परिव्राजक-आचारः (Conduct of the Wandering Renunciant) — Mahābhārata, Śānti-parva 269
यजन्तो5हरहर्यज्जैर्निराशीर्बन्धना बुधा: । तेषां यज्ञाश्न वेदाश्न॒ कर्माणि च यथागमम्
वे बुद्धिमान पुरुष प्रतिदिन यज्ञों द्वारा, आशा-आकांक्षा के बन्धन से रहित होकर, भगवान् का यजन करते थे। उनके यज्ञ, वेदाध्ययन तथा अन्य कर्म सब शास्त्र-विधि के अनुसार सम्पन्न होते थे।
कपिल उवाच