Aśoka-śāstra: Nārada’s Instruction on the Cessation of Śoka
Grief
ऊर्णनाभेर्यथा चक्र छिद्रें सोम॑ं प्रपश्यति
ūrṇanābher yathā cakra-chidre somaṃ prapaśyati
याज्ञवल्क्य बोले—जैसे मकड़ी अपने जाले के चक्र के छिद्र से चन्द्रमा को देख लेती है, वैसे ही विवेकी पुरुष इस जगत्-जाल के बीच किसी सूक्ष्म द्वार से परतत्त्व का दर्शन कर लेता है।
याज्ञवल्क्य उवाच