अव्यक्त–प्रकृति–इन्द्रियविचारः
The Unmanifest, Prakṛtis, and the Sense-Complex
न हान्यत् तीरमासाद्य पुनस्तर्तु व्यवस्यति । दुर्लभो दूश्यते हास्य विनिपातो महार्णवे
जैसे महासागर के दूसरे तट पर पहुँचकर कोई फिर उसमें तैरने का निश्चय नहीं करता, वैसे ही संसार-सागर से पार हुए पुरुष का उसमें फिर गिरना—अर्थात लौट आना—दुर्लभ ही दिखाई देता है।
पराशर उवाच