Adhyāya 272: Vṛtrasya Dharmiṣṭhatā, Indrasya Mohaḥ, Vasiṣṭha-upadeśaḥ
Vṛtra’s dharmic stature; Indra’s disorientation; Vasiṣṭha’s counsel
तस्माद् धर्मे प्रवर्तेथा: सर्वावस्थं युधिषिर । धर्मे स्थितानां कौन्तेय सिद्धिर्भवति शाश्वती
अतः कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! तुम सभी अवस्थाओं में धर्म का ही आचरण करो; क्योंकि जो लोग धर्म में स्थित रहते हैं, उन्हें शाश्वत सिद्धि—मोक्षरूप परम सिद्धि—प्राप्त होती है।
भीष्म उवाच