Śuka’s Nirveda: Vyāsa’s Admonition on Dharma, Impermanence, and ‘Imperishable Wealth’ (अक्षय-धन)
असता धर्मकामेन विशुद्ध॑ कर्म दुष्करम् | सता तु धर्मकामेन सुकरं कर्म दुष्करम्
दुष्ट पुरुष यदि धर्म की इच्छा भी करे, तो भी उसके द्वारा विशुद्ध कर्म का सम्पादन कठिन है; परन्तु साधु पुरुष यदि धर्मानुष्ठान की इच्छा करे, तो उसके लिए कठिन-से-कठिन कर्म भी सहज हो जाता है।
भीष्म उवाच