Jvarotpatti — The Origin and Distribution of Jvara
Fever
पुण्यपापमयं देहं क्षपयन् कर्मसंक्षयात् । क्षीणदेह: पुनर्देही ब्रह्मत्वमुपगच्छति
यह शरीर पुण्य-पापमय है। देहधारी जीव प्रारब्ध कर्मों के क्षय के साथ-साथ इस देह को क्षीण करता रहता है। इस प्रकार देह के नाश हो जाने पर वह मुक्त पुरुष ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है।
असित उवाच