नारद–शुक संवादः
Impermanence, Svabhāva, and Śuka’s Resolve for Yoga
साड्रोपाड्ानपि यदि यश्न वेदानधीयते । वेदवेद्यं न जानीते वेदभारवहो हि सः,सांगोपांग वेद पढ़कर भी जो वेदोंके द्वारा जाननेके योग्य परमेश्वरको नहीं जानता, वह मूढ़ केवल वेदोंका बोझ ढोनेवाला है
sāṅgopāṅgān api yadi yaḥ naraḥ vedān adhīyate | veda-vedyaṃ na jānīte veda-bhāra-vaho hi saḥ ||
याज्ञवल्क्य बोले—जो मनुष्य साङ्गोपाङ्ग वेदों का भी अध्ययन कर ले, पर वेदों द्वारा जानने योग्य परमेश्वर को न जाने, वह निश्चय ही मूढ़ है—वह केवल वेदों का बोझ ढोनेवाला है।
याज़्ञवल्क्य उवाच