Śoka-śamana: Kṛṣṇa’s Consolation and Nārada’s Exempla to Sṛñjaya
Chapter 29
प्रथयिष्यति वै लोकान् पृथुरित्येव शब्दित: । क्षताद् यो वै त्रायतीति स तस्मात् क्षत्रिय: स्मृत:
ऋषियों ने यह सोचकर कि यह सब लोकों में धर्म की मर्यादा को प्रथित (स्थापित) करेंगे, उनका नाम ‘पृथु’ रखा। वे ‘क्षत’ अर्थात् दुःख से सबका त्राण करते थे, इसीलिए ‘क्षत्रिय’ कहलाए।
वायुदेव उवाच