
राजधर्मः—प्रजापालनं दानयज्ञश्च (Royal Duty—Protection of Subjects, Generosity, and Sacrificial Discipline)
Upa-parva: Rājadharmānuśāsana (Instruction on Royal Duty)
Chapter 76 presents a structured exchange where Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma what mode of conduct enables a king to foster human flourishing and attain meritorious realms. Bhīṣma outlines an ideal of disciplined rulership: generosity (dāna), sacrificial/ritual commitment (yajña), austerity and restraint (upavāsa, tapas), continuous protection of all subjects through dharma, and public honoring of the righteous—because the king’s conduct becomes a social template. He emphasizes firm justice and suppression of predatory disorder, coupled with accountability: the ruler shares a defined portion of the subjects’ merit when he protects them, and likewise shares a portion of their demerit when he fails to protect. Administrative restitution is also prescribed: if stolen wealth cannot be recovered, compensation is to be paid from the royal treasury. Special stress is placed on safeguarding sacred/learned property (brahmasva) and avoiding harm to the learned community, presented as foundational to overall security. Yudhiṣṭhira voices principled reluctance to rule if dharma cannot be maintained and proposes forest-dwelling austerity; Bhīṣma counters that mere gentleness without the capacities required for governance is socially ineffective, and that ancestral expectations include courage, strength, and public responsibility. The chapter closes by defining the highest ‘svargya’ achievement as enabling immediate security and well-being for dependents, urging Yudhiṣṭhira to rule, protect the ethical, and restrain destabilizing forces so that society may ‘live after him’ as beings depend on rain and sheltering trees.
Chapter Arc: युधिष्ठिर पितामह भीष्म से पूछते हैं—वह कौन-सी ‘वृत्ति’ (आचरण-नीति) है जिससे राजा प्रजा की उन्नति करे और स्वयं भी विशुद्ध लोकों पर विजय पाए। → भीष्म राजधर्म का कठोर यथार्थ खोलते हैं: राजा को धर्मपूर्वक प्रजा-पालन, उत्थान (परिश्रम), दान, और धर्मात्माओं का सम्मान करना चाहिए; पर साथ ही राज्य-रक्षा में दण्ड, कठोरता और नीति-चातुर्य भी अनिवार्य है। युधिष्ठिर की करुणा-प्रधान बुद्धि और राज्य की अनिवार्य कठोरताओं के बीच तनाव बढ़ता है। → भीष्म स्पष्ट कहते हैं कि केवल ‘शुद्ध अनृशंस्य’ (निर्मल दया) से राज्य नहीं चल सकता—राजा को पितृ-पैतामह आचार के अनुरूप, दयालु होते हुए भी दण्ड-समर्थ और निर्भय होना पड़ता है; तभी लोग ऐसे राजा के अधीन सुरक्षित होकर जीविका पाते हैं। → राजधर्म का संतुलित आदर्श स्थापित होता है: धर्म से प्रजा-रक्षा, योग्य का पूजन, दान-व्यवस्था, और ब्राह्मस्व/ब्राह्मण-धन की सर्ववर्णीय रक्षा; साथ ही दुष्ट के प्रति कठोर नीति। युधिष्ठिर की विरक्ति को भीष्म राज्य-धर्म की महिमा दिखाकर दिशा देते हैं। → अगले उपदेश के लिए भूमि तैयार होती है—राजा के दण्ड, दोष-भाग (पाप-भाग) और शासन-नीति के सूक्ष्म निर्णयों पर आगे और गहन विवेचन का संकेत।
Verse 1
अत पञ्चसप्ततितमोब ध्याय: राजाके कर्तव्यका वर्णन, युधिष्ठिरका राज्यसे विरक्त होना एवं भीष्मजीका पुन: राज्यकी महिमा सुनाना युधिषछ्िर उवाच यया वृत्त्या महीपालो विवर्धयति मानवान् | पुण्यांश्व लोकान् जयति तनमे ब्रूहि पितामह
युधिष्ठिर ने कहा—पितामह! वह कौन-सी वृत्ति है जिससे राजा प्रजा का पालन-पोषण और उन्नति करता है तथा पुण्यलोकों को भी जीत लेता है? वह मार्ग मुझे बताइए।
Verse 2
युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! राजा जिस वृत्तिसे रहनेपर अपने प्रजाजनोंकी उन्नति करता है और स्वयं भी विशुद्ध लोकोंपर विजय प्राप्त कर लेता है, वह मुझे बताइये ।। भीष्म उवाच दानशीलो भवेद् राजा यज्ञशीलश्न भारत । उपवासतप:शील: प्रजानां पालने रत:,भीष्मजीने कहा--भरतनन्दन! राजाको सदा ही दानशील, यज्ञशील, उपवास और तपस्यामें तत्पर एवं प्रजा-पालनमें संलग्न रहना चाहिये
युधिष्ठिर ने पूछा— “पितामह! वह कौन-सी जीवन-रीति है जिससे राजा अपनी प्रजा का कल्याण और उन्नति करता है और स्वयं भी विशुद्ध लोकों को प्राप्त करता है? कृपा करके बताइए।” भीष्म बोले— “भरतनन्दन! राजा को सदा दानशील, यज्ञशील, उपवास और तप में संयमी तथा प्रजा-पालन में निरन्तर तत्पर रहना चाहिए।”
Verse 3
सर्वाश्चैव प्रजा नित्यं राजा धर्मेण पालयन् । उत्थानेन प्रदानेन पूजयेच्चापि धार्मिकान्,समस्त प्रजाओंका सदा धर्मपूर्वक पालन करनेवाले राजाको घरपर आये हुए धर्मात्मा पुरुषोंका खड़ा होकर स्वागत करना चाहिये और उत्तम वस्तुएँ देकर उनका आदर-सत्कार करना चाहिये
राजा को चाहिए कि वह समस्त प्रजाओं का सदा धर्मपूर्वक पालन करे। और जो धर्मात्मा पुरुष उसके घर आएँ, उनका खड़े होकर स्वागत करे तथा उत्तम वस्तुएँ देकर उनका आदर-सत्कार करे।
Verse 4
राज्ञा हि पूजितो धर्मस्तत: सर्वत्र पूज्यते । यद् यदाचरते राजा तत् प्रजानां सम रोचते,राजाद्वारा जब जिस धर्मका आदर किया जाता है उसका फिर सर्वत्र आदर होने लगता है; क्योंकि राजा जो-जो कार्य करता है, प्रजावर्गको वही करना अच्छा लगता है
राजा जिस धर्म का आदर करता है, वही धर्म फिर सर्वत्र आदर पाने लगता है; क्योंकि राजा जो-जो आचरण करता है, प्रजा को वही आचरण प्रिय और अनुकरणीय प्रतीत होता है।
Verse 5
नित्यमुद्यतदण्डश्न भवेन्मृत्युरिवारिषु । निहन्यात् सर्वतो दस्यून्ू न कामात् कस्यचित् क्षमेत्,राजाको चाहिये कि वह शत्रुओंको यमराजकी भाँति सदा दण्ड देनेके लिये उद्यत रहे। वह डाकुओं और लुटेरोंको सब ओरसे पकड़कर मार डाले। स्वार्थवश किसी दुष्टके अपराधको क्षमा न करे
राजा को चाहिए कि वह शत्रुओं के प्रति यमराज की भाँति सदा दण्ड देने को उद्यत रहे। वह डाकुओं-लुटेरों को चारों ओर से पकड़कर नष्ट कर दे, और स्वार्थवश किसी दुष्ट के अपराध को क्षमा न करे।
Verse 6
य॑ हि धर्म चरन्तीह प्रजा राज्ञा सुरक्षिता: । चतुर्थ तस्य धर्मस्य राजा भारत विन्दति,भारत! राजाद्वारा सुरक्षित हुई प्रजा यहाँ जिस धर्मका आचरण करती है, उसका चौथा भाग राजाको भी मिल जाता है
हे भारत! राजा द्वारा सुरक्षित प्रजा यहाँ जिस धर्म का आचरण करती है, उस धर्म के पुण्य का चौथा भाग राजा को भी प्राप्त होता है।
Verse 7
यदधीते यद् ददाति यज्जुहोति यदर्चति । राजा चतुर्थभाक् तस्य प्रजा धर्मेण पालयन्,प्रजा जो स्वाध्याय, जो दान, जो होम और जो पूजन करती है, उन पुण्य कर्मोंका एक चौथाई भाग उस प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करनेवाला नरेश प्राप्त कर लेता है
प्रजा जो स्वाध्याय, दान, होम और पूजन करती है—उन सब पुण्यकर्मों का चौथा भाग, धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करने वाला राजा प्राप्त करता है।
Verse 8
यद् राष्ट्रेडकुशलं किज्चिद् राज्ञो5रक्षयत: प्रजा: । चतुर्थ तस्य पापस्य राजा भारत विन्दति,भरतनन्दन! यदि राजा प्रजाकी रक्षा नहीं करता तो उसके राज्यमें प्रजा जो कुछ भी अशुभ कार्य करती है, उस पापकर्मका एक चौथाई भाग राजाको भोगना पड़ता है
भरतनन्दन! यदि राजा प्रजा की रक्षा नहीं करता, तो उसके राज्य में प्रजा जो कुछ भी अशुभ करती है, उस पाप का चौथा भाग राजा को भोगना पड़ता है।
Verse 9
अप्याहुः सर्वमेवेति भूयो5र्धमिति निश्चय: । कर्मण: पृथिवीपाल नृशंसो5नृतवागपि,पृथ्वीपते! कुछ लोगोंका मत है कि उपर्युक्त अवस्थामें राजाको पूरे पापका भागी होना पड़ता है, और कुछ लोगोंका यह निश्चय है कि उसको आधा पाप लगता है। ऐसा राजा क्रूर और मिथ्यावादी समझा जाता है
पृथ्वीपाल! कुछ लोग कहते हैं कि ऐसी दशा में राजा पूरे पाप का भागी होता है; और कुछ का निश्चय है कि उसे आधा पाप लगता है। ऐसा राजा क्रूर और मिथ्यावादी भी समझा जाता है।
Verse 10
तादृशात् किल्बिषाद् राजा शृणु येन प्रमुच्यते । प्रत्याहर्तुमशक्यं स्याद् धन॑ चोरै्ह्वत॑ यदि । तत् स्वकोशातृ् प्रदेयं स्पादशक्तेनोपजीवत:,ऐसे पापसे राजाको किस उपायसे छुटकारा मिलता है, वह बताता हूँ, सुनो। चोरों या लुटेरोंने यदि किसीके धनका अपहरण कर लिया हो और राजा पता लगाकर उस धनको लौटा न सके तो उस असमर्थ नरेशको चाहिये कि वह अपने आश्रयमें रहनेवाले उस मनुष्यको उतना ही धन राजकीय खजानेसे दे दे
ऐसे पाप से राजा किस उपाय से मुक्त होता है, वह सुनो। यदि चोर-लुटेरे किसी का धन हर लें और राजा खोजकर भी उसे लौटा न सके, तो उस असमर्थ राजा को चाहिए कि अपने राजकोष से उतना ही धन देकर, अपने आश्रित प्रजा का प्रतिकार करे।
Verse 11
सर्ववर्णै: सदा रक्ष्यं ब्रह्म॒स्वं ब्राह्मणा यथा । न स्थेयं विषये तेन यो5पकुर्याद् द्विजातिषु,सभी वर्णके लोगोंको ब्राह्मणोंके धनकी भी रक्षा उसी प्रकार करनी चाहिये जिस प्रकार स्वयं ब्राह्मणोंकी। जो ब्राह्मणोंको कष्ट पहुँचाता हो, उसे राजाको अपने राज्यमें नहीं रहने देना चाहिये
सब वर्णों के लोगों को ब्राह्मस्व (ब्राह्मणों के लिए समर्पित धन) की सदा रक्षा करनी चाहिए, जैसे ब्राह्मण स्वयं उसकी रक्षा करते हैं। जो द्विजों को कष्ट पहुँचाए, उसे राजा को अपने राज्य में नहीं रहने देना चाहिए।
Verse 12
ब्रह्मस्वे रक्ष्यमाणे तु सर्व भवति रक्षितम् । तस्मात् तेषां प्रसादेन कृतकृत्यो भवेन्नूप:,ब्राह्मणके धनकी रक्षा की जानेपर ही सब कुछ रक्षित हो जाता है; क्योंकि उन ब्राह्मणोंकी कृपासे राजा कृतार्थ हो जाता है
ब्राह्मणों के धन और हित की रक्षा होने पर सब कुछ सुरक्षित हो जाता है। इसलिए उन ब्राह्मणों की कृपा से राजा कृतकृत्य और कृतार्थ हो जाता है।
Verse 13
पर्जन्यमिव भूतानि महाद्रुममिव द्विजा: | नरास्तमुपजीवन्ति नृपं सर्वार्थसाधकम्,जैसे सब प्राणी मेघोंके और पक्षी वृक्षोंके सहारे जीवन-निर्वाह करते हैं, उसी प्रकार सब मनुष्य सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि करनेवाले राजाके आश्रित होकर जीवनयापन करते हैं
जैसे प्राणी मेघ के सहारे और पक्षी महान वृक्ष के सहारे जीवन निर्वाह करते हैं, वैसे ही सब मनुष्य समस्त अर्थों को साधने वाले राजा के आश्रय से जीवन यापन करते हैं।
Verse 14
न हि कामात्मना राज्ञा सततं कामबुद्धिना । नृशंसेनातिलुब्धेन शक््यं पालयितुं प्रजा:,जो राजा कामासक्त हो सदा कामका ही चिन्तन करनेवाला, क्रूर और अत्यन्त लोभी होता है, वह प्रजाका पालन नहीं कर सकता
जो राजा कामासक्त, सदा भोग-बुद्धि में डूबा हुआ, क्रूर और अत्यन्त लोभी हो, वह प्रजा का पालन-रक्षण नहीं कर सकता।
Verse 15
युधिछिर उवाच नाहं राज्यसुखान्वेषी राज्यमिच्छाम्यपि क्षणम् | धर्मार्थ रोचये राज्यं धर्मश्चात्र न विद्यते,युधिष्ठिरने कहा--पितामह! मैं राज्यसे सुख मिलनेकी आशा रखकर कभी एक क्षणके लिये भी राज्य करनेकी इच्छा नहीं करता। मैं तो धर्मके लिये ही राज्यको पसंद करता था; परंतु मालूम होता है कि इसमें धर्म नहीं है
युधिष्ठिर ने कहा—पितामह! मैं राज्य-सुख की खोज में नहीं हूँ; एक क्षण के लिए भी राज्य नहीं चाहता। मैंने तो धर्म के लिए ही राज्य को स्वीकार्य माना था, पर यहाँ तो धर्म दिखाई नहीं देता।
Verse 16
तदलं मम राज्येन यत्र धर्मो न विद्यते । वनमेव गमिष्यामि तस्माद् धर्मचिकीर्षया,जिसमें धर्म ही नहीं है, उस राज्यसे मुझे क्या लेना है? अतः अब मैं धर्म करनेकी इच्छासे वनमें ही चला जाऊँगा
जिस राज्य में धर्म नहीं है, उस राज्य से मुझे क्या प्रयोजन? इसलिए अब धर्म करने की इच्छा से मैं वन ही जाऊँगा।
Verse 17
तत्र मेध्येष्वरण्येषु न्यस्तदण्डो जितेन्द्रिय: । धर्ममाराधयिष्यामि मुनिर्मूलफलाशन:,वहाँ वनके पावन प्रदेशोंमें हिंसाका सर्वथा त्याग कर दूँगा और जितेन्द्रिय हो मुनिवृत्तिसे रहकर फल-मूलका आहार करते हुए धर्मकी आराधना करूँगा
वहाँ वन के पावन प्रदेशों में मैं हिंसा का सर्वथा त्याग कर, इन्द्रियों को वश में करके, मुनिवृत्ति से रहकर, मूल-फल का आहार करते हुए धर्म की आराधना करूँगा।
Verse 18
भीष्म उवाच वेदाहं तव या बुद्धिरानृशंस्यगुणैव सा । न च शुद्धानृशंस्येन शक््यं राज्यमुपासितुम्,भीष्मजीने कहा--राजन! मैं जानता हूँ कि तुम्हारी बुद्धिमें दया और कोमलतारूपी गुण ही भरा है; परंतु केवल दया एवं कोमलतासे ही राज्यका शासन नहीं किया जा सकता
भीष्मजी ने कहा—राजन्! मैं जानता हूँ कि तुम्हारी बुद्धि दया और कोमलता के गुणों से ही परिपूर्ण है; परन्तु केवल शुद्ध दया-कोमलता से राज्य का शासन नहीं किया जा सकता।
Verse 19
अपि तु वां मृदुप्रज्ञमत्यार्यमतिधार्मिकम् । क्लीबं धर्मघृणायुक्तं न लोको बहु मन्यते,तुम्हारी बुद्धि अत्यन्त कोमल है। तुम बड़े सज्जन और बड़े धर्मात्मा हो। धर्मके प्रति तुम्हारा महान् अनुग्रह है। यह सब होनेपर भी संसारके लोग तुम्हें कायर समझकर अधिक आदर नहीं देंगे
तुम्हारी बुद्धि अत्यन्त कोमल है। तुम बड़े आर्य, बड़े धर्मात्मा हो, और धर्म के प्रति तुम्हारा गहरा अनुराग है; तथापि संसार के लोग तुम्हें कायर समझकर अधिक मान नहीं देंगे।
Verse 20
वृत्तं तु स्वमपेक्षस्व पितृपैतामहोचितम् । नैव राज्ञां तथा वृत्तं यथा त्वं स्थातुमिच्छसि,तुम्हारे बाप-दादोंने जिस आचार-व्यवहारको अपनाया था, उसे ही प्राप्त करनेकी तुम भी इच्छा रखो। तुम जिस तरह रहना चाहते हो, वह राजाओंका आचरण नहीं है
अपने पिता-पितामहों के अनुरूप जो आचार-व्यवहार तुम्हारा है, उसी की ओर देखो। जिस प्रकार तुम रहना चाहते हो, वह राजाओं के लिए उचित आचरण नहीं है।
Verse 21
न हि वैक्लव्यसंसृष्टमानृशंस्यमिहास्थित: । प्रजापालनसम्भूतमाप्ता धर्मफलं हासि,इस प्रकार व्याकुलताजनित कोमलताका आश्रय लेकर तुम यहाँ प्रजापालनसे सुलभ होनेवाले धर्मके फलको नहीं पा सकोगे
यदि तुम व्याकुलता से उत्पन्न इस कोमलता का आश्रय लेकर यहाँ ठहरे रहोगे, तो प्रजा-पालन से जो धर्मफल प्राप्त होता है, उसे तुम नहीं पा सकोगे।
Verse 22
न होतामाशिषं पाण्डुर्न च कुन्ती त्वयाचत । तथैतत् प्रज्ञया तात यथा55चरसि मेधया
भीष्म बोले—न पाण्डु ने तुमसे कभी आशीर्वाद माँगा, न कुन्ती ने ही तुमसे कुछ याचना की। फिर भी, प्रिय तात, इस विषय में तुम जिस प्रज्ञा और मेधा से आचरण कर रहे हो, वह परम हित के अनुरूप है।
Verse 23
तात! तुम अपनी बुद्धि और विचारसे जैसा आचरण करते हो, तुम्हारे विषयमें ऐसी आशा न तो पाण्डुने की थी और न कुन्तीने ही ऐसी आशा की थी ।। शौर्य बल॑ च सत्यं च पिता तव सदाब्रवीत् । माहात्म्यं च महौदार्य भवत: कुन्त्ययाचत,तुम्हारे पिता पाण्डु तुम्हारे लिये सदा कहा करते थे कि मेरे पुत्रमें शूरता, बल और सत्यकी वृद्धि हो। तुम्हारी माता कुन्ती भी यही इच्छा किया करती थी कि तुम्हारी महत्ता और उदारता बढ़े
भीष्म बोले—तात, तुम अपनी बुद्धि और विचार से जैसा आचरण कर रहे हो, वैसा न पाण्डु ने कभी चाहा था, न कुन्ती ने। तुम्हारे पिता पाण्डु बार-बार कहा करते थे—“मेरे पुत्र में शौर्य, बल और सत्य की वृद्धि हो।” और माता कुन्ती भी यही प्रार्थना करती थी कि तुम्हारी महत्ता और उदारता बढ़े।
Verse 24
नित्यं स्वाहा स्वधा नित्यं चोभे मानुषदैवते । पुत्रेष्वाशासते नित्यं पितरो दैवतानि च,प्रतिदिन यज्ञ और श्राद्धू--ये दोनों कर्म क्रमश: देवताओं तथा मानव-पितरोंको आनन्दित करनेवाले हैं। देवता और पितर अपनी संतानोंसे सदा इन्हीं कर्मोंकी आशा रखते हैं
भीष्म बोले—‘स्वाहा’ और ‘स्वधा’—ये दोनों नित्य हैं; ये क्रमशः देव-लोक और पितृ-लोक के प्रतीक हैं। इसलिए देवता और पितर अपनी संतानों से सदा यही अपेक्षा रखते हैं कि वे देवताओं के लिए यज्ञ और पितरों के लिए श्राद्ध-तर्पण नियमित रूप से करें।
Verse 25
दानमध्ययन यज्ञ प्रजानां परिपालनम् । धर्ममेतदधर्म वा जन्मनैवाभ्यजायथा:,दान, वेदाध्ययन, यज्ञ तथा प्रजाका पालन--ये धर्मरूप हों या अधर्मरूप। तुम्हारा जन्म इन्हीं कर्मोको करनेके लिये हुआ है
भीष्म बोले—दान, वेदाध्ययन, यज्ञ और प्रजा का पालन—ये कर्म तुम्हारे लिए जन्म से ही नियत हैं। वे धर्मरूप हों या अधर्म की ओर फिसल जाएँ, यह उनके करने के ढंग पर निर्भर है; पर उन्हें करना तुम्हारे पद और जन्म का स्वाभाविक कर्तव्य है।
Verse 26
काले धुरि च युक्तानां वहतां भारमाहितम् । सीदतामपि कौन्तेय न कीर्तिरवसीदति,कुन्तीनन्दन! यथासमय भार वहन करनेमें लगाये गये पुरुषोंपर जो राज्य आदिका भार रख दिया जाता है, उसे वहन करते समय यद्यपि कष्ट उठाना पड़ता है तथापि उससे उन पुरुषोंकी कीर्ति चिरस्थायी होती है, उसका कभी क्षय नहीं होता
भीष्म बोले—कौन्तेय, जो पुरुष समय पर धुरी में नियुक्त होकर अपने ऊपर रखे गए भार को वहन करते हैं, वे उसे ढोते-ढोते थक भी जाएँ; पर उनकी कीर्ति कभी नहीं घटती। उचित दायित्व को धैर्य से निभाने पर यश चिरस्थायी होता है।
Verse 27
समन्ततो विनियतो वहत्यस्खलितो हि यः । निर्दोष: कर्मवचनात् सिद्धि: कर्मण एव सा,जो मनुष्य सब ओरसे मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर अपने ऊपर रखे हुए कार्यभारको पूर्णरूपसे वहन करता है और कभी लड़खड़ाता नहीं है, उसे कोई दोष नहीं प्राप्त होता; क्योंकि शास्त्रमें कर्म करनेका कथन है; अतः राजाको कर्म करनेसे ही वह सिद्धि प्राप्त हो जाती है (जिसे तुम वनवास और तपस्यासे पाना चाहते हो)
भीष्म बोले—जो मनुष्य चारों ओर से मन और इन्द्रियों को संयम में रखकर अपने ऊपर रखे हुए कर्तव्य-भार को स्थिरता से वहन करता है और कभी नहीं डगमगाता, उसे कोई दोष नहीं लगता। क्योंकि शास्त्र कर्म का ही विधान करते हैं; इसलिए राजा के लिए सिद्धि अपने नियत कर्म के पालन से ही होती है—केवल वनवास और तपस्या से नहीं।
Verse 28
नैकान्तविनिपातेन विचचारेह कश्षन । धर्मी गृही वा राजा वा ब्रह्मचारी यथा पुन:,कोई धर्मनिष्ठ हो, गृहस्थ हो, ब्रह्मचारी हो या राजा हो, पूर्णतया धर्मका आचरण नहीं कर सकता (कुछ-न-कुछ अधर्मका मिश्रण हो ही जाता है)
भीष्म बोले—इस संसार में कोई भी मनुष्य एकान्ततः एक ही पक्ष पर चलकर जीवन नहीं बिताता। चाहे वह धर्मनिष्ठ हो, गृहस्थ हो, राजा हो या ब्रह्मचारी—धर्म का पूर्णतः शुद्ध और निरमिश्र आचरण संभव नहीं; मनुष्य के आचरण में कुछ-न-कुछ विपरीत प्रवृत्तियों और स्खलनों का मिश्रण अनिवार्यतः आ जाता है।
Verse 29
अल्पं हि सारभूयिष्ठं यत् कर्मोदारमेव तत् । कृतमेवाकृताच्छेयो न पापीयो<स्त्यकर्मण:,कोई काम देखनेमें छोटा होनेपर भी यदि उसमें सार अधिक हो तो वह महान् ही है। न करनेकी अपेक्षा कुछ करना ही अच्छा है; क्योंकि कर्तव्य-कर्म न करनेवालेसे बढ़कर दूसरा कोई पापी नहीं है
जो कर्म देखने में छोटा हो, पर उसमें सार अधिक हो, वही वास्तव में महान् है। न करने की अपेक्षा कुछ करना ही श्रेयस्कर है; क्योंकि कर्तव्य-कर्म न करने वाले से बढ़कर कोई पापी नहीं।
Verse 30
यदा कुलीनो धर्मज्ञ: प्राप्तोत्यैश्वर्यमुत्तमम् । योगक्षेमस्तदा राज्ञ: कुशलायैव कल्प्यते,जब धर्मज्ञ एवं कुलीन मुनष्य राजाके यहाँ उत्तम ईश्वरभावको अर्थात् मन्त्री आदिके उच्च अधिकारको पाता है, तभी राजाका योग और क्षेम सिद्ध होता है, जो उसके कुशल- मड़लका साधक है
जब धर्मज्ञ और कुलीन पुरुष राजा के यहाँ उत्तम ऐश्वर्य—अर्थात् मन्त्री आदि का उच्च अधिकार—प्राप्त करता है, तभी राजा का योग-क्षेम सिद्ध होता है; और वही उसके कुशल-मण्डल का साधन बनता है।
Verse 31
दानेनान्यं बलेनान्यमन्यं सूनूृतया गिरा । सर्वतः प्रतिगृह्नीयादू राज्यं प्राप्पेह धार्मिक:,धर्मात्मा राजा राज्य पानेके अनन्तर किसीको दानसे, किसीको बलसे और किसीको मधुर वाणीद्वारा सब ओरसे अपने वशमें कर ले
भीष्म बोले—राज्य प्राप्त करके धर्मात्मा राजा किसी को दान से, किसी को बल से और किसी को मधुर तथा सत्य वाणी से—इस प्रकार सब ओर से प्रजा को अपने वश में कर ले।
Verse 32
यं हि वैद्या: कुले जाता ह्वृत्तिभयपीडिता: । प्राप्य तृप्ता: प्रतिष्ठन्ति धर्म:को5भ्यधिकस्तत:,जीवन-निर्वाहका कोई उपाय न होनेके कारण जो भयसे पीड़ित रहते हैं, ऐसे कुलीन एवं विद्वान् पुरुष जिस राजाका आश्रय लेकर संतुष्ट हो प्रतिष्ठापूर्वक रहने लगते हैं, उस राजाके लिये इससे बढ़कर धर्मकी बात और क्या होगी?
जीविका के उपाय न होने से जो भयभीत रहते हैं, ऐसे कुलीन और विद्वान—वैद्य-वंश में उत्पन्न—पुरुष जिस राजा का आश्रय पाकर तृप्त होकर प्रतिष्ठापूर्वक स्थिर हो जाते हैं, उस राजा के लिए इससे बढ़कर धर्म और क्या हो सकता है?
Verse 33
युधिछिर उवाच कि तात परमं स्वर्ग्यं का ततः प्रीतिरुत्तमा । कि ततः परमैश्चर्य ब्रूहि मे यदि पश्यसि,युधिष्ठटिरने पूछा--तात! स्वर्ग-प्राप्तिका उत्तम साधन क्या है? उससे कौन-सी उत्तम प्रसन्नता प्राप्त होती है? तथा उसकी अपेक्षा महान् ऐश्वर्य क्या है? यदि आप इन बातोंको जानते हैं तो मुझे बताइये
युधिष्ठिर ने पूछा—तात! स्वर्ग-प्राप्ति का परम साधन क्या है? उससे उत्पन्न होने वाली उत्तम प्रसन्नता कौन-सी है? और उससे भी परे परम ऐश्वर्य क्या है? यदि आप इन बातों को जानते हों तो मुझे बताइए।
Verse 34
भीष्य उवाच यस्मिन् भयार्दित: सम्यक् क्षेमं विन्दत्यपि क्षणम् । स स्वर्गजित्तमो<स्माकं सत्यमेतद् ब्रवीमि ते,भीष्मजीने कहा--राजन्! भयसे डरा हुआ मनुष्य जिसके पास जाकर एक क्षणके लिये भी भलीभाँति शान्ति पा लेता है, वही हमलोगोंमें स्वर्गलोककी प्राप्तिका सबसे बड़ा अधिकारी है, यह मैं तुमसे सच्ची बात कहता हूँ
भीष्म ने कहा—राजन्! भय से व्याकुल मनुष्य जिसके पास जाकर एक क्षण के लिए भी सच्चा क्षेम और शान्ति पा लेता है, वही हम लोगों में स्वर्ग को जीतने का सबसे बड़ा अधिकारी है—यह सत्य बात मैं तुमसे कहता हूँ।
Verse 35
त्वमेव प्रीतिमांस्तस्मात् कुरूणां कुरुसत्तम । भव राजा जय स्वर्ग सतो रक्षासतो जहि,इसलिये कुरुश्रेष्ठ! तुम्हीं प्रसन्नतापूर्वक कुरुदेशकी प्रजाके राजा बनो। सत्पुरुषोंकी रक्षा तथा दुष्टोंका संहार करो और इस प्रकार अपने कर्तव्यका पालन करके स्वर्गलोकपर विजय प्राप्त कर लो
इसलिए, कुरुश्रेष्ठ! तुम ही प्रसन्नचित्त होकर कुरुओं के राजा बनो। सत्पुरुषों की रक्षा करो, असत् का संहार करो, और इस प्रकार अपने कर्तव्य का पालन करके स्वर्ग में विजय प्राप्त करो।
Verse 36
अनु त्वां तात जीवन्तु सुहदद: साधुभि: सह । पर्जन्यमिव भूतानि स्वादुद्रुममिव द्विजा:,तात! जैसे सब प्राणी मेघके और पक्षी स्वादिष्ठ फलवाले वृक्षके सहारे जीवन-निर्वाह करते हैं, उसी प्रकार साधु पुरुषोंसहित समस्त सुहृदगण तुम्हारे आश्रयमें रहकर अपनी जीविका चलावें
तात! जैसे समस्त प्राणी मेघ के सहारे और पक्षी मधुर फल वाले वृक्ष के सहारे जीवन-निर्वाह करते हैं, वैसे ही साधु पुरुषों सहित तुम्हारे सभी सुहृद तुम्हारे आश्रय में रहकर जीवन-यापन करें।
Verse 37
धृष्ट शूरं प्रहर्तारिमनृशंसं जितेन्द्रियम् । वत्सलं संविभक्तारमुपजीवन्ति तं नरा:,जो राजा निर्भय, शूरवीर, प्रहार करनेमें कुशल, दयालु, जितेन्द्रिय, प्रजावत्सल और दानी होता है, उसीका आश्रय लेकर मनुष्य जीवन-निर्वाह करते हैं
जो राजा निर्भय, शूरवीर, आक्रमणकारियों का दमन करने में निपुण, फिर भी करुणाशील; जितेन्द्रिय, प्रजावत्सल और उदार दानी होता है—मनुष्य उसी का आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करते हैं।
Verse 74
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधमनुशासनपर्वमें मुचुकुन्दका उपाख्यानविषयक चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ
इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्व में मुचुकुन्द-उपाख्यानविषयक चौहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
Verse 75
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि पञ्चसप्ततितमो<ध्याय: ।। ७५ || इस प्रकार श्रीमद्या भारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधमनुशासनपर्वमें पचद्तत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ
इति श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्व में पचहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
Yudhiṣṭhira’s dilemma is whether kingship can be ethically sustained: he prefers renunciation if rule cannot reliably embody dharma, while Bhīṣma argues that responsible governance is itself a dharmic obligation when it secures public welfare.
Kingship is ethically justified by protection and accountability: the ruler must model dharma, enforce lawful order without caprice, compensate harms when recovery is impossible, and understand that he participates in the moral outcomes of the society he safeguards or neglects.
Rather than a formal phalaśruti formula, the chapter embeds a results-logic: the ruler gains a specified share of subjects’ merit through protection and incurs a share of fault through neglect, framing governance as morally consequential action within the larger pursuit of welfare and ethical stability.