अव्यक्त–प्रकृति–इन्द्रियविचारः
The Unmanifest, Prakṛtis, and the Sense-Complex
परार्थे वर्तमानस्तु स्वं कार्य योडभिमन्यते । इन्द्रियार्थेषु संयुक्त: स्वकार्यात् परिमुच्यते
जो परार्थ—अर्थात् मन और इन्द्रियों की तृप्ति के लिए—विषयभोगों में प्रवृत्त होकर उसी को अपना मुख्य कार्य मानता है, वह अपने वास्तविक कर्तव्य से च्युत हो जाता है।
पराशर उवाच