Śuka’s Nirveda: Vyāsa’s Admonition on Dharma, Impermanence, and ‘Imperishable Wealth’ (अक्षय-धन)
नित्यं च बहु दातव्यं साधुभ्यश्चञानसूयता । प्रार्थितं व्रतशौचा भ्यां सत्कृतं देशकालयो:
प्रतिदिन व्रत और शौचाचार का पालन करते हुए, उत्तम देश और काल में साधु पुरुषों को प्रार्थना और सत्कारपूर्वक यथाशक्ति अधिक-से-अधिक दान देना चाहिए और उनमें दोषदृष्टि नहीं रखनी चाहिए।
भीष्म उवाच