नारद–शुक संवादः (Nārada–Śuka Dialogue): Tyāga, Saṃyama, and Vyakta–Avyakta Viveka
निवति तु यथा दीपो ज्वलेत् स्नेहसमन्वित: । निश्चलोर्ध्वशिखस्तद्वद् युक्तमाहुर्मनीषिण:
जैसे तेल से भरा दीपक वायु-रहित स्थान में एकरस जलता है और उसकी शिखा निश्चल होकर ऊपर उठी रहती है, वैसे ही समाधिनिष्ठ योगी को मनीषीजन स्थिर कहते हैं।
याज़्ञवल्क्य उवाच