Śuka’s Nirveda: Vyāsa’s Admonition on Dharma, Impermanence, and ‘Imperishable Wealth’ (अक्षय-धन)
सर्व सर्वेण सर्वत्र क्रियमाणं च पूजय । स्वथधर्मे यत्र रागस्ते काम॑ धर्मो विधीयताम्
अपने वर्ण और आश्रम के अनुसार, सबके द्वारा सब जगह किए जाने वाले समस्त कर्मों का आदर करो। और अपने धर्म के अनुसार जिस कर्म में तुम्हारा अनुराग हो, उसका इच्छानुसार पालन करते रहो।
भीष्म उवाच