Āścarya-kathana: Brāhmaṇa–Nāga Dialogue on Sūrya (Vivasvat) and the ‘Second Sun’ Phenomenon
एष एकान्तथर्मस्ते कीर्तितो नृपसत्तम । मया गुरुप्रसादेन दुर्विज्ञेयोडकृतात्मभि:
नृपश्रेष्ठ! गुरुकृपा से ज्ञात यह एकान्त-धर्म (अनन्य भक्ति-धर्म) मैंने तुम्हें कहा है। जिनका अन्तःकरण शुद्ध नहीं, उनके लिए इसका जानना अत्यन्त कठिन है।
वैशम्पायन उवाच