राजा-दैवतत्वम् — The King as a Stabilizing ‘Daivata’ (Divine Function) in Social Order
मनुर॒ुवाच बिभेमि कर्मण: पापाद् राज्यं हि भृशदुस्तरम् । विशेषतो मनुष्येषु मिथ्यावृत्तेषु नित्यदा
मनु बोले—भगवन्! मैं पापकर्म से बहुत डरता हूँ। राज्य करना अत्यन्त कठिन है; विशेषतः जो मनुष्य सदा मिथ्याचार में प्रवृत्त रहते हैं, उन पर शासन करना तो और भी दुष्कर है।
भीष्म उवाच