स्त्रीपर्व — अध्याय १५: गान्धारी-युधिष्ठिर-संवादः
Gandhārī’s Confrontation and Consolation of Yudhiṣṭhira
तमभ्यगच्छद् राजेन्द्रो वेपमान: कृताज्जलि: । युधिष्ठिरस्त्विदं तत्र मधुरं वाक्यमब्रवीत्,यह सुनकर महाराज युधिष्छिर काँपते हुए हाथ जोड़े उनके सामने आये और बड़ी मीठी वाणीमें बोले--“देवि! आपके पुत्रोंका संहार करनेवाला क्रूरकर्मा युधिष्ठिर मैं हूँ। पृथ्वीभरके राजाओंका नाश करानेमें मैं ही हेतु हूँ, इसलिये शापके योग्य हूँ। आप मुझे शाप दे दीजिये
tam abhyagacchad rājendro vepamānaḥ kṛtāñjaliḥ | yudhiṣṭhiras tv idaṃ tatra madhuraṃ vākyam abravīt ||
तब राजाधिराज युधिष्ठिर काँपते हुए, हाथ जोड़कर उनके पास गये। वहाँ उन्होंने मधुर और विनीत वाणी में कहा—“देवि! आपके पुत्रों के संहार का क्रूर कर्मी युधिष्ठिर मैं ही हूँ। पृथ्वी के राजाओं के विनाश का कारण भी मैं ही बना हूँ; इसलिए मैं शाप के योग्य हूँ। आप मुझे शाप दीजिए।”
वैशम्पायन उवाच