Adhyātma–Adhibhūta–Adhidaivata Correspondences and the Triguṇa Lakṣaṇas (Śānti-parva 301)
इन्द्रियेः सह सुप्तस्य देहिन: शत्रुतापन । सूक्ष्मश्वरति सर्वत्र नभसीव समीरण:
हे शत्रुतापन नरेश! जब देहधारी प्राणी इन्द्रियों सहित सो जाता है, तब उसका सूक्ष्म शरीर आकाश में वायु के समान सर्वत्र विचरण करता है—अर्थात वह स्वप्न देखता है।
भीष्म उवाच