Adhyāya 262: Śabda-brahman, Para-brahman, and the Ethics of Tyāga
Kapila–Syūmaraśmi Saṃvāda
तथा प्रज्ञानतृप्तस्य नित्यतृप्ति: सुखोदया । जैसे सब प्रकारके रसोंसे तृप्त हुआ मनुष्य किसी भी रसका अभिनन्दन नहीं करता
tathā prajñāna-tṛptasya nitya-tṛptiḥ sukhodayā |
उसी प्रकार जो प्रज्ञान (सच्चे ज्ञान) से तृप्त है, उसके भीतर नित्य तृप्ति रहती है, जो सुख का उदय कराती है। जैसे सब प्रकार के रसों से तृप्त मनुष्य किसी एक रस का अभिनन्दन नहीं करता, वैसे ही जो ज्ञानानन्द से परितृप्त है, वह अन्यत्र तृप्ति नहीं खोजता और अक्षय सुख में स्थित रहता है।
चुलाधार उवाच