाशार्हें पाण्डवास्त्रस्तचेतस: । बभूवुर्भुशसंविग्ना निराशाश्चापि जीविते,श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर पाण्डव मन-ही-मन भयभीत हो उठे। उन्हें बड़ा उद्वेग हुआ। वे सब-के-सब अपने जीवनसे निराश हो गये

दाशार्ह (श्रीकृष्ण) के ऐसा कहने पर पाण्डवों के चित्त भीतर ही भीतर त्रस्त हो उठे। वे अत्यन्त उद्विग्न हुए और जीवन के विषय में भी निराश हो गये।

Verse 493

परस्परकृतं नाशमतः: प्राप्स्यन्ति यादवा: । 'शुभे! वृष्णिकुलका संहार करनेवाला मेरे सिवा दूसरा कोई नहीं है। यादव दूसरे मनुष्यों तथा देवताओं और दानवोंके लिये भी अवध्य हैं; अत: आपसमें ही लड़कर नष्ट होंगे!

वैशम्पायन बोले—इसलिए यादव अपने ही परस्पर किए हुए कर्मों के कारण विनाश को प्राप्त होंगे; आपसी संघर्ष में ही नष्ट हो जाएंगे।

Frequently Asked Questions

Whether a capable mediator bears moral responsibility for non-intervention when foreseeing large-scale harm—especially when both sides are kin-linked and escalation is preventable through counsel or constraint.

The chapter juxtaposes human accountability with structural inevitability: ethical critique of preventable failure is voiced, while Kṛṣṇa’s reply frames certain outcomes as arising from internal causal chains that external force cannot indefinitely override.

Rather than a formal phalaśruti, the narrative uses Vaiśaṃpāyana’s framing and the Pāṇḍavas’ reaction to signal interpretive weight: the curse functions as a moral index, linking comprehension of grief and responsibility to the epic’s broader inquiry into order, consequence, and impermanence.

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