कालनियमः शोकशमनं च
Kāla as Regulator; Pacification of Grief
यस्तु सम्मभिन्नवृत्त: स्याद् वीतशोकभयो नर: । अल्पेन तृषितो द्रह्मन् भ्रूणहत्यां न बुध्यते
जो मनुष्य शोक और भय से रहित होकर भी सदाचार से भ्रष्ट है, वह यदि धन की थोड़ी-सी भी तृष्णा रखे, तो दूसरों से ऐसा द्रोह कर बैठता है कि भ्रूण-हत्या जैसे पाप का भी विचार नहीं करता।
वैशम्पायन उवाच