Śuka’s Nirveda: Vyāsa’s Admonition on Dharma, Impermanence, and ‘Imperishable Wealth’ (अक्षय-धन)
ऋषिरुवाच मनसोअप्रतिकूलानि प्रेत्य चेह च वाउ्छसि । भूतानां प्रतिकूलेभ्यो निवर्तस्व यतेन्द्रिय:
ऋषि बोले—राजकुमार! यदि तुम इस लोक और परलोक में मन के अनुकूल वस्तुएँ चाहते हो, तो इन्द्रियों को संयम में रखकर समस्त प्राणियों के प्रतिकूल आचरणों से दूर हट जाओ।
भीष्म उवाच