अव्यक्त–प्रकृति–इन्द्रियविचारः
The Unmanifest, Prakṛtis, and the Sense-Complex
वणिग यथा समुद्राद् वै यथार्थ लभते धनम् । तथा मर्त्यार्णवे जन्तो: कर्मविज्ञानतों गति:
जैसे वैश्य समुद्र-मार्ग से व्यापार कर अपने मूलधन के अनुसार धन लाभ करता है, वैसे ही मर्त्य-समुद्र (संसार) में जीव को अपने कर्म और ज्ञान के अनुरूप गति प्राप्त होती है।
पराशर उवाच